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रण्डी की कृष कार्यमाला

 

भूम का चुनाव एवं तैयारी
रण्डी का पौधा मजबूत होता है  ौर प्रायः सभी प्रकार की भूम में उग सकता है। इसकी खेती मध्यम से भारी दोमट मट्टी  ौर हल्की भूम में  ासानी से की जाती है। परंतु यह  ावयक है क भूम में पानी के एक जगह पर जमाव को यह पौधा सहन नहीं कर सकता है।  रण्डी भूम में क्षारीयता को सहन नहीं कर कर सकती परंतु  म्लीयता में इसे उगाया जा सकता है। मानसून की पहले  ाने वाली वर्षा के तुरंत बाद हल चलाकर बखर से बखरनी करनी चाहये, जससे उथली मट्टी में गर्मी में हल चलाने से कड़ी मट्टी बखर कर नरम होने लगती है। जससे जड़े गहराई तक जाती है  ौर फसल  च्छी होती है तथा खरपतवार पर नयंत्रण रहता है।

उन्नताील जातयाँ

 

क्रं जात का नाम अवध उपज (क्वं प्रत एकड़) तेल की मात्रा
संकर कस्में
१                   गुजरात हायब्रड१ १८०-२४० ५०
२               जी.सी.एच. २ २००-२२० ६.४ ४८
३                जी.सी.एच. ४ २००-२२० ७.२० ५०
४                     जी.सी.एच. ५ २००-२२० ५०
५                    डी.सी.एच. ३० १६०-१८० ४९
६                एस.एच.बी १४५ २००-२४० ८.८ ५०
उन्नत कस्में
१                      क्रांत १२०-१५० ५०
२             ज्योत १००-१५० ५.२० ४८
३           ४८१  १२०-१६० ४.८ ५०

 

सल चक्र :
अरण्डी पूरे मौसम की फसल है। कन्तु  च्छे प्रबंध व संचाई ाीघ्र  ौर मध्यम  वध की कस्में/संकर  ौर खेती की पद्घत में वोष परवर्तन जैसे पत्तयों को तोड़ने की वध -ारा एक से  धक फसल ली जा सकती है।  रण्डीमँूगफली,  रण्डीतल या  रण्डीसूरजमुखी जैसी क्रमक फसल सम्भव है। इस फसल क्रम में  रण्डी फसल के बाद दूसरे वर्ष में  रण्डीज्वार,  रण्डीमक्का फसल उपयुक्त है।

बीजोपचार :
बीज का उपचार थीरम या बावस्टीन से ३ ग्राम प्रत कलोग्राम बीज की दर से करें। इससे बीजों को बीज जनत रोग जैसे  ाल्टनेरया, पत्ती  ंगमारी, बीज पत्र की  ंगमारी तथा मुरझाने से बचाया जा सकता है।

बुवाई का समय :
बारानी क्षेत्रों में खरीफ  रण्डी फसल की बुुवाई मानसून की वर्षा के तुरंत बाद करना उचत है। खरीफ की फसल जुलाई के प्रथम सप्ताह तक बोना चाहये।

बीज की मात्रा एवं बोने का तरीका :

  1. हायब्रड २२.५ क्र.ग्रा प्रत एकड़,
  2. जातयाँ ५६ क.ग्रा. एकड़ बीज की बोनी ४ से.मी. गहराई पर करना चाहयें। इसमे कतारों की दूरी ९० से.मी. एवं पौधों की दूरी ४५ से.मी. रखें।

 

रासायनक खाद की मात्रा एवं देने की वध :
बोनी करते समय नत्रजन ८ कलो, स्फुर १६ कलो एवं पोटाा ८ कलो प्रत एकड़ के हसाब से दें। फरीफ फसल में फल नकलते समय ८ कलो नत्रजन प्रत एकड़ की दर से दें। स्फुर एवं पोटाा की मात्रा बुवाई करते समय ही देना चाहये।

संचाई :
जब अधक समय तक सूखा हो तब फसल वृद्घ की  वस्था से पहले क्रम के स्पाइकों के नकलने, वकास के समय एवं संरक्षी संचाई करें जससे उपज  च्छी होती है। पूरी सम्भावत उपज क्षमता प्राप्त करने के लये लगभग ५५ दनों पर स्पाइकों पर फूल  ाने के समय पहली संचाई एवं इसके बाद की संचाईयाँ पहली संचाई के बाद २० दनों के  ंतराल से करें, जससे वभन्न क्रमों के स्पाइकों के वकास के समय नमीं बनी रहे।

नदाईगुड़ाई एवं  न्य कार्यः
फसल की  ारम्भक  वस्था में कई मौसमी खरपतवार उग  ाते हैं, जो  रण्डी से पोषक तत्व व नमीं लेