जल

जल के बारहमासी स्रोत

जल, जीवन का आधार और समग्र विकास को बनाए रखनेवाला एक महत्वपूर्ण संसाधन हैं, जो मध्यप्रदेश की प्रायद्वीपीय नदियां वर्षा-आधारित होने के बावजूद, भाग्यवश, यहां प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। वर्तमान में, 81.50 लाख हेक्टेयर मीटर औसत सतह पानी उपलब्ध है, जिसमें दस प्रमुख नदी-घाटियां योगदान देती है। इनमें उत्तर घाटियों में चंबल, बेतवा, सिंध, और केन, पूर्व में सोन और टोन्स, दक्षिण में नर्मदा और बेनगंगा और मध्य तथा पश्चिम में माही और ताप्ती नदी की घाटियां शामिल है। इसके अलावा, राज्य में 34.50 लाख हेक्टेयर मीटर भूगर्भ जल उपलब्ध है। इस प्रकार, राज्य में पानी की कुल उपलब्धता 116 लाख हेक्टेयर मीटर है, जो 113 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई अच्छी तरह कर सकती है।

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मध्यप्रदेश में सिंचाई के विकास का इतिहास आजादी-पूर्व समय से शुरू होता है। वर्ष 1927 में ग्वालियर जिले में पगारा बांध के निर्माण कार्य के पूर्णत्त्व के साथ पहली बड़ी सफलता हासिल हुई थी। भोपाल के पालकमती और बालाघाट जिले के मुरूम नल्ला में क्रमश: 1933 और 1936 में सिंचाई टैंक का निर्माण किया गया। वर्ष 1940-44 के दौरान, तत्कालीन ग्वालियर राज्य में शांक-आसन परियोजना, काकेतो बांध, आओदा बांध, हारशी बांध और तिगरा बांध का निर्माण किया गया। इन परियोजनाओं के कारण 1.70 लाख एकड़ जमीन सिंचाईयोग्य बनी।

आजादी से पहले, केवल जल के अभाव के पहलू को ध्यान में रखते हुए सिंचाई कार्य निष्पादित किये गये। जब तक पहले से पूर्ण योजनाओं के प्रतिफल द्वारा, उन पर किए गए निवेश को उचित रूप से प्राप्त नही किया जाए, तब तक मध्य प्रांत सिंचाई समिति (1927-29) ने नए सिंचाई कार्य पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। इससे सिंचाई गतिविधियां लगभग बंद हो गई, जो वर्ष 1951-52 में एक नए विकास के युग में शुरू कर दी गई।

वर्ष 1950-51 से पहले, राज्य में 4.69 लाख हेक्टेयर की सिंचाई क्षमता वाली 2 बड़ी, 18 मध्यम और 618 लघु सिंचाई परियोजनाएं थी। वर्ष 1956 में मध्यप्रदेश के पुनर्गठन के समय राज्य में 4.84 लाख हेक्टेयर सिंचाई क्षमता वाली 3 बड़ी, 37 मध्यम और 948 लघु सिंचाई परियोजनाएं थी। आनेवाले वर्षों में सिंचाई के विकास ने रफ्तार पकड़ ली और परिणामस्वरूप वर्ष 1984-85 में राज्य में 17 बड़ी, 109 मध्यम और 4991 लघु सिंचाई योजनाओं के साथ 24.52 लाख हेक्टेयर क्षेत्र सिंचाईयोग्य बन गया। वर्ष 1997-98 में किसानों की जरूरतों को पूर्ण करते हुए 22 बड़ी, 134 मध्यम और 6190 लघु सिंचाई परियोजनाओं के साथ राज्य की सिंचाई क्षमता 33.04 लाख हेक्टेयर जितनी बढ गई।

वर्ष 2000 में मध्यप्रदेश के विभाजन के बाद 14 बड़ी, 103 मध्यम और 3275 लघु परियोजनाओं के साथ मध्यप्रदेश में अब 20.40 लाख हेक्टेयर की सिंचाई क्षमता का क्षेत्र उपलब्ध है। वर्तमान में, राज्य में 12 बड़ी, 89 मध्यम और 4506 मामूली परियोजनाएं पूर्ण हो गई है। पूर्वोक्त रूप से पूर्ण परियोजनाओं के अलावा 8 बड़ी, 35 मध्यम और 676 लघु परियोजनाएं निर्माण के विभिन्न चरणों में हैं। इन योजनाओं के पूर्ण होने के बाद, 10.46 लाख हेक्टेयर क्षेत्र के लिए सिंचाई सुविधा प्रदान की जाएगी।

भूजल के विनाशक उपयोग सहित राज्य के जल संसाधनों के समग्र विकास का काम जल संसाधन विभाग को सौंपा गया है। मध्यप्रदेश की भूमि पड़ोसी राज्यों द्वारा अवरोधित है तथा वहां कोई समुद्र किनारे भी नही है और इसलिए, नदियों के प्रवाह का समुद्र से संगम होने से पहले वे अन्य राज्यों से गुजरती है, जिसके कारण यह जल-संपत्ती, तटवर्ती जल विवादों का विषय बन गई है। राज्य को जल संसाधनों की कमी नहीं है। मध्यप्रदेश के हित में उपलब्ध संसाधनों का इष्टतम प्रयोग करने के लिए जल संसाधन विभाग कडे प्रयास कर रही है।

नर्मदा : समृद्धि की नदी

नर्मदा नदी को मध्यप्रदेश की जीवन रेखा के रूप में जाना जाता है। यह अनूपपुर जिले में अमरकंटक से निकलती है। अरब सागर तक इसकी कुल लंबाई 1312 किमी है और मध्यप्रदेश में 1077 किमी क्षेत्र पर इसका प्रवाह बहता है। यह नदी पश्चिम की ओर बहती है और मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात से गुजरती है। नर्मदा नदी अंतर-राज्य होने के कारण भारत सरकार ने वर्ष 1969 में नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण (NWDT) का गठन किया, जिसने नदी के कुल 18.25 लाख एकड़ फुट पानी में से मध्यप्रदेश के लिए कुल 28 लाख एकड़ फीट पानी आवंटित किया। मध्यप्रदेश में नर्मदा नदी की जल विद्युत क्षमता 3196.5 मेगावाट है, जिसमें से 2475 मेगावाट का उपयोग किया गया है और शेष क्षमता का समुपयोजन विभिन्न चरणों में है।

नर्मदा के पानी का अधिकतम उपयोग करने के लिए NWDT की सिफारिशों के अनुसार मध्यप्रदेश सरकार ने 3201.4 मेगावाट बिजली उत्पादन और 27.55 लाख हेक्टेयर सिंचाई क्षमता को साकार करने के लिए 29 बड़ी, 135 मध्यम और 3000 लघु परियोजनाओं के निर्माण की परिकल्पना की है।

नर्मदा जल विद्युत के विकास के लिए नदी पर शुरू कई परियोजनाएं राज्य के ऊर्जा परिदृश्य में एक बड़ा परिवर्तन ले आएंगी। ‘इंदिरा सागर परियोजना' मध्यप्रदेश में सबसे बड़ी पनबिजली परियोजना है, जो भारत में सबसे बड़ी पानी भंडारण क्षमता (12.22 Bm3) रखती है और जो मध्यप्रदेश की ओंकारेश्वर और महेश्वर तथा गुजरात की सरदार सरोवर जैसी अधोगामी परियोजनाओं को सनातन रूप से पानी की विनियमित आपूर्ति सुनिश्चित करती है।

 

एनएचडीसी - लींचपीन पनबिजली विकासक

1 अगस्त 2000 को नर्मदा हाइड्रोइलेक्ट्रिक डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एनएचपीसी और मध्यप्रदेश सरकार का एक संयुक्त उद्यम) स्थापित किया गया। इसका कारपोरेट कार्यालय भोपाल (मध्यप्रदेश) में है। एनएचडीसी को इंदिरा सागर परियोजना (1000 मेगावाट) और ओंकारेश्वर परियोजना (520 मेगावाट) के निर्माण का कार्य सौंपा गया है। हाइड्रो पावर परियोजनाओं को अवधारणा से पहले पूरा करने की प्रौद्योगिकी में एनएचडीसी ने महारत हासिल किया है। पनबिजली क्षमता के मामले में, यह राज्य में, जल विद्युत विकास का सबसे बड़ा संगठन है।

तेज गति से और सस्ते एवम् विश्वसनीय बिजली उत्पन्न के लिए सभी नवीनतम प्रौद्योगिकियों को अपनाते हुए, निर्धारीत अवधि के भीतर बिजली परियोजनाओं का विकास कर, उनके द्वारा सामाजिक-आर्थिक उत्थान सुनिश्चित कर, पर्यावरण और पारिस्थितिकी के संरक्षण के सभी पहलुओं की रक्षा करते हुए इन विस्तृत परियोजनाओं की प्रारंभिक व्यवहार्यता, नियोजन, जांच, अनुसंधान, रचना, रिपोर्ट और रखरखाव सहित पनबिजली स्टेशनों और परियोजनाओं के निर्माण, संचालन और रखरखाव तथा पनबिजली स्टेशन पर उत्पन्न बिजली की बिक्री सुनिश्चित करते हुए मध्यप्रदेश में पनबिजली और अन्य अक्षय ऊर्जा क्षमता के विकास प्रति एनएचडीसी प्रतिबद्ध है।

 

एनएचडीसी की प्रमुख परियोजनाएं

इंदिरा सागर परियोजना

इंदिरा सागर परियोजना मध्यप्रदेश के खंडवा जिले में पुनासा गांव से 10 किमी दूरी पर स्थित है। यह नर्मदा नदी पर स्थित 1000 मेगावाट की अधिष्ठापित क्षमता वाली एक बहुउद्देशीय परियोजना है। वर्ष 2004-05 में इस पनबिजली परियोजना को पूरा किया गया और जनवरी 2004 से यहां बिजली उत्पादन शुरू कर दिया गया। इसकी बिजली उत्पादन क्षमता 1980 एमयू है। तथा परियोजना की लागत 4355.57 करोड़ रुपये है। इस परियोजना के ठोस भार वाली बांध की लंबाई 653 मीटर और अधिकतम ऊंचाई (गहरी नींव के स्तर से ऊपर) 92 मीटर जितनी है।

उपरी विद्युत गृह नदी के दाहिने किनारे पर स्थित है, जिसमें 125 मेगावाट क्षमता के 8 टर्बाइन, मशीन हॉल, सेवा खाड़ी और ट्रांसफॉर्मर मौजूद है। जल संवाहक प्रणाली में 2200 घन मीटर पानी की क्षमता के साथ 530 मीटर लंबाई, 75 मीटर चौड़ाई और 50 मीटर गहराई वाला एक हेड रेस चैनल होता है। पानी 8 मीटर व्यास और 157 मीटर लंबाई वाले प्रत्येक 8 जलप्रणाली के द्वारा ‘सेवन संरचना' से टर्बाइन में प्रवेश करता है। प्रत्येक जलप्रणाली की जल प्रवाह क्षमता 275 घन मीटर है। बिजली उत्पादन के बाद पानी को 850 मीटर लंबी टेल रेस चैनल के माध्यम से नर्मदा नदी में वापस छोड दिया जाता है।

915 वर्ग किमी पर फैले इस जलाशय की क्षमता 12.2 अरब घन मीटर है, जो पूरे एक वर्ष के लिए भारत के 100 करोड़ लोगों की पानी की घरेलू जरूरत के लिए पर्याप्त है। यह भारत का सबसे बड़ा जलाशय है, जो भाखड़ा जलाशय से 1.25 गुना बड़ा है।

 

पुनर्वास और पुनर्स्थापन

आईएसपी जलाशयों के कारण कई गांव जलमग्न क्षेत्रों के तहत आ गए हैं। परियोजना के लिए पुनर्वास और पुनर्स्थापन नीति के अनुसार ही प्रभावित परिवारों का पुनर्वास और पुनर्स्थापन (पीएएफ) किया गया है।

मध्यप्रदेश के खंडवा, हरदा और देवास जिलों के कुल 249 गांव जलमग्नता की वजह से प्रभावित हुए है, जिनमें पूरी तरह से प्रभावित गावों की संख्या 156 और आंशिक रूप से प्रभावित गावों की संख्या 174 हैं। हरसूद नाम का एक शहर भी जलमग्नता के तहत है। कुल 40289 परिवार इससे प्रभावित हुए हैं।

परियोजना प्रभावित परिवारों के पुनर्वास के लिए ४२ पुनर्वास क्षेत्रों को विकसित किया गया है। स्कूल, औषधालय, अस्पताल, सामुदायिक केंद्र, बाजार, पूजा स्थल, पानी, बिजली आदि बुनियादी सुविधाओं को इन क्षेत्रों में उपलब्ध किया गया है। इन परियोजना प्रभावित परिवारों के पुनर्वास के लिए राज्य सरकार द्वारा गठीत पुनर्वास नीति का सख्ती से पालन किया जा रहा है, जिसमें पुनर्वास अनुदान, संपत्ति के लिए मुआवजा, भूमि-हीन परिवारों के लिए भूखंड, परिवहन आदि सुविधाएं शामिल है।

नर्मदा नगर आईटीआई में परियोजना प्रभावित परिवारों के लिए विभिन्न व्यापारों का व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है। परियोजना प्रभावित परिवारों की महिलाओं और लड़कियों के लिए एनएचडीसी ने एक व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थान भी शुरू किया है। परियोजना कर्मियों और आसपास के क्षेत्रों के बच्चों को शिक्षा प्रदान करने के लिए इंदिरा सागर परियोजना, नर्मदा नगर के क्षेत्र में जून 2001 में 12 वीं कक्षा तक केन्द्रीय विद्यालय शुरू किया गया।

 

ओंकारेश्वर परियोजना

ओंकारेश्वर परियोजना एक बहुउद्देशीय परियोजना है, जो मध्यप्रदेश के खंडवा, खरगांव और धार जिले में नर्मदा नदी के दोनों तटों पर बिजली उत्पादन और सिंचाई के अवसर प्रदान करती है। यह परियोजना इंदौर से 80 किमी की दूरी पर और इंदिरा सागर परियोजना के 40 किलोमीटर नीचे की ओर स्थित है।

ओंकारेश्वर परियोजना की कुल अधिष्ठापित क्षमता 520 मेगावाट है। परियोजना की सभी 8 इकाइयों ने मंजूर कार्यक्रम से आगे चलते हुए नवम्बर 2007 से बिजली का निर्माण शुरू कर दिया है। 2224.73 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत के साथ, परियोजना की अपेक्षित ऊर्जा उत्पादन क्षमता 1167 एमयू है। इस परियोजना के ठोस भार वाली बांध की लंबाई 949 मीटर और अधिकतम ऊंचाई (गहरी नींव के स्तर से ऊपर) ५३ मीटर जितनी है। परियोजना का उपरी विद्युत गृह, नदी के दाहिने किनारे के बांध के भीतर है, जहां फ्रांसिस टरबाइन के साथ प्रत्येक 65 मेगावाट क्षमता वाली 8 इकाइयां मौजूद है। 7.66 व्यास की 8 जलप्रणालीयों के माध्यम से जल टरबाइन तक लाया जाता है। बिजली उत्पादन के बाद पानी को 212मीटर लंबी टेल रेस चैनल के माध्यम से नदी में वापस छोड दिया जाता है।

प्रस्तावित बांध का कुल जलग्रहण क्षेत्र 64880 वर्ग किमी है, जिसमें 3238 वर्ग किमी इंदिरा सागर परियोजना के तहत है।

 

नहर प्रधान विद्युत गृह

  • इंदिरा सागर नहर प्रधान विद्युत गृह - नहर के जल निर्वहन का उपयोग करने के लिए 3x5 मेगावाट क्षमता के एक विद्युत गृह का निर्माण किया गया है और दिसम्बर 2010 से यहां उत्पादन शुरू किया गया है। इस विद्युत गृह से उत्पन्न बिजली का उपयोग पुनासा उन्नत सिंचाई योजना में किया गया है।
  • ओंकारेश्वर नहर प्रधान विद्युत गृह - बाएं किनारे के नहर पर 2x1.75 मेगावाट का एक विद्युत गृह प्रस्तावित है। टर्नकी आधार विद्युत गृह के निष्पादन का काम सौंपने के लिए एजेंसी के चयन की प्रक्रिया चल रही है। इस विद्युत गृह से उत्पन्न बिजली का उपयोग ओंकारेश्वर उन्नत सिंचाई योजना में किया गया है।

 

ऊपरी नर्मदा क्षेत्र में जल विद्युत परियोजना

नर्मदा नदी अमरकंटक से 1065 मीटर की ऊंचाई पर उभरती है और होशंगाबाद जिले में 686 किमी लंबे पहाड़ी इलाके से बहती है। अपने मूल से 620 मीटर की दूरी पर नदी अमरकंटक से मण्डला जिले में 261 किमी नीचे की ओर उतरती है। ऊपरी क्षेत्र में कुल 54 मेगावाट की अधिष्ठापित क्षमतावाली तीन पनबिजली परियोजनाओं के बारे में विचार जारी हैं। इनमें राघवपूर, मूल से 135 किमी दूरी पर, अधिष्ठापित क्षमता 18 मेगावाट, रोजरा, मूल से 206 मी नीचे की ओर, अधिष्ठापित क्षमता 20 मेगावाट और बसानिया (सिंगारपूर), मूल से 251 किमी दूरी पर, अधिष्ठापित क्षमता 16 मेगावाट, यह तीन स्थान शामिल है। जबलपुर जिले में धुआँधार जल प्रपात से 2 किमी पर 25 मेगावाट की स्थापित क्षमता वाली गोपालपुर पनबिजली परियोजना का भी प्रस्ताव है।

नरसिंहपुर जिलें में चिंकी गांव के निकट बरगी से 113 किमी अनुप्रवाह की दूरी पर नर्मदा नदी पर एक बहुउद्देशीय परियोजना का प्रस्ताव है जिससे 15 मेगावाट बिजली उत्पन्न होगी और 73979 हे. क्षेत्र पर सिंचाई की सुविधा प्राप्त होगी।

 

मार्च 2012 तक जल विद्युत उत्पादन
इंदिरा सागर (ISP) 18608.76
ओंकारेश्वर (OSP) 4830.46
सरदार सरोवर r (SSP) 12842.75
रानी ए.बी. नहर एचपी (RABCHP) 39.551
इंदिरा सागर नहर HP (ISCHP) 17.57
कुल 36339.09

 

 

महेश्वर परियोजना

महेश्वर परियोजना, मध्यप्रदेश के मंडलेश्वर शहर के निकट, ओंकारेश्वर परियोजना से 40 किमी अनुप्रवाह की दूरी पर नर्मदा नदी पर स्थित है। यहां 400 मेगावाट क्षमतावाले (10x40 मेगावाट) विद्युत गृह के निर्माण की परिकल्पना की गई है।

केन्द्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा वैधानिक मंजूरी प्राप्त करने के बाद और केन्द्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) से तकनीकी-आर्थिक मंजूरी के बाद जनवरी 1994 में, राज्य सरकार ने इस परियोजना को निजी क्षेत्र के लिए प्रस्तावित किया गया और यह काम श्री महेश्वर जल विद्युत विद्युत निगम लिमिटेड को (SMHPCL) सौंप दिया गया। इस परियोजना का कार्य प्रगति पर है और पूर्णत्त्व के निकट है।

 

रानी अवंती बाई सागर परियोजना

जबलपुर जिले में बरगी गांव के पास स्थित इस परियोजना द्वारा 1,57,000 हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचाई के अनुकुल बनाने की परिकल्पना है। परियोजना के तहत नर्मदा नदी पर 69.5 मीटर ऊंची और 5360 मीटर लंबी कंपोजीट ग्राविटी बांध का निर्माण होगा और प्रत्येक 45 मेगावाट संस्थापित क्षमता वाली की दो इकाइयों के एक रिवर बेड विद्युत गृह का निर्माण होगा और 10 मेगावाट स्थापित क्षमतावाली नहर (बाएं) हेड पावर हाउस का निर्माण होगा। बाएं किनारे पर स्थित 137 किमी लंबा मुख्य नहर, जबलपुर और नरसिंहपुर जिलों में 57,000 हेक्टेयर क्षेत्र पर सिंचाई करेगा और इसका निर्माण जारी है।

रिवर बेड और नहर के प्रमुख विद्युत गृह का काम पूरा हो गया हैं। वर्ष 1988 से 90 मेगावाट की स्थापित क्षमता के साथ RBPH में और वर्ष 2006 से CHPH में पूर्ण बिजली उत्पादन शुरू हो गया है। मुख्य नहर का बाया किनारा लगभग पूरा हो चुका है।

 

मन परियोजना

धार जिलें में जिराबाद गांव के निकट मन नदी पर (नर्मदा की उपनदी) मन परियोजना का काम पूरा हो चुका है। यह धार जिले के कुल 15000 हेक्टेयर आदिवासी क्षेत्रों में सिंचाई प्रदान कर रही है।

 

जोबत (चंद्रशेखर आजाद) परियोजना

झाबुआ जिले के कुक्षी तहसील में बस्कल गांव के पास हथनी नदी (नर्मदा नदी की एक उपनदी नदी) पर पर बनी इस परियोजना काम पूरा हो चुका है और यह धार जिले के 27 आदिवासी गांवों की 9848 हेक्टेयर भूमि को सिंचाई प्रदान कर रही है।

 

बरगी विमुख

जबलपुर जिले के 55,832 हेक्टेयर और कटनी, सतना रीवा (सोन और टोंस द्रोणी) जिलों के 1,89,187 हेक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई के लिए बरगी बांध से 194 किमी लंबाई की दाहिनी तटीय नहर का (नर्मदा द्रोणी) प्रस्ताव है। इसके तहत नर्मदा का पानी सोन और टोंस द्रोणी में जाना प्रस्तावित है, इसलिए इसे यह बरगी विमुख परियोजना का नाम दिया गया है। इसका कार्य प्रगति पर है।

 

अपर नर्मदा परियोजना

नर्मदा नदी के मूल (अमरकंटक) से 77 किमी ऊपरी बहाव के क्षेत्र में रिनातोला गांव के पास इस ‘अपर नर्मदा परियोजना' नामक एक प्रमुख सिंचाई परियोजना की परिकल्पना की गई है। परियोजना के तहत 30.64 मीटर ऊंची और 1776 मीटर लंबी कंपोजीट ग्राविटी बांध का निर्माण होगा। इससे बाएँ और दाएँ किनारों पर क्रमशः 86.5 किमी और 65.5 किमी लंबाई की नहरों द्वारा दिंडोरी और अनूपपुर के आदिवासी बहुल जिलों में 18,616 हेक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई होगी। योजना आयोग ने इस परियोजना को मंजूरी दे दी है।

 

हेलॉन परियोजना

मंडला के आदिवासी जिले में 11736 हेक्टेयर क्षेत्र पर सिंचाई उपलब्ध कराने के लिए नर्मदा नदी की एक उपनदी हेलॉन पर इस परियोजना की परिकल्पना की गई है। योजना आयोग ने इस परियोजना को मंजूरी दे दी है।

 

ऊपरी बेडा

खरगोन जिले में झिरान्या तहसील के नेमीत गांव के निकट, नर्मदा की एक सहायक नदी बेडा पर इस ‘ऊपरी बेडा सिंचाई परियोजना', का काम प्रगति पर है। परियोजना के तहत 191 मीटर लंबी कंक्रीट बांध के निर्माण और 9900 हेक्टेयर की सिंचाई क्षमता की परिकल्पना की गई है।

 

लोअर गोई

बड़वानी जिले के बड़वानी तहसील में पचपुला गांव के पास नर्मदा नदी की एक सहायक नदी गोई पर इस ‘लोअर गोई परियोजना' के निर्माण का काम चल रहा है। इस परियोजना के तहत 230.50 मीटर लंबे एक बांध के निर्माण की परिकल्पना की गई है। १३,७०० हेक्टेयर में सिंचाई प्रस्तावित है। 2009 से इस परियोजना पर काम शुरू कर दिया गया है।

वर्ष 2011 से नर्मदा घाटी के प्रमुख सिंचाई और पनबिजली परियोजनाओं से 3 लाख हेक्टेयर सिंचाई क्षमता और 2461 मेगावाट पनबिजली की क्षमता का निर्माण किया गया है।

 

उद्योग के लिए जलविद्युत और जल आपूर्ति

पनबिजली उत्पादन ऊर्जा का सबसे साफ, सस्ता और अक्षय स्रोत है। नर्मदा नदी पर आधारित परियोजनाओं के कारण राज्य की जल विद्युत उत्पादन क्षमता 2300 मेगावाट है। इसके अलावा, एनटीपीसी और एमपीएसईबी के तापीय विद्युत संयंत्रों के लिए भी पानी की आपूर्ति की जाती है।

उद्योगों के लिए पानी की उपलब्धता सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। कई संभावित उद्योगों ने रुचि दिखाते हुए पौधों के लिए पानी की आवश्यक उपलब्धता की मांग की है।

 

Content Courtesy : MP Madhyam.