वन

 

 

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विविध जंगलों सहित प्राकृतिक संसाधनों के मामले में मध्य प्रदेश भारत के सबसे समृद्ध राज्यों में से एक है। कुल 3.08 वर्ग किलोमीटर (अर्थात, 94,689 वर्ग किमी) में से 30.72 प्रतिशत क्षेत्र पर वन फैला हुआ है।

 

राज्य के इस महत्वपूर्ण संसाधन को समुदाय की भागीदारी और विकेन्द्रीकरण जैसे अभिनव उपायों के माध्यम से संरक्षित और इस्तेमाल किया जा रहा है। 70% वन क्षेत्र के संरक्षण और प्रबंधन में शामिल 15228 संयुक्त वन प्रबंधन समितियों (JFMCs) के साथ राज्य वानिकी को जन-उन्मुख बनाने में अग्रणी रहा है। लोग जंगलों के वास्तविक निवासि और असली रखवाले होते हैं और इस प्रकार इस क्षेत्र के लाभांश के लाभार्थि भी बन जाते हैं। वन और वन उत्पादन पर आधारित उद्योग राज्य की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देते है। वन संपदा के आर्थिक महत्व को समझते हुए राज्य में वन उत्पादन के व्यापार के व्यवस्थापन के लिए प्रयास किए जा रहे है। तेंदु पत्ता, साल बीज और कुल्लू गोंद जैसे राष्ट्रीयकृत वनोपज के व्यापार का राज्य ख्याल रखता है। इसके अलावा जंगलों से आंवला, हर्रा, लाख, अचार, महुआ जैसे कई उत्पादन भी सहकारी समितियों के नेटवर्क के माध्यम से जमा कर उनका कारोबार किया जा रहा है। मध्य प्रदेश के आंवला, गोंद, तेंदु पत्ता, साल बीज, हर्रा और विभिन्न औषधीय पौधों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में काफी मांग है। केवल तेंदु पत्ता जमा करने से संबंधित गतिविधियों के साथ हर साल वन निवासि 145 करोड़ रुपये की आय प्राप्त करते है।

 

सागौन और साल के वन राज्य का गौरव हैं। पिछले कुछ दशकों के दौरान वन विभाग और वन विकास निगम ने व्यापक सागौन वृक्षारोपण किया है। जबलपुर, सिवनी, बालाघाट, पन्ना, सीहोर, देवास, होशंगाबाद, हरदा, बैतूल, सागर, छिंदवाड़ा और मंडला जिलों में सागौन के घने जंगल है। इसी प्रकार मंडला, डिंडोरी, बालाघाट, सीधी, उमरिया, अनूपपुर और शहडोल जिलों में साल के जंगल बने हुए है।

 

राज्य की भौगोलिक और जैविक विविधता कांटेदार जंगलों से लेकर उपोष्णकटिबंधीय पहाड़ी जंगलों जैसे 18 वन प्रकारों में परिलक्षित होती है। राज्य 9 प्राकृतिक और 11 कृषि जलवायु क्षेत्रों में बंटा हुआ है।

 

वनों का वर्गीकरण ;

 

  • • आरक्षित वन
  • • संरक्षित वन
  • • अवर्गीकृत वन

 

राज्य के कुल वन क्षेत्र मे से 31098 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर आरक्षित वन फैले हुए है। संरक्षित वन 61,886 वर्ग किलोमीटर और अवर्गीकृत वन 1705 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर फैले हुए हैं।

 

वनों का घनत्व राज्य में एक समान नहीं है। बालाघाट, मण्डला, डिण्डोरी, बैतूल, सिवनी, छिंदवाड़ा, शहडोल, हरदा, श्योपुर, सीधी जिलों में घने वन दिखाई देते हैं। राज्य के ज्यादातर वन दक्षिणी और पूर्वी इलाके में बसे हुए है, श्योपुर और पन्ना उल्लेखनीय अपवाद रहे है।

 

चैम्पियन एवं सेठ के वर्गीकरण के अनुसार राज्य में 18 वन प्रकार हैं, जो तीन प्रकार के वन समूह में बटे हुए है, - उष्णकटिबंधीय नम पर्णपाती, उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती और उष्णकटिबंधीय कंटक वन। वन आच्छादन मूल्यांकन के आधार पर राज्य के वनों में पाए जानेवाले विभिन्न प्रकार के वन समूहों के वन आच्छादन क्षेत्र का प्रतिशत के लिहाज से वितरण इस प्रकार है: -

 

अ.क्र. वन प्रकार समूह वन आच्छादन के प्रतिशत

1

   उष्णकटिबंधीय नम पर्णपाती वन   8.97%

2

   उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन   88.65%

3

   उष्णकटिबंधीय कंटक वन   0.26%

 

वन मण्डल / प्रभाग

 

मध्य प्रदेश को 16 वन क्षेत्रीय मंडल, 9 राष्ट्रीय उद्यान और 25 अभयारण्यों में विभाजित किया गया है। वन मंडल में 63 वन प्रभाग शामिल है। प्रत्येक कृषि जलवायु क्षेत्र में एक अनुसंधान विस्तार इकाई है।

 

वन उत्पाद

 

इमारत की लकड़ी - बांस

 

हर साल राज्य में इमारत की लकड़ी का 2.5 लाख घन मीटर से अधिक, ईंधन की लकड़ी का तकरीबन दो लाख घन मीटर और बांस का आनुमानिक तौर पर 65 हजार टन उत्पादन होता है।

मध्य प्रदेश की 'टीक' (Tectona Grandis) लकड़ी बनावट, रंग और ग्रेन की गुणवत्ता के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यह फर्नीचर बनाने और घर के निर्माण के लिए सबसे अधिक अनुकूल है।

 

एमपीएमएफपी संघ के बारे में

 

वर्ष 1984 में भोपाल में राज्य लघु वनोपज संघ का निर्माण किया गया। यह गैर इमारती वनोपज के उत्पादन और प्रसंस्करण के लिए नोडल एजेंसी है। राज्य भर में 61 जिला सहकारी संघ और 1066 प्राथमिक सहकारी समितियों समेत यह शीर्ष सहकारी संस्था है।

यह संघ विभिन्न योजनाओं और गतिविधियों के माध्यम से लगातार गांव स्तर की संस्थाओं को सशक्त बनाने के लिए प्रयास कर रहा है। संघ द्वारा संरक्षण, खेती और एनटीएफपी के प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों में मध्य प्रदेश सरकार और भारत सरकार के विभिन्न विभागों द्वारा वित्त पोषित परियोजनाएं कार्यान्वित की जा रही हैं।

 

तेंदु पत्ता

 

राज्य में हर साल तेंदू पत्ते का उत्पादन 25 लाख मानक बैग है, जो राष्ट्रीय उत्पादन का लगभग 30% है। तेंदू पत्ते के संग्रह और व्यापार पर राज्य का एकाधिकार है। कृषि क्षेत्र में रोजगार की उपलब्धता कम होने पर गर्मी के मौसम के दौरान तेंदू पत्ते के संग्रह का काम, लगभग 15 लाख लोगों को रोजगार प्रदान करता है। तेंदु पत्ता संग्रह के काम से हर साल वनवासियों को 145 करोड़ रुपये की आय प्राप्त होती है।

 

अन्य लघु वनोपज

 

साल बीज और कुल्लू गोंद के क्रमशः 1200 टन और 300 टन के वार्षिक उत्पादन के साथ राज्य को इस व्यापार का एकाधिकार प्राप्त है। महुआ और आंवले की उत्पादन क्षमता क्रमश: 6000 टन और 5000 टन है।

 

हर्बल उत्पादन और प्रसंस्करण के क्षेत्र में अग्रणी होने के अलावा, मध्य प्रदेश राज्य ने कई अन्य लघु वन उपज के उपयोग और मूल्य संवर्धन के क्षेत्र में भी पहल की है। लाख एक ऐसी उपज है, जो भारत के साथ अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भी लोकप्रिय होती जा रही है।

 

अभिनव उपाय

 

सीसल और सबाई जैसे प्राकृतिक फाइबर के उत्पादन में भी तेजी आ रही है। शहद, आंवला मुरब्बा और शरबत, आयुर्वेदिक दवाओं आदि में गांव स्तर के समूहों ने अच्छी प्रगति कर ली है। इस सफल पहल से उत्साहित होकर प्रसंस्करण, अनुसंधान और प्रशिक्षण के लिए उत्कृष्टता का एक केन्द्र भोपाल में स्थापित किया गया है। एमएफपी प्रसंस्करण एवं अनुसंधान केन्द्र (MFP-PARC) के नाम समेत, यह संघ की जीएमपी और आईएसओ 9001:2000 प्रमाणित इकाई है, जो अब बड़े पैमाने पर जंगली शहद के प्रसंस्करण के अलावा 200 से अधिक आयुर्वेदिक दवाओं का निर्माण करती है। समान आधार प्रदान करने के लिए इन सभी चीजों का विपणन ब्रांड "विंध्य हर्बल्स 'के तहत किया जा रहा है। उम्मीद है कि आनेवाले वर्षों में गैर लकड़ी वनोपज (एनडब्ल्यूएफपी) और संबद्ध क्षेत्रों में रोजगार के लगभग 25,000 नए अवसर प्राप्त होंगे।

 

सागौन, बांस जैसी आर्थिक रूप से व्यवहार्य प्रजातियों के छोटे आवर्तन के साथ उच्च गुणवत्ता वाली लकड़ी के उत्पादन का लक्ष्य, हाई टेक प्लांटेशन योजना के तहत पेश किया गया है।

पर्यावरण की रक्षा और लोगों की आर्थिक बेहतरी के दोहरे लाभ के लिए किसानों के पेड़ों से व्याप्त व्यक्तिगत क्षेत्रों के प्रबंधन के लिए लोक वानिकी मिशन तैयार किया गया है।

सीटू संरक्षण और पूर्व सीटू प्रचार में लोगों को शामिल कर जनवादी संरक्षित क्षेत्र (पीपीए) के द्वारा औषधीय पौधों के साथ वन क्षेत्रों को समृद्ध करने के लिए एक पहल की गई है। वन निर्भर समुदायों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए यह योजना अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हो रही है।

 

निजी भागीदारी को प्रोत्साहन

 

इस क्षेत्र में निवेश के बहुत से अवसर उपलब्ध हैं और राज्य ने उन्हें निजी उद्यम के लिए मुक्त कर दिया है।

राष्ट्रीय उद्यानों, अभयारण्यों, अन्य वन क्षेत्रों में और आसपास ईको पर्यटन और साहसिक पर्यटन को राज्य बढ़ावा दे रहा है। इस तरह के संभावित 50 स्थलों के विकास के लिए उनकी पहचान की गई है। इनकी सूची मध्य प्रदेश राज्य पारिस्थितिकी पर्यटन विकास बोर्ड की वेबसाइट पर देखी जा सकती है।

 

निजी भागीदारी के क्षेत्र

• औषधीय और सुगंधित पौधों के उत्पादन के लिए किसानों के साथ अनुबंध खेती की पहल।

• प्राथमिक एमएफपी सहकारी समितियों के साथ अनुबंध विपणन की पहल।

• राज्य में इमारती लकड़ी, बांस, कागज और एनडब्ल्युएफपी के लिए बड़ी प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना।

• सहमत विनिर्देशों के तहत सहयोगात्मक निर्माण।

 

हर्बल हब

 

बंगलौर, चेन्नई, दिल्ली या कोलकाता जैसे देश भर के विभिन्न प्रक्रिया स्थानों के लिए मध्य प्रदेश ही जड़ी बूटियों के कच्चे माल का मुख्य स्रोत रहा है। मध्य प्रदेश के शिवपुरी, बैतूल, कटनी, नीमच आदि स्थानों पर स्थित आयुर्वेदिक संग्रह केंद्र ही भारतीय हर्बल उद्योग की भारी मांग को पूरा करते है।

यह केन्द्र मिलकर देश की 40% मांग को पूर्ण करते हैं। जड़ी बूटियों की प्राकृतिक उपलब्धी के साथ कई जड़ी बूटियों की व्यापक पैमाने पर खेती के कारण मध्य प्रदेश अब देश का हर्बल हब बन गया है। हर्बल उद्योग के लिए कच्चे माल का केंद्र होने के साथ मध्य प्रदेश अब कई हर्बल उत्पादों का मुख्य संसाधन केन्द्र बनने वाला है। इसे अपने महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक मानते हुए सरकार ने हर्बल प्रसंस्करण क्षेत्र में निवेश आमंत्रित करने के लिए कई उपाय किए हैं।

 

हर्बल क्षेत्र में संभावित निवेशकों की पेशकश के लिए मध्य प्रदेश के पास बहुत कुछ है।

 

  • • देश के 131 कृषि जलवायु क्षेत्रों में से मध्यप्रदेश में 11 क्षेत्र उपलब्ध है। यह औषधि उद्योग में इस्तेमाल होनेवाली 50% से अधिक जड़ी बूटियों का प्राकृतिक निवास स्थान है।
  • • कच्ची जड़ी बूटियों की प्रचुर मात्रा में उपलब्धता।
  • • विभिन्न जड़ी बूटियों की खेती के लिए प्रचुर मात्रा में भूमि उपलब्ध है।
  • • पहले से ही कई प्रजातियों की खेती व्यापक पैमाने पर शुरू की गई है। बड़े पैमाने पर उपलब्ध उपजाऊ भूमि के साथ इस व्याप्ती को और बढ़ाया जा सकता है।
  • • औद्योगिक कार्यों के लिए सस्ती जमीन उपलब्ध है।
  • • रेल, सड़क और हवाई मार्ग से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है।
  • • औषधि लाइसेंस के लिए एकल खिड़की मंजूरी प्रणाली उपलब्ध है।
  • • औद्योगिक क्षेत्रों / विकास केन्द्रों में जमीन का अधिमान्य आवंटन।
  • • प्रशिक्षित कर्मचारी / जनशक्ति उपलब्ध।
  • • व्यवहार्य हर्बल प्रसंस्करण उद्योग
     

राज्य में उपलब्ध कच्चे माल (और साथ ही जंगली खेती) के आधार पर, राज्य में कई हर्बल प्रसंस्करण उद्योगों को सफलतापूर्वक शुरू किया जा सकता है। इनमें से कुछ इस प्रकार हो सकते है ;

 

  1. • एलो वेरा जेल निष्कर्षण और स्प्रे ड्राईड पाउडर विनिर्माण इकाइयां।
  2. • विभिन्न जड़ी बूटियों के अर्क का उत्पादन करनेवाली इकाइयां।
  3. • आवश्यक तेलों के मूल्य संवर्धन के लिए आंशिक आसवन इकाइयां।
  4. • विभिन्न आयुर्वेदिक दवाओं की निर्माण इकाइयां।
  5. • फूलों से सारकृत द्रब्य और निचोड़ का उत्पादन।
  6. • खाद्य और वनस्पति रंगों और रंजक का उत्पादन।
  7. • कच्ची जड़ी बूटियों का प्राथमिक प्रसंस्करण।
  8. • इसबगोल भूसी निकालने वाली इकाइयां।
  9. • हर्बल सौंदर्य प्रसाधन।
  10. • सुगंध यौगिक बनाने वाली इकाइयां।
  11. • निष्कर्षण इकाइयां (जैव डीजल और नीम तेल आदि का उत्पादन)

 

हर्बल उद्योग के लिए विशेष पैकेज

 

राज्य में उद्योगों के लिए उपलब्ध बहुत सी सुविधाओं और रियायतों के साथ साथ निम्नलिखित विशेष पैकेज भी हर्बल उद्योगों को प्राप्त होगा।

औषधि उद्योग में गुणात्मक सुधार लाने के लिए, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा निर्धारित मानकों के अनुसार अच्छी विनिर्माण पद्धतियों (जीएमपी) के लिए प्रमाणपत्र को भूलाकर इकाई द्वारा भुगतान शुल्क की प्रतिपूर्ति की जा सकती है। हर परियोजना के लिए प्रतिपूर्ति की राशि 11 लाख रुपए की ऊपरी सीमा के साथ कुल शुल्क का 50 % होगी। निर्यात को बढ़ावा देने के लिए हर्बल उद्योगों के लघु उद्यमियों को अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेलों और प्रदर्शनियों में भाग लेने के लिए वित्तीय सहायता दी जाएगी।

 

हर्बल उत्पादों की आयात के लिए आयात उद्योगों द्वारा प्रभारयोग्य पंजीकरण शुल्क की 25% की सीमा तक की प्रतिपूर्ति राज्य सरकार द्वारा की जाएगी। यह प्रतिपूर्ति केन्द्र सरकार द्वारा दी गई प्रतिपूर्ति की राशि के अतिरिक्त होगी।

अधिकांश हर्बल और आयुर्वेदिक उत्पाद विनिर्माण इकाइयां राज्य में इंदौर और भोपाल जैसे उन्नत जिलों में स्थित होने की संभावना है, इसलिए सरकार ने इन जिलों में भी ब्याज सब्सिडी, पूंजी निवेश सब्सिडी आदि सुविधाएं प्रदान करने का निर्णय लिया है। पिछड़े जिलों के मामले में भी समान सुविधाएं लागू रहेंगी। मौजूदा और आगामी हर्बल पार्क, हर्बल और आयुर्वेदिक उद्योगों के लिए राज्य सरकार द्वारा 19.05.03 के दिन जारी अधिसूचना संख्या एफ - 28-38-01,16B (I), बी(II), बी(III), बी(IV), बी(V) के तहत घोषित विशेष आर्थिक क्षेत्रों में लागू श्रम कानूनों के प्रावधान ही लागू रहेंगे।

