कला और शिल्प

   हस्तशिल्प

 

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टेराकोटा

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एक साधारण पहिया और जादुई हाथ मिलकर निराकार मिट्टी को शानदार रूपों में ढाल देते है। टेराकोटा, जीवन की प्रतिरूप लगती, एक वास्तव और आकर्षक कला है, जिसमें विशाल हाथी, नाग, पंछी, घोड़े, देवताओं की पारंपरिक मूर्तियां और ऐसे कई आकार बनाए जाते है। कला की विविधता, प्रसार और महारत के कारण मध्यप्रदेश की टेराकोटा मिट्टी ने अपनी अनोखी पहचान बना ली है। यह कला समाज को, पुजा से जुडे कर्मकांडों के लिए उपयुक्त वस्तुओं के साथ अन्य उपयोगी वस्तुएं भी प्रदान करती हैं।

 

चित्र

चमकीले रंग, देहाती रचना और भावपूर्ण पेशकश के साथ मध्यप्रदेश के लोक-चित्र अपने सरल, धार्मिक लोगों के जीवन को दर्शाते है। इन लोक-चित्रों के द्वारा पूजा और उत्सव के भाव, दोहरी फिर भी प्रेरणादायी अभिव्यक्ति पाते है। बुंदेलखंड, गोंडवाना, निमर और मालवा के आकर्षक दीवार-चित्रों के माध्यम से इन चित्रों का करिष्मा फैला है। इन चित्रों में दैनिक जीवन की छवियाँ, गहरे विवरण के साथ अभिव्यक्त होती हैं।

 

कांच का काम

मध्यप्रदेश का कांच का काम अपने बेहतरीन राजसी रूप में उभर कर आता है। प्रकाशमान, चमकीली, देदीप्यमान, चमकदार और शानदार कांच का काम, बेहद खूबसूरत प्रतीत होता है। मध्यप्रदेश के कारीगरों के कुशल हाथों से बने मुस्कुराते कटोरे, चमचमाती कांच, जगमगाती प्लेटें और सजावटी क्रिस्टल, मानो किसी जीवीत कविता के समान मन को लुभाते है।

 

लकड़ी के शिल्प

मध्यप्रदेश के लकड़ी के शिल्पों द्वारा परिष्करण और जटिलता के सुघड चमत्कार सामने आते है। मध्यप्रदेश और आदिवासी क्षेत्रों के पारंपरिक लकड़ी शिल्प में छोटे जानवरों और मानव की मूर्तियों से लेकर फर्नीचर जैसी बड़ी, नक़्क़ाशीदार वस्तुओं तक, सब कुछ शामिल है। मछली, मुर्गा, तीर-कमान लिए योद्धा, मोर, घुड़सवार, हाथी, लकड़ी मे खुदे शेर के सिर जैसी प्रकृति और वास्तविक जीवन की छवियों के नक्काशीदार शिल्प, इस कला की सुंदरता और विशेषज्ञता की कहानी सुनाते है। स्थानीय रूप से उपलब्ध शीशम, सागौन, दुधी, साल, केदार और बांस की लकड़ी से विभिन्न आकार की उपयोगी और सजावटी कृतियां आकार लेती है।

राज्य के आदिवासी क्षेत्र में लकड़ी के शिल्प बनाने की प्राचीन और समृद्ध परंपरा है। अपने घर, दरवाजे की कलात्मक चौखटें, दरवाजे, चौकीयां और संगीत वाद्ययंत्र के निर्माण के लिए मंडला क्षेत्र के गोंड और बैगा लकड़ी का उपयोग करते है। बैगा अब भी लकड़ी के मुखौटे का उपयोग करते है। गोंड और कोरकू के परंपरागत लकड़ी के दरवाजे और स्मृति राहतें तथा बरीहया जनजाति में शादी के खम्भें आकर्षक होते हैं। धार, झाबुआ और निमाड़ के भील-बहुल क्षेत्र में, "गाथा" अर्थात स्मृति स्तंभों के शिल्प बनाने की प्रथा है। पीसाई के पत्थरों के पात्र और अनाज को मापने की चौकियां लकड़ी से बनती हैं और उन पर खूबसूरती से खुदाई की जाती हैं। दरवाजों पर पशुओं, पक्षियों तथा विभिन्न पैटर्न की खूबसूरती से खुदी आकृतियाँ होती है, जबकि चाकू और कंघी पर बारीक नक्काशी दिखाई देती है। अलीराजपुर और झाबुआ, इन दो मुख्य केंद्रों में आदिवासी भील के लकड़ी के शिल्प देखने को मिलते हैं।

 

टोकरी और बांस

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आसानी से उपलब्ध बांस की वजह से मध्यप्रदेश में टोकरी और चटाई की बुनाई, एक प्रमुख कला है। बालाघाट, सिवनी, छिंदवाड़ा और बैतूल के स्थानीय हाट (बाजार) में कई किस्म की टोकरीयां और बुनी हुई चटाईयां दिखाई देती है। बैतूल जिले में तूरी समुदाय के लोग 50 अलग अलग प्रकार की टोकरीयां बनाते है, जिनका उपयोग विभिन्न दैनिक जरूरतों और उत्सव के मौकों के दौरान औपचारिक प्रस्तुतियों के लिए किया जाता है। अलीराजपुर में बांस की खूबसूरती से बनी टोकरियाँ और खिड़कियां पाई जाती हैं। कुर्सी, मेज, लैंप और कई अन्य फर्नीचर के सामान बनाने के लिए बांस और बेंत का इस्तेमाल किया जाता है। बांस की बनी कई चीजें कला के संग्रह में शामिल होती है।

 

धातु शिल्प

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मध्यप्रदेश में कई किस्म के धातु शिल्प बनाए जाते है। राज्य के कुशल कारीगरों नें धातु के अद्वितीय शिल्प बनाए है। शुरू मे धातु का प्रयोग बर्तन और आभूषण तक ही सीमित था, लेकिन बाद में कारीगरों ने अपने काम में बदलाव लाते हुए विविध स्थानीय श्रद्धेय देवता, मानव की मूर्तियां, पशु-पक्षियों और अन्य सजावटी वस्तुओं को भी शामिल कर लिया।

अयोध्या को अपना मूल शहर बताने वाले टीकमगढ़ के स्वर्णकार, धातु की तार के उपयोग के विशेषज्ञ माने जाते है, जो हुक्का, गुडगुडा, खिचडी का बेला और पुलिया जैसे पारंपरिक बर्तन बनाने में कुशल होते है। वे पीतल, ब्रॉंझ, सफेद धातु और चांदी के लोक-गहने बनाते है और उन्हें चुन्नी, बेलचुडा, मटरमाला, बिछाऊ, करधोना, गजरा और ऐसे अन्य अलंकरणों के साथ सुशोभित करते है। सजावटी वस्तुओं में स्थानीय देवताओं की मूर्तीयों समेत हाथी, घोड़े, ठाकुरजी के सिंहासन, बैल, आभूषण के बक्सें, दरवाज़े के हैंडल, अखरोट कटर आदि शामिल हैं। टीकमगढ़ रथों और पहियों वाले पीतल के घोड़ों के लिए प्रसिद्ध है।

 

लौह शिल्प

लोहार कला की कहानी लगभग इस भूमि जितनी ही पुरानी है। कच्चे लोहे को भट्ठी में गर्म किया जाता है और फिर बार-बार ठोक कर उससे सजावट और उपयोगिता की वस्तुएं बनाई जाती है। मध्यप्रदेश के आदिवासी (लोहार) लोहे को शिल्प में ढाल देते है। लोहे के सजावटी दीये (दीपक), करामाती छोटे पंछी तथा जानवरों की पारंपरिक और समकालीन, दोनों तरह के शिल्प की दस्तकारी देखनेवालों को मोहित कर देती है। लोहारों के कुशल हाथों में लोहा सांकल (चेन), चिटकनी (लैच), छुरी (चाकू), कुल्हाड़ी और नाजुक गहनों के रूप लेता है। बदलते समय के साथ, आधुनिक समय के स्वाद के अनुरूप, इस कला में बदलाव आ रहे है। शिवपुरी जिले में करेरा, लोहे के कलात्मक और सुघड काम के लिए मशहूर है।

 

साँचे में ढली काग़ज़ की लुग्दी की चिजें

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मध्यप्रदेश के भोपाल, उज्जैन, ग्वालियर और रतलाम क्षेत्रों से, विशेष रूप से नागवंशी समुदाय के कलाकारों को साँचे में ढली काग़ज़ की लुग्दी से देवताओं की मूर्तियां, पक्षियों की प्रतिकृतियां, पारंपरिक टोकरियाँ और अन्य सजावटी वस्तुएं बनाने की कला में महारत हासिल है।

 

पत्थर का काम

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मध्यप्रदेश के आदिवासी कलाकारों के लिए पत्थर पर नक्काशी करना, आध्यात्मिक खोज की एक अभिव्यक्ति रही है। जाली तथा देवी देवताओं की, पक्षियों और जानवरों की मूर्तियों के साथ अलंकृत यह शिल्प, स्वर्गीय दृश्य का अनुभव देती है।

स्थानीय रूप से उपलब्ध रेत पत्थर पर नक्काशी (जाली का काम) के लिए ग्वालियर प्रसिद्ध है। टीकमगढ़ के निकट ‘कारी' बहुरंगी संगमरमर के बर्तन बनाने के लिए प्रसिद्ध है। रतलाम में राजस्थान से विस्थापित शिल्पकार सफेद संगमरमर में धार्मिक मूर्तियां बनाते है। जबलपुर के भेडाघाट की दुकानें संगमरमर की मूर्तियों से सजी हुई है।

 

प्रमुख खरीदारी केन्द्र

मृगनयनी - सरकार द्वारा प्रायोजित एम्पोरियम की एक श्रृंखला तथा मध्यप्रदेश के ‘हस्तशिल्प एवं हथकरघा विकास निगम लिमिटेड' की एक इकाई है, जो मध्यप्रदेश के कुशल कारीगरों की कला-कृतियों का प्रदर्शन करती है। राज्य के प्रमुख शहरों में, मेट्रो शहरों तथा भारत के प्रमुख पर्यटन स्थलों में मृगनयनी के शोरूम द्वारा हस्तकला की वस्तुएं, धातु, टेराकोटा और मिट्टी के बर्तन, पेंटिंग, आभूषण और वस्त्र आदि की कई किस्में प्रदर्शित की जाती है और बेची जाती है।

आप इंदौर में शंकर गंज से चमड़े के खिलौने, उज्जैन की स्थानीय दुकानों से कागज की लुगदी से बने कई तरह के पंछी, बैतूल और उज्जैन से बांस के उत्पाद, सीहोर जिले के बुधनी से लाख के खिलौने, इंदौर के देपालपूर से लाख की चूड़ियाँ, शिवपुरी में करेरा से लोहे की कलात्मक वस्तुएं, खजुराहो के स्थानीय दुकानों से आदिवासीयों द्वारा बनाई गई चीजें, टीकमगढ़ से आदिवासी आभूषण, जबलपुर से संगमरमर की कलाकृतियां, ग्वालियर से हस्तनिर्मित जूते, इंदौर से टाई एन्ड डाई प्रिंट और बाटिक, ग्वालियर से खादी ग्राम उद्योग द्वारा हस्तनिर्मित कागज, धार, इंदौर, उज्जैन और देवास से टेराकोटा शिल्प, भोपाल के ओल्ड सीटी क्षेत्र, अपमार्केट एम्पोरीया और न्यू मार्केट की दुकानों से चांदी के गहने, मोती-काम, कढ़ाई की हुई मखमली फैशनेबल पर्स जैसी पारंपरिक भोपाली कलात्मक वस्तुएं खरीद सकते है। हस्तशिल्प एवं हथकरघा विकास निगम द्वारा भोपाल, इंदौर, जबलपुर, पचमढ़ी और ग्वालियर में ‘शिल्प बाजार' का आयोजन भी किया जाता है।