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अलसी फसल की कृष कार्यमाला

 

भूम का चुनाव एवं तैयारी- 

अलसी के लये काली दोमट चूना युक्त च्छे जल नकास वाली भूम उपयुक्त पाथ्द्यर्; गथ्द्यर्; है । थ्द्य;सके लये न क्षारीय भूम न म्लीय भूम हो। ाुद्घ फसल लेने के लये खेत को च्छी तरह दो गहरी जुताथ्द्यर्; एवं पाटा चलाकर तैयार करते हैं । खेत को भुरभुराएवं नींदा रहत बना लेते हैं।

 

बीज बुआइर्; का समय, तरीका एवं मात्रा : - अक्टूबर के -तीय सप्ताह में बु ाई करने से धक उपज मलती है तथा कीटव्याधयों का प्रकोप भी कम होता है । लसी की बो ाई में कतार से कतार की दूरी २५ से ३० से.मी. एवं पौधे से पौधे की दूरी ५७ से.मी. रखते हैं । बीज की बु ाई ३४ से.मी. गहराई पर करने से ंकुरण च्छा होता है । लसी का बीज संचत बोने पर १२ कलो प्रत एकड़ तथा संचत ाी के लये १० कलो प्रत एकड़ लगता है ।

 

बीजोपचार: 

अलसी के बीज को ३ ग्राम सेरेमान या एग्राोमान या थायरम से बीजोपचार कर लेना चाहये । बावस्टीन १.५ ग्राम / २.५ ग्राम थायरम या टापसन एम. २.५ ग्राम प्रत कलो के हसाब से बीजोपचार करना चाहये।

 

जैवक खाद:

संचत अलसी के लये २.५ टन नाडेप कम्पोस्ट व ४०० ग्राम पी.एस.बी. कल्चर या १.५ टन वर्मी कम्पोस्ट एवं ४०० ग्राम पी.एस.बी. कल्चर डालकर लसी फसल का कसान बना रासायनक खाद डाले भरपूर उत्पादन लया जा सकता है।

 

रासायनक खाद: 

अलसी की फसल को स्थत नुसार बारानी में १६ कलो नत्रजन, ८ कलो स्फुर तथा ४ कलो पोटाा प्रत एकड़ देना चाहये। उतेरा पद्घत में ६८ कलो नत्रजन, ४ कलो स्फुर तथा २ कलो पोटाा प्रत एकड़ देना चाहये। संचत लसी में २४ कलो नत्रजन, २ कलो स्फुर तथा ६ कलो पोटाा प्रत एकड़ देना चाहये।दडद्मद्र; संचत वस्था में बोवाई के समय नत्रजन की ाधी मात्रा देवें तथा ोष मात्रा प्रथम संचाई पर दें। गंधक की कमी हो तो ८ कलोग्राम प्रत एकड़ थवा संगल सुपर फास्फेट खाद से नुासत स्फुर की मात्रा की पूर्त करें।

 

फसल पद्घतयाँ : 

अलसी की बारानी, उतेरा एवं संचत फसल बोई जाती है।

 

फसल चक्र: 

अलसी के वभन्न फसल चक्रो में उपज का ांकलन कया गया है। फसल चक्र पड़त लसी में लसी का उत्पादन ६.९५ क्वंटल, उर्द लसी में क्रमाः ३.३२ एवं ७.६५ क्वंटल, सोयाबीन लसी में क्रमाः ६.४८ क्वंटल तथा ७.१५ क्वंटल प्रत एकड़ लया गया है।

 

जातयाँ- 

फसल पद्घतयों एवं जलवायु के अनुरुप लसी की वभन्न जातयाँ वकसत की गई है। वभन्न क्षेत्र एवं परस्थतयों के नुसार लसी की जातयाँ नम्नानुसार हैं:

 

कस्म पकने का समय दन  औसत पैदावार क्वं प्रत हेक्टर वोष गुण
जवाहर-५५२ 110 - 120 4-4.5
  1. भभूतयां गेरुआ उकटा एवं लसी की मक्खी रोधी, 
  2. तेल ४४ प्रतात
जवाहर-२३ 
  
120-125 4-5
  1. उकटा, दहया, गेरुआ के लये प्रतरोधी 
  2. तेल ४३ प्रतात
टी-३९७ 120-122 11
  1. नीला फूल, टहनी फैलने वाली तेल ४४ प्रतात
जे.एल.एस-२७ 118-125 15
  1. मध्यमरोधत भभूतया, गेरुआ, एवं उकटा रोगों के लये प्रतरोधी 
  2. अलसी की मक्खी का प्रकोप कम होता है।
जे.एल.एस.-९ 120  9-13
  1. दाना चमकीला, उक्टा तथा पाउडरी मल्डयू लगता है।
  2. ाुष्क परस्थतयों के लये उपयोगी
जवाहर-१७ 115  4.8-6 
  1. असंचत एवं उतेरा के लये उपयुक्त गेरु ा एवं  लसी की मक्खी के लये रोधी।
  2.  रेाा  च्छा होता है।

 

संचाई:

संचत अलसी में दो संचाई पर्याप्त होती है । जो बो ाई के ३५ एवं ६५ दन बाद देने से लसी फसल का भरपूर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। 

 

खरपतवार नयंत्रण : 

बोनी के ३५ से ४० दन बाद तक फसल को खरपतवारों से मुक्त रखना जरूरी है । खरपतवार नयंत्रण हेतु चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के लये २४डी सोडयम साल्ट २०० ग्राम सक्रय तत्व प्रत एकड़ एवं सकरी पत्ती वाले खरपतवारों के नयंत्रण हेतु आथ्द्य;सो प्रोटूरानदडद्मद्र; ३०० ग्राम प्रत एकड़ २०० से २५० लीटर पानी में घोलकर छड़काव करना चाहये ।

पौध संरक्षण :

 

अलसी की फसल मे देरी से बोनी करने पर कलका मक्खी (बड़ फ्लाई) का प्रकोप बहुत धक होता है । जससे कभी कभी बहुत ही कम उपज मलती है । प्रौढ़ मक्खी फूल की कलयों में ंडे देती है । इसकी इल्ली कली के भीतर जननांगों को खा जाती है । जससे लसी फसल में प्रजनन नहीं होता है तथा कली बना बीज बने ही सूख जाती है ।

नयंत्रण :

 

कलका मक्खी के नयंत्रण हेतु एक ही खेत में बारबार अलसी की फसल न लें । जुताई कर खेत को खुला धूप में छोड़ दें । बो ाई १० से १५ दन पहले करने पर कलका मक्खी का प्रकोप कम होता है । उचत कस्में जैसे जवाहर२३, लक्ष्मी२७, करण, जवाहर९, नीला गरमा, मुक्ता ाद लगायें ।
प्रकाा प्रपंच का प्रयोग कलका कीट को आकर्षत करने के लये एक कलो ग्राम गुड़ को ७५ लीटर पानी में मलाकर प्रयोग करें । मोनोक्रोटोफॉस ३६ थ्द्यर्;.सी (०.०४%) या इन्डैेंस्ैंल्फैंॅन्ैं ऽ) केले छड़काव करें या संकोजेल (०.०२%) के साथ छड़काव करें ।

 

अलसी के रोग एवं नयंत्रण :

अलसी में गेरू ा रोग : लसी में गेरू ा रोग -ारा धक हान होती है । गेरू ा रोग में पत्तयों पर चमकीले पीले रंग के चूर्णी धब्बे दखाथ्द्यर्; देते है तो ाीघ्र ही सभी पत्तयों पर फैल जाते हैं । तने पर कत्थथ्द्यर्; या काले रंग के चकते दखाथ्द्यर्; देते हैं ।

 

गेरूआ नयंत्रण :

  1. बोआई पूर्व बीज थायरम या मोनोमान -ारा उपचारत करें।
  2. नरोधक जातयाँ जैसे आर५७५, ५५२, टी३९७ एल.एस.७३२५ बोयें ।
  3. मेनकोजेव या डाइथेन एम४५ का ८०० ग्राम प्रत एकड़ की दर से १५ दन के अन्तर से २३ छड़काव करें ।

अलसी का उकटा रोग : उकटा नरोधक जातयाँ जैसे जवाहर२३१०, जवाहर ५५२, एल.एन.एस.६२, ाद बोयें ।

पाढ़द्य;डरी मल्डयू : समय पर बोनी करने से यह रोग कम लगता है । केराथयान ०.१% घोल या केल्सयम ०.०५% घोल या घुलनाील गंधक ०.३% के दो तीन छड़काव करना चाहये ।

फसल की कटाई एवं भण्डारण : जब फसल के केप्सूल भूरे रंग के हो जावे एवं फसल की पत्तयाँ अच्छी तरह सूख जावे एवं बीज पर चमक ा जावे तब फसल काटना चाहये। लसी फसल के बीज में ८% नमी होने पर बीज का भण्डारण करना सर्वोत्तम पाया गया है ।