नाम में परिवर्तन, सहयोगी का समावेश, सहयोग में प्रवेश, पुनर्गठन और अगले 3 साल के लिए लीज डीड में संशोधन के लिए हर्बल और आयुर्वेदिक उद्योगों को स्टांप शुल्क से मुक्त रखा जाएगा। इसी तरह, इन उद्योगों को वित्तीय सहायता प्राप्त करने के लिए वित्तीय संस्थानों के साथ समझौता करने के मामले में लागू स्टांप शुल्क से भी मुक्त रखा जाएगा।

अनुज्ञप्ति अधिकारी और अन्य विभागों से जलद निकास हेतु दवा और हर्बल उद्योगों के लिए विशेष व्यवस्था बनाई गई है।

 

मंडल के लिहाज से वन क्षेत्र (वर्ग किमी)

 

मंडल कुल वन क्षेत्र संरक्षित वन क्षेत्र आरक्षित अवर्गीकृत
वन क्षेत्र वन क्षेत्र

इंदौर

3723.61

2855.04

805.58

62.99

उज्जैन

5435.45

3618.6

1811.12

5.73

खंडवा

9290.74

9098.98

164.19

27.57

ग्वालियर

6612.14

4618.56

1993.58

-

छतरपुर

6431.78

786.76

5620.78

24.24

जबलपुर

9085.06

7720.64

642.07

722.35

छिंदवाडा

4168.65

1707.79

2446.42

14.44

बालाघाट

4775.54

3798.55

976.99

-

बेतूल

4041.24

2853.89

699.71

487.64

भोपाल

6906.93

4076.72

2761.98

68.23

रीवा

7790.91

3784.21

4006.7

-

शहडोल

5502.74

3827.2

1660.71

14.83

शिवपुरी

6859.41

3204.19

3432.86

222.36

सागर

6010.05

4345.33

1612.59

52.13

सिवनी

4348.99

3101.39

1247.6

-

होशंगाबाद

3706.14

2488.64

1215.16

2.34

कुल

94689.38

61886.49

31098.04

1704.85

 

मध्य प्रदेश में उपलब्ध प्रमुख औषधीय पौधें

 

वानस्पतिक / हिन्दी नाम

Acorus Calamus (बूच या स्वीट फ्लॅग)

Aegle Marmelos (बेल)

Aloe Vera (घृतकुमारी)

Andrographis Paniculata (कालमेघ)

Asperagus Racemosus (शतावर)

Azadiracta Indica (नीम)

Chlorophytum Borivilianum (सफेद मुसली)

Cymbopogom Martini (लेमन ग्रास)

Cymbopogon Flexuosus (लेमन ग्रास)

Cymbopogon Winterianus (जावा सिट्रोनेला)

Cyperus Rotundus (नागरमोथा)

Embelia Ribes (बाय विडंग)

Emblica Officinalis (आंवला)

Gymnema Sylvestre (गुडमर)

Jatropha Curcus (रतनजोत)

Ocimum Basilicum (तुलसी)

Phyllanthus Amarus (भुई आंवला)

Plantago Ovata (इसबगोल)

Rauwolfia Serpentine (सर्पगंधा)

Terminalia Arjuna (अर्जुन)

Terminalia Belerica (बहेडा)

Terminalia Chebula (हर्रा)

Tinospora Cordifolia (गिलॉय)

Vetiveria Zizanioides (खस)

Withania Somnifera (अश्वगंधा)

 

 

वाणिज्यिक बागवानी योजना

 

औद्योगिक और वाणिज्यिक प्रयोजनों के उपयोग के लिए सागौन और बांस जैसे उच्च आर्थिक मूल्य की प्रजातियों का रोपण कर वानिकी उत्पादन में वृद्धि करना, वाणिज्यिक बागवानी योजना का उद्देश्य है। मध्यप्रदेश राज्य वन विकास निगम ने 2,22,275 हेक्टर क्षेत्र पर वृक्षारोपण का कार्य शुरू किया है।

 

Content Courtesy : MP Madhyam.