मध्यप्रदेश में बिजली

चुनौती

 

बिजली आधुनिक विकास की असली ताकत है। कृषि, औद्योगिक या सेवाओं से जुडी लगभग सभी आर्थिक गतिविधियां बिजली की निर्बाध आपूर्ति पर निर्भर हैं। बिजली की बढ़ती मांग के मद्देनजर उपभोक्ता, औद्योगिक, कृषि, वाणिज्यिक और घरेलू इस्तेमाल के लिए उचित दरों पर बिजली की विश्वसनीय और गुणवत्तापूर्ण आपूर्ति करने के लिए और बिजली के मामलें में आत्मनिर्भर बनने के लिए राज्य वचनबद्ध है। वर्तमान में राज्य को बिजली की कमी का सामना करना पड़ रहा है। इस समय राज्य इस खाई को मिटाने की और बिजली की आपूर्ति के मामलें में आत्मनिर्भर बनने की चुनौती का सामना कर रहा है।

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वित्तीय वर्ष 2011 के दौरान राज्य में बिजली निवेश में 9% की वृद्धि हुई थी, जो अगले वित्तीय वर्ष 2012 में 11% पर पहुंची। हालांकि, यह निवेश वित्तीय वर्ष 2013 के दौरान 20% से और वित्तीय वर्ष 2014 में 23% से बढ़ाने की योजना बनाई गई है। फीडर विभक्तिकरण योजना के प्रभाव पर विचार कर, इस वृद्धि की योजना बनाई गई है। वित्तीय वर्ष 2013 और 2014 के दौरान राज्य के लिए क्रमशः 1719 मेगावाट और 3133 मेगावाट की अतिरिक्त क्षमता की योजना है।

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वर्तमान में, मध्यप्रदेश पावर जनरेटिंग कंपनी की कुल बिजली निर्माण क्षमता 3724.7 मेगावाट है, जिसमें 2807.50 मेगावाट तापीय और 917.20 मेगावाट पनबिजली शामिल है। नर्मदा घाटी परियोजनाओं से राज्य को 2372 मेगावाट की क्षमता भी प्राप्त हुई है। केंद्रीय बिजली निर्माण स्थानकों में भी राज्य का हिस्सा है, जो स्वयं के बिजली उत्पादन क्षमता के लिए पूरक है। यह 13.97 लाख कृषि उपभोक्ताओं सहित 96 लाख से अधिक उपभोक्ताओं को सेवा प्रदान करती है।

हालांकि पिछले कुछ वर्षों के दौरान मध्यप्रदेश में बिजली के क्षेत्र में महत्वपूर्ण वृद्धि और विकास देखा गया है, लेकिन अभी तक यहां चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। स्थापित क्षमता में बिजली की मांग के अनुरूप वृद्धि नहीं हो पाई है।

राज्य, अब खुद बिजली क्षेत्र की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार हो गया है। राज्य ने विकास की जरूरतों को पूरा करने के लिए, बिजली वितरण प्रणाली में सुधार के साथ विद्युत उत्पादन और पारेषण क्षमता की वृद्धि, दोनों के लिए गहरे प्रयास शुरू कर दिये है।

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मांग-आपूर्ति के बीच की दूरी कम करने के लिए और भविष्य में विकास की जरूरत को पूरा करने के लिए, राज्य बिजली निर्माण कंपनी ने नई बिजली परियोजनाओं के निर्माण की योजना बनाई है। इनमें 2 x 600 मेगावाट की श्री सिंगजी थर्मल पावर स्टेशन (SSTPP) और 2 x 250 मेगावाट की सतपुड़ा थर्मल पावर स्टेशन (एसटीपी) प्रमुख परियोजनाएं हैं। इन परियोजनाओं के निर्माण का कार्य पूरे जोरों पर हैं।

2 x 250 मेगावाट के सतपुड़ा टीपीएस एक्सटेंशन की 10 और 11 इकाइयों के हाइड्रोलिक टेस्ट क्रमशः 4 नवम्बर 2011 और 30 अप्रैल 2012 को आयोजित किए गए और 10 वी इकाई का लाईट-अप जुलाई 2012 में प्रस्तावित है। 2 x 600 मेगावाट के श्री सिंगजी थर्मल पावर स्टेशन की पहली इकाई की हाइड्रोलिक टेस्ट 25 अप्रैल 2012 को हुई और दुसरी इकाई की टेस्ट अगस्त 2012 में प्रस्तावित है। एसटीपी की 10 और 11 इकाइयों के सीओडी क्रमशः दिसंबर 2012 में और अप्रैल 2013 में तथा SSTPP की पहली और दुसरी इकाइयों के सीओडी क्रमशः मार्च 2013 और जुलाई 2013 में लक्षित है।

स्वतंत्र 11KV फीडर के माध्यम से इच्छुक ग्रामीण परिवारों को 24 घंटे और कृषि पंपों के लिए 8 घंटे तक बिजली की आपूर्ति करने के लिए राज्य सरकार ने फीडर विभक्तिकरण योजना शुरू की। इस योजना के तहत 11KV के 6262 फीडर्स विभक्तिकरण के लिए शामिल किये गए है। इसके लागू होने के बाद, वर्ष 2013 से ग्रामीण क्षेत्रों में 24 घंटे बिजली आपूर्ति प्रदान की जाएगी। इस योजना के लिए आरईसी और एडीबी द्वारा अनुदान की व्यवस्था की गई है। मई 2012 तक, 1496 फीडर्स का विभक्तिकरण किया गया है। इस योजना को लक्षित समय के भीतर पूरा करना, वितरण कंपनियों के लिए चुनौती है।

बिजली क्षेत्र में बदलाव

 

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आर्थिक विकास के लिए विद्युत क्षेत्र को एक महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे का अंग माना गया है। राज्य के आर्थिक विकास को लंबे समय तक सहायता करने के लिए राज्य की बिजली उपयोगिताओं की वित्तीय व्यवहार्यता सुनिश्चित करना आवश्यक है। इस क्षेत्र को वित्तीय रूप से व्यवहार्य बनाने के लिए राज्य सरकार पारेषण और वितरण का नुकसान कम करने पर अधिक ध्यान दे रही है। पारेषण के क्षेत्र में प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए निवेश किया गया है, जिसके परिणामस्वरूप तकनीकी घाटे में पर्याप्त कमी आई है। राज्य की पारेषण उपयोगिता की पारेषण हानि की स्तर 3.51% है, जो देश में सबसे कम है।

वितरण क्षेत्र में पिछले 4 वर्षों के दौरान ए टी एंड सी घाटा भी 11% से कम हुआ है। राज्य ने चालू वित्त वर्ष के दौरान ए टी एंड सी घाटा 3% से कम करने के लिए योजना बनाई है। मौजूदा एल टी प्रणाली का उच्च वोल्टेज वितरण प्रणाली (HVDS) या एअर बन्च्ड केबल में रूपांतरण, मीटर का उपभोक्ता के परिसर के बाहर स्थानांतरण, उच्च मूल्य उपभोक्ताओं के लिए रिमोट मीटरींग जैसे विभिन्न उपाय Discoms द्वारा किए जा रहे है। बिजली चोरी के मामलों के शीघ्र विचारण के लिए राज्य में 112 विशेष अदालते कार्य कर रही हैं। इसके अलावा, Discoms द्वारा कनेक्शन की विशेष जाँच के अभियान भी चलाए जा रहें है और प्रभावी जाँच के लिए अभियान के दौरान विशेष पुलिस बल और होमगार्ड की सेवाओं का भी उपयोग किया जाता है। इन सभी उपायों के कारण राजस्व में काफी वृद्धि हुई है। Discoms द्वारा वर्ष 2010-11 के दौरान राजस्व वसूली में पिछले वर्ष की तुलना में 24% की वृद्धि हुई और 2011-12 में भी राजस्व वसूली में 23% की वृद्धि हुई है। इसके अलावा, नियामक आयोग ने हर साल प्रशुल्क आदेश जारी किए हैं। इस वर्ष के दौरान, प्रशुल्क वृद्धि 7.17% थी, जबकि पिछले दो साल में यह बढ़ोतरी, क्रमशः 6.14% और 10.65% जितनी थी।

राज्य सरकार ने Discoms की वित्तीय पुनर्गठन योजना को मंजूरी दे दी, जिसमें निम्न बाते भी शामिल है:-

 

  • 1. मध्यप्रदेश सरकार के ऋण का सदा ऋण में रूपांतरण: मध्यप्रदेश सरकार द्वारा तीन वितरण कंपनियों के पास रुपये 8916 करोड़ का संचयी बकाया ऋण है। (कार्यशील पूंजी ऋण सहित)
  • 2. अगले तीन वर्षों के लिए देय ई डी और उपकर का सदा ऋण में रूपांतरण।
  • 3. सरदार सरोवर देय का सदा ऋण में रूपांतरण।
  • 4. कार्यशील पूंजी ऋण की ब्याज दर में 14% से भारतीय स्टेट बैंक की आधार दर तक कटौती। राज्य सरकार ने ग्वालियर, उज्जैन और सागर शहर के लिए भी निवेश आधारित वितरण फ्रेंचाइजी को मंजूरी दे दी है। उच्चतम मूल्य बोली के आधार पर, सफल बोलीदाताओं को LOA जारी किए गए। प्रथम वर्ष से ग्वालियर शहर का अनुमानित लाभ रुपये 1.26, प्रति यूनिट है। उज्जैन और सागर शहर से प्रथम वर्ष का अनुमानित लाभ प्रति यूनिट क्रमशः रुपये 0.536 और रुपये 0.736 जितना है।

उपयोगिताओं के नए संगठनात्मक ढांचे में, कंपनियों को अधिक प्रभावी और कुशल बनाने के लिए जनशक्ति की आवश्यकता का पुनर्गठन किया गया और नई रचना के साथ मानव संसाधन व्यय में 12% के वार्षिक व्यय की बचत हासिल की गई है।

Rहाल ही में, सभी तीनों Discoms के लिए राज्य की ट्रेडिंग कंपनी को होल्डिंग कंपनी बनाया गया है। होल्डिंग कंपनी बिजली की व्यवस्था करने में Discoms की सहायता करेगी। इससे अधिशेष की स्थिति के दौरान बिजली की बिक्री /संग्रह की संभावनाओं की खोज के द्वारा बिजली की खरीद के लिए अग्रिम योजना का लक्ष्य प्राप्त किया जाएगा। इससे बिजली की खरीद लागत को कम करने में प्रभावी रूप से सहायता मिलेगी।

सभी उपरोक्त उपायों द्वारा राज्य को बिजली के क्षेत्र में आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाने का मार्ग प्रशस्त होगा।

Fact File  

  Installed Capacity - Thermal

  2807.50 MW

  Installed Capacity - Hydel

  917.2 MW

  Installed Capacity - Total

  3724.7 MW

  EHT Lines

  27119 Ckt. km.

  HT Lines

  220455 km.

  LT Lines

  342388 km.

  Transmission Capacity

  8841 MW

  HT/LT Ratio

  0.65

  No. of Consumers

  96.32 Lakh

  No. of Agriculture Consumers

  13.97 Lakh

मध्यप्रदेश पावर ट्रांसमिशन कंपनी के गठन के बाद एशियाई विकास बैंक (एडीबी), पावर फाइनेंस कारपोरेशन (पीएफसी) और अन्य वित्तीय संस्थाओं से ऋण की मदद से पारेषण उपयोगिता प्रणाली की क्षमता में दुगुने से भी अधिक वृद्धि हो रही है। पिछले 9 वर्षों के दौरान पारेषण प्रणाली क्षमता में भी तेजी आ गई है। इस अवधि के दौरान, 107 नए अतिरिक्त उच्च वोल्ट (EHV) उप स्टेशनों को कमीशन किया गया है और 9625 ckt. किमी लाइनों को प्रणाली में जोड़ा गया है। इससे पारेषण प्रणाली की क्षमता 2002-03 की 3890 मेगावाट की तुलना में वर्तमान में 8841 मेगावाट तक वृद्धि हुई है। यह वृद्धि 127% जितनी है। पारेषण नुकसान भी 2002-03 में 7.93% की तुलना में वर्तमान में 3.51% तक कम हुआ है।

वर्ष 2005-06 में 400 केवी वाले इंदिरा सागर - इंदौर ट्रांसमिशन लाइन के कार्य को शीघ्रता से पूरा करने के लिए मध्यप्रदेश पावर ट्रांसमिशन कंपनी लिमिटेड को भारत सरकार की ओर से रजत पुरस्कार प्राप्त हुआ। मार्च 2008 में 220 केवी वाले पीथमपुर सबस्टेशन के काम को रिकार्ड समय में पूरा करने के लिए भी कंपनी को भारत सरकार का स्वर्ण पुरस्कार मिला है। इनके अलावा, वर्ष 2005-06 में एशिया पावर मैगजीन ने एशिया की सबसे अच्छी कंपनी के रूप में मध्यप्रदेश ट्रान्सको को सम्मानित किया। वर्ष 2006 में विद्युत क्षेत्र में सुधार के लिए इंडो टेक फाउंडेशन ने भी कंपनी को दूसरा पुरस्कार देकर सम्मानित किया। इसके अलावा, नवंबर 2011 में, किसी भी वित्तीय प्रतिबद्धता के बिना, प्रणाली में MVARs के परिसंचार में कमी कर, ट्रांसमिशन के नुकसान में कमी के लिए एक नवीन तकनीक के विकास के लिए नई दिल्ली की काउंसिल ऑफ पावर युटीलीटीज ने कंपनी को इंडिया पावर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मार्च 2012 में 220/132 केवी के कोटार सबस्टेशन की पारेषण परियोजनाओं को शीघ्र पूरा करने के उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए माननीय केन्द्रीय विद्युत मंत्री ने कंपनी को, बिजली के क्षेत्र में मेधावी प्रदर्शन के लिए रजत शील्ड के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया।

 

राज्य की वितरण उपयोगिताओं ने बहुपक्षीय और घरेलू वित्तीय संस्थानोंके संग, वित्तीय सहायता के करार के साथ, वितरण प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम शुरू किए हैं। महत्त्वपूर्ण काम में, तकनीकी और वाणिज्यिक घाटे को कम करने पर जोर दिया गया है।

नेटवर्क में सुधार के साथ बिजली आपूर्ति की गुणवत्ता और विश्वसनीयता में वृद्धि होगी, साथ ही तकनीकी घाटे में भी बडी मात्रा में कमी होगी। वितरण कंपनियों ने पहले से ही मौजूदा एल टी प्रणाली के उच्च वोल्टेज वितरण प्रणाली (HVDS) या एरीयल बन्च्ड केबलों में रूपांतरण का काम शुरू कर दिया है। इन कार्यों के कार्यान्वयन के साथ क्षेत्रों में सुधार होगा और नुकसान भी कम हो जाएगा।

ग्रामीण घरेलू उपभोक्ताओं के लिए बिजली की 24 घंटे निरंतर आपूर्ति और कृषि उपभोक्ताओं के लिए बिजली की गुणवत्तापूर्ण 8 घंटे निरंतर आपूर्ति प्रदान करने के लिए मध्यप्रदेश सरकार ने फीडर सेपरेशन स्कीम शुरू की है। दो चरणों में कुल 6262 फीडरों को विभाजित किया जाना है, जिसमें से मई 2012 तक 1496 को अलग किया गया है और 7419 गांवों को लाभान्वित किया गया है। पहले चरण के काम के लिए आरईसी से 1721.27 करोड़ रुपये की और दूसरे चरण के काम के लिए एडीबी से 1944.31 करोड़ रुपये की राशि का ऋण प्राप्त किया गया है। उपरोक्त के अलावा, मध्यप्रदेश सरकार ने जवाबी वित्त पोषण के रूप में 485 करोड़ रुपए भी प्रदान किए है। इस योजना को वित्तीय वर्ष 2013 में पूरा किया जाना है। इस योजना के पूर्ण होने के बाद इच्छुक ग्रामीण घरेलू उपभोक्ताओं को 24 घंटे निरंतर बिजली प्रदान की जाएगी, जो उनके रहने की स्थिति में सुधार लाएगी और जिसके कारण गांवों में नई औद्योगिक और वाणिज्यिक गतिविधियों के माध्यम से स्थानीय रोजगार उत्पन्न किया जाएगा।

चोरी पर अंकुश लगाने के लिए राज्य यूटिलिटीज, कानून प्रवर्तन एजेंसियों की सहायता के साथ समय समय पर अभियान चला रही हैं। पिछले 7 साल से ए टी एंड सी घाटा 15% से कम हो गया है। वित्तीय वर्ष 2013 के दौरान, इसे 3% से भी कम करना लक्षित है। बगैर मीटर के कनेक्शनों को मीटर लगाने का कार्यक्रम भी बड़े पैमाने पर शुरू किया गया है। एनर्जी ऑडिट के लिए 33 और 11 केवी फीडर पर मीटरींग प्रदान की गई है। DTR मीटरींग के माध्यम से ग्रामीण और कृषि उपभोक्ताओं को मीटर प्रदान करने की चुनौती अब समक्ष है।

प्रभावी राजस्व प्रबंधन, मीटरींग, बिलिंग और संग्रह (MBC) के लिए प्रणाली को नया रूप दिया जा रहा है। एक कम्प्यूटरीकृत राजस्व प्रबंधन प्रणाली (RMS) को विकसित किया गया है। संशोधित त्वरित विद्युत विकास और सुधार कार्यक्रम (RAPDRP) के तहत आईटी इंटरव्हेन्शन्स के माध्यम से एमबीसी को कवर किया गया है। सेंट्रल DISCOM में उद्यमी रिसोर्स प्लानिंग (ईआरपी) का कार्यान्वयन शुरू है और अन्य दो Discoms भी इसका पालन करेंगे। ईआरपी के वित्तीय, मानव संसाधन, सामग्री, रखरखाव और प्रबंधन मॉड्यूल चल रहे है।

 

नुकसान कम करने के लिए भारत के 30000 और उससे अधिक आबादीवाले सभी 82 शहरों/कस्बों में सरकार की RAPDRP का कार्यान्वयन जारी है। योजना के दो हिस्से है। पहले ‘अ' हिस्से में, एनर्जी ऑडिट को सुविधाजनक बनाने के लिए 83 शहरों में आईटी ढांचे को स्थापित किया जा रहा है। भारत सरकार ने परियोजना को मंजूरी दे दी है और कार्यान्वयन के लिए एम/एस टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेस को नियुक्त किया गया है। इस परियोजना की लागत 228.76 करोड़ रुपये है, जिसमें से 75.44 करोड़ रुपये का उपयोग किया गया है।

आधारभूत जानकारी की तैयारी, जीआईएस मानचित्रण, वितरण ट्रांसफार्मर और फीडरों की मीटरींग, सभी वितरण ट्रांसफार्मर और फीडरों के लिए स्वचालित डेटा प्रवेश, पर्यवेक्षण नियंत्रण और डाटा अधिग्रहण/डाटा प्रबंधन प्रणाली (एससीएडीए / डीएमएस) प्रणाली आदि कार्य प्रगति पर हैं। दूसरे ‘ब' हिस्से में, ढांचे को मजबूत करने का काम 82 शहरों/कस्बों में किया जाएगा। इन शहरों/कस्बों की योजना के लिए 2036.43 वें करोड़ रुपये मंजूर किए गए है। इन कार्यों के माध्यम से, इन शहरों/कस्बों की सकल तकनीकी और वाणिज्यिक (एटी एंड सी) हानि के स्तर को 15% और उससे नीचे लाया जाएगा।

 

ग्रामीण विद्युतीकरण

 

राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना (आरजीजीवीवाई) के तहत 953 बिजली रहीत गांवों का विद्युतीकरण और 49,369 गांवों का पूर्ण विद्युतीकरण किया जाना प्रस्तावित है। राज्य के सभी 50 जिलों को कवर करती 2500 करोड़ रुपए लागतवाली 48 योजनाएं और बालाघाट, छतरपुर, सतना और सीधी इन 4 जिलों के लिए 108 करोड़ रुपए लागतवाली अनुपूरक योजनाएं आरईसी लिमिटेड को प्रस्तुत कर दी गई है। आरईसी ने सभी 52 योजनाएं स्वीकृत की है। 32 योजनाओं के विद्युतीकरण का काम प्रगति पर है। हाल ही में स्वीकृत 16 योजनाओं का काम सौंप दिया गया है और 4 नई शेष मंजूर अनुपूरक योजनाओं का काम प्रक्रिया के अधीन है। अब तक 516 बिजली रहीत गांवों का विद्युतीकरण किया गया है। इसके अलावा, 18,738 विद्युतीकृत गांवों का पूर्ण विद्युतीकरण किया गया और 9.58 लाख घरों का विद्युतीकरण किया गया, जिनमें 7.54 लाख बीपीएल परिवार शामिल हैं।

 

अनुदान योजना

 

किसानों को कृषि पंपों के लिए स्थायी कनेक्शन उपलब्ध कराने के लिए राज्य सरकार ने अनुदान योजना शुरू की है। इस अनुदान योजना के तहत राज्य सरकार हर लाभार्थी को पंप कनेक्शन के लिए 1.5 लाख रुपये तक अनुदान प्रदान करती है। छोटे और सीमांत किसानों को रू. 5500/HP की दर से जबकि अन्य किसानों को रू. 8800/HP की दर से योगदान करना पडता है। 1.5 लाख रुपए से अधिक की अनुमानित राशि का भुगतान भी किसानों को करना पडता है। योजना मार्च 2013 तक उपलब्ध है, जिसकी अवधी जरूरत पडने अगले साल तक यानी, 2013-14 के लिए भी बढ़ा दी जा सकती है। अब तक इस योजना के तहत 12,000 से अधिक पंप दिए जा चुके है।

आपूर्ति और राजस्व वसूली की लागत के बीच के अंतर के कारण क्षेत्र में वित्तीय तनाव बना हुआ है और कंपनियां भी परिचालन व्यय को पूरा करने में सक्षम नहीं रही है। इसी वजह से राज्य सरकार से सहायता की जरूरत महसूस हुई है। इसके अलावा, बढ़ते घाटे के कारण बाजार से ताजा वित्तीय संसाधन जुटाने में भी समस्याएं आती है। सुधार कार्यक्रम के तहत, राज्य सरकार कार्यशील पूंजी, इक्विटी इन्फ्युजन और ऋणों के पुनर्गठन के माध्यम से कंपनियों के लिए वित्तीय सहायता प्रदान कर रही है।

बिजली व्यापार को विनियमित करने और उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए राज्य में एक स्वतंत्र विद्युत नियामक आयोग स्थापित किया गया है। नई पारदर्शी टैरिफ निर्धारण की प्रक्रिया जनता की भागीदारी को आमंत्रित करती है, जो सुनवाई के माध्यम से उपयोगिता के संचालन की सार्वजनिक लेखापरीक्षा को सुनिश्चित करती है। विद्युत अधिनियम आयोग एक चरणबद्ध तरीके से विद्युत शुल्कों को युक्तिसंगत करने की दिशा में काम करता है। वर्तमान में, इस क्षेत्र में समग्र पार सब्सिडी राष्ट्रीय टैरिफ नीति में परिकल्पित सीमा के भीतर है।

उपभोक्ता सेवाओं की गुणवत्ता बढ़ाना, विद्युत क्षेत्र में सुधार का उद्देश्य है। यूटिलिटीज ने ग्राहक देखभाल की दिशा में दुबारा ध्यान केंद्रित किया है और इस दिशा में कई उपाय शुरू किए गए हैं, जिसमें व्यावसायिक प्रक्रियाओं को सरल बनाना, स्पॉट बिलिंग, ऑल टाइम पेमेंट मशीनों की स्थापना, बिल का ऑनलाइन भुगतान, कॉल सेंटर की स्थापना, फ्यूज ऑफ कॉल की दैनिक समीक्षा, और बिलिंग शिकायतों का निवारण तंत्र आदी शामिल है। सभी Discoms ने उपभोक्ता शिकायत निवारण मंच भी गठित किया है।

 

कुशल प्रबंधन के लिए स्वतंत्र कंपनियां

 

बिजली क्षेत्र के कुशल प्रबंधन, वितरण और पारेषण प्रणाली की गुणवत्ता में सुधार और विद्युत उत्पादन क्षमता में वृद्धि के लिए मध्यप्रदेश सरकार ने छह स्वतंत्र कंपनियों का गठन किया है। इन छह कंपनियों में से तीन कंपनियां क्रमशः विद्युत उत्पादन, पारेषण और ट्रेडिंग के लिए समर्पित हैं। बाकी तीन कंपनियां उनके भौगोलिक क्षेत्रों में बिजली की आपूर्ति और वितरण के लिए जिम्मेदार हैं। पावर ट्रेडिंग कंपनी, जिसका नाम मध्यप्रदेश पावर मैनेजमेंट कंपनी लिमिटेड है, उसे सभी तीन Discoms के लिए होल्डिंग कंपनी बना दिया गया है।

कंपनी अधिनियम, 1956 के प्रावधानों के तहत यह कंपनियां अपने संबंधित क्षेत्रों में स्वतंत्र रूप से कार्य करती हैं।

इससे पहले, एमपीएसईबी संगठन ही बिजली के उत्पादन, पारेषण और वितरण से संबंधित सभी काम अकेले करता था। एमपीएसईबी की बढती जिम्मेदारियां, इस क्षेत्र में नुकसान के स्तर में वृद्धि और उपभोक्ता सेवाओं की गुणवत्ता में गिरावट के लिए जिम्मेदार कारकों में से एक था।

एमपीएसईबी के सभी तापीय व पनबिजली निर्माण स्टेशन अब मध्यप्रदेश पावर जनरेटिंग कंपनी लिमिटेड के तहत आ गए हैं। पारेषण प्रणाली और राज्य लोड डिस्पैच सेंटर भी मध्यप्रदेश पावर ट्रांसमिशन कंपनी लिमिटेड के नियंत्रण के तहत आ गए हैं। बिजली की थोक बिक्री, खरीद, और होल्डींग फंक्शन्स अब मध्यप्रदेश पावर मैनेजमेंट कंपनी लिमिटेड ही कर रही हैं।

जबलपुर, रीवा और सागर कमीशनरीज को बिजली आपूर्ति और वितरण का काम मध्यप्रदेश पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी को सौंपा गया है जिसका मुख्यालय जबलपुर, मध्यप्रदेश में है। इंदौर और उज्जैन कमीशनरीज को बिजली आपूर्ति और वितरण का काम पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड को सौंपा गया है, जिसका मुख्यालय इंदौर में है। साथ ही, भोपाल और ग्वालियर को बिजली आपूर्ति और वितरण का काम मध्यप्रदेश मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड - भोपाल को सौंपा गया है।

 

निजी बिजली विकासकों को प्रोत्साहन

 

बिजली की कमी की समस्या को दूर करने के लिए राज्य सरकार निजी निवेशकों को बिजली संयंत्रों की स्थापना के लिए प्रोत्साहित कर रही है। तापीय, पनबिजली, पवन और सौर ऊर्जा उत्पादन में भारी अवसर उपलब्ध है और सरकार मध्यप्रदेश में निजी उद्यम की सहायता करने के लिए उत्सुक है। मध्यप्रदेश सरकार ने निजी निवेशकोंद्वारा राज्य में तापीय विद्युत परियोजनाओं की स्थापना के लिए उन्हें सुविधा प्रदान करने हेतु उनके साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं।

सरकार परियोजनाओं के लिए जमीन और पानी के लिए सहायता प्रदान कर रहा है।

यह उल्लेख करना प्रासंगिक है कि वित्तीय वर्ष 2006 के बाद उद्योगों को स्वतंत्र फीडर द्वारा पुरे दिन, चौबिस घंटे बिजली की आपूर्ति उपलब्ध कराई जा रही है। राज्य में एक अल्ट्रा मेगा पावर प्रोजेक्ट (UMPP) का कार्य भी प्रगति पर है। इस परियोजना की पहली इकाई को वित्तीय वर्ष 2013 में चालू करने की योजना है।

अल्ट्रा मेगा पावर परियोजना (UMPP) - सासन पावर लिमिटेड

  • 1. भारत की पहली अल्ट्रा मेगा पावर परियोजना।
  • 2. सासन UMPP भारत की सबसे बड़ी एकीकृत पिटहेड कोयला आधारित बिजली परियोजना है।
  • 3. मध्यप्रदेश के सिंगरोली जिले में 3960 मेगावाट का अति महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी आधारित, पिटहेड कोयला आधारित बिजली उत्पादन संयंत्र।
  • 4. परियोजना की अनुमानित लागत १९,४०० करोड़ रुपए।
  • 5. सासन बिजली द्वारा सात राज्यों को रू.1.196/KWh की अब तक की सबसे कम दर में बिजली की आपूर्ति होगी। इनमें मध्यप्रदेश, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, नई दिल्ली, राजस्थान और उत्तराखंड शामिल है।
  • 6. मध्यप्रदेश का हिस्सा -1485 मेगावाट।

 

नए और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का विकास

 

पारंपरिक ईंधन की निरंतर कमी के मद्देनजर, नए गैर पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों के उभरते हुए क्षेत्र के महत्व को देखते हुए मध्यप्रदेश सरकार गैर-परंपरागत ऊर्जा विकास कार्यक्रमों पर करीब से ध्यान दे रहा है। विकास, परीक्षण और प्रौद्योगिकियों के विभिन्न प्रकार शामिल कर विभिन्न कार्यक्रम चलाए गए है और भविष्य के लिए प्रयास जारी हैं।

 

पवन बिजली उत्पादन परियोजनाएं

राज्य में 5500 मेगावाट पवन बिजली निर्माण करने की क्षमता है। इस उद्देश्य के लिए कुल नौ स्थानों को पहचाना गया है, जिनकी क्षमता 1200 मेगावाट है। इनमें से 170 मेगावाट की परियोजनाओं को जून 2010 तक पहले से ही स्थापित किया गया है। इन परियोजनाओं ने मार्च 2010 तक 75 करोड़ यूनिट बिजली का उत्पादन किया है। इसके अलावा, विभिन्न निजी बिजली उत्पादन इकाइयों से 780 मेगावाट क्षमता की पवन विद्युत उत्पादन परियोजनाओं के प्रस्ताव भी प्राप्त हुए है।

हवा निगरानी कार्यक्रम

पवन बिजली उत्पादन हेतु नए स्थलों की खोज के लिए, सतना, बैतूल और रायसेन में हवा निगरानी कार्यक्रम चल रहे हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ निजी एजेंसियां भी धार, नीमच, रतलाम, राजगढ़, सीहोर, दमोह और मंदसौर जिलों के 20 स्थलों पर हवा निगरानी कार्यक्रम चला रही है।

बायोमास बिजली उत्पादन परियोजनाएं

राज्य में निजी भागीदारी के साथ 550 मेगावाट क्षमता की बायोमास बिजली उत्पादन का मूल्यांकन किया गया है। राज्य में बायोमास बिजली उत्पादन को बढ़ाने के प्रयास में, निजी उद्यमों से प्राप्त तकरीबन 435 मेगावाट के प्रस्तावों को पंजीकृत किया गया है, जिसमें से 100 मेगावाट के प्रस्ताव विचाराधीन हैं। अब तक, 25 मेगावाट के बायोमास बिजली उत्पादन की परियोजनाओं का काम चल रहा हैं। यहां उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार ने वर्ष 2007 में बायोमास से उत्पन्न बिजली की दरों का फैसला किया है। तब से, मध्यप्रदेश ऊर्जा विकास निगम इस क्षेत्र में निजी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए ईमानदारी से प्रयास कर रहा है।

सौर बिजली उत्पादन परियोजनाएं

सौर ऊर्जा उत्पादन में असीम अवसर देखते हुए मध्यप्रदेश ऊर्जा विकास निगम इस क्षेत्र की अधिकतम क्षमता को साकार करने के लिए निजी निवेश को आकर्षित करने के प्रयासों में जुट गई है। जवाहर लाल नेहरू सौर मिशन परियोजना द्वारा जारी निर्देशों के अनुसार निगम ने 20 मेगावाट की सौर ऊर्जा परियोजनाओं के पूर्व-पंजीकरण का काम पूरा कर लिया है और 20 मेगावाट क्षमता की परियोजनाओं के लिए 13 निजी इकाइयों का चयन भी किया है।

इस कार्यक्रम को प्रोत्साहन देने के लिए राजगढ़ में एक सौर पार्क की स्थापना की जा रही है, जहां निजी इकाइयों को अपने सौर बिजली उत्पादन संयंत्र स्थापित करने के लिए भूमि उपलब्ध कराई जाएगी। सौर पार्क में सौर अनुप्रयोगों और उनके कोडांतरण आदि में इस्तेमाल उपकरणों के उत्पादन की सुविधा भी होगी।

राज्य की सौर ऊर्जा नीति का मसौदा तैयार करने की प्रक्रिया भी जारी है, जिसके कार्यान्वित होने पर इस क्षेत्र में तेजी से प्रगति के लिए निजी निवेश की राह आसान हो जाएगी।

राज्य ऊर्जा नियामक बोर्ड द्वारा सौर ऊर्जा की खरीद दर के निर्धारण में मध्यप्रदेश ऊर्जा विकास निगम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

  • 1. सौर फोटोवोल्टिक पावर संयंत्र (31 मार्च, 2012 तक पूरा किया जाएगा) - रु. 15.15 प्रति यूनिट।
  • 2. सौर तापीय पावर संयंत्र (31 मार्च, 2013 तक पूरा किया जाएगा) - रु. 11.26 प्रति यूनिट।
  • 3. दो मेगावाट के रूफ टॉप और अन्य की छोटे बिजली संयंत्र, (31 मार्च 2013 तक पूरा किया जाएगा) - रु. 15.49 प्रति यूनिट।

सौर फोटो वोल्टिक विद्युत कार्यक्रम

स्ट्रीट लाइट, घर के लिए सौर उर्जा जैसे उपकरणों के विकास द्वारा ग्रामीण ऊर्जा की मांग को पूरा करने के लिए राज्य में भी गैर-परंपरागत ऊर्जा स्रोतों के विकास कार्यक्रम चलाए जा रहे है। आम तौर पर, ऐसे संयंत्रों के अनुप्रयोगों की स्थापना के लिए सांसद/विधायक/जिला प्रशासन/ ग्राम पंचायत विकास के निधि की इकट्ठा राशि को लाभार्थियों की मार्जिन राशि के रूप में सहायता स्वरूप प्रदान किया जाता है।

अक्षय ऊर्जा स्रोत मंत्रालय भी सौर फोटोवोल्टिक कार्यक्रम के तहत संयंत्रों के लिए अनुदान प्रदान करता है। अब तक, इस कार्यक्रम के तहत तकरीबन 217 सौर लालटेन, 1659 सौर स्ट्रीट लाइट्स और 1677 घरेलु सौर लाइट्स स्थापित या वितरित किए गए है।

सौर गर्म जल संयंत्र

सूर्य से गर्म जल पाने के लिए यह एक आदर्श तकनीक है। इस तकनीक के साथ, पानी को 800 सेंटीग्रेड तक गर्म किया जा सकता है। सौर गर्म जल के लिए अब तक 1.30 लाख लीटर के जल संयंत्रों को स्थापित किया गया है। 100 एलपीडी के साथ स्थापित एक संयंत्र प्रति वर्ष बिजली 1500 युनीट बचाता है।

विशेष क्षेत्रों का विकास

भारत सरकार द्वारा प्रायोजित एक कार्यक्रम के तहत ऐतिहासिक/वास्तु/पर्यटन महत्व |

निजी निवेशकों के लिए अवसर

मध्यप्रदेश सरकार अक्षय ऊर्जा कार्यक्रमों पर विशेष जोर दे रही है और गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों के पूरे स्पेक्ट्रम में अधिक आक्रामक तरीके से प्रौद्योगिकी के नए क्षेत्रों में काम कर रही है। इससे पवन, सौर, फोटोवोल्टिक, बायोमास, सौर तापीय, छोटी पनबिजली, औद्योगिक अपशिष्ट आधारित परियोजनाओं और अन्य अक्षय ऊर्जा आधारित प्रणालियों और विकेन्द्रीकृत अनुप्रयोगों के उपकरणों के क्षेत्र में असीम अवसर प्राप्त होते है।

 

नई सौर ऊर्जा नीति - 2012 के कार्यक्रम

 

कार्यक्रम

नए संयंत्रों को चयनित स्थानों पर स्थापित किया जाना प्रस्तावित है। यह नई नीति 10 साल के लिए बिजली शुल्क और उपकर में छूट, व्हीलिंग शुल्क में चार प्रतिशत सब्सिडी, उत्पादित बिजली की बैंकिंग तथा तीसरे पक्ष द्वारा बिजली खरीद के मामले में अनुबंध की मांग में कमी के लिए पात्रता प्रदान करता है। प्रति नियमों के अनुसार वैट और प्रवेश कर में छूट और निजी भूमि की खरीद पर स्टांप शुल्क में 50 प्रतिशत छूट की पेशकश की जाएगी। प्रत्येक 200 मेगावाट क्षमता के चार सौर पार्क स्थापित किए जाएंगे। पीपीपी मोड के तहत निर्माण शुरू किया जाएगा।

 

सौर परियोजनाओं को चार श्रेणियों में चयनित किया गया है |

  • पहली : खुली निविदा के आधार पर मध्यप्रदेश राज्य विद्युत वितरण कंपनी या मध्यप्रदेश राज्य विद्युत प्रबंधन कंपनी द्वारा परियोजनाओं का चयन।
  • दूसरी : परियोजना, जो मुक्त खरीद के माध्यम से राज्य के भीतर या बाहर स्वतंत्र पहुँच द्वारा बिजली को बेच देंगे।
  • तीसरी : जो अक्षय ऊर्जा प्रमाणपत्र विधि के माध्यम से स्थापित की जाए।
  • चौथी : राष्ट्रीय जवाहर लाल नेहरू सोलर मिशन के तहत स्थापित की जानेवाली परियोजनाएं।

परियोजनाओं की समयबद्ध स्थापना सुनिश्चित करने के लिए नीति प्रदर्शन गारंटी डिपॉजीट प्रदान करता है। नीति में प्रस्तावित लाभ प्राप्त करने के लिए अधिकतम निर्माण क्षमता 100 मेगावाट निर्धारित की गई है। तीन मेगावाट प्रति हेक्टेयर की दर पर शासकीय भूमि उपलब्ध कराने का प्रावधान है। देश की सबसे बड़ी 130 मेगावाट क्षमता वाली एकल सौर परियोजना नीमच जिले में निर्माणाधीन है।

 

 

Content Courtesy : MP Madhyam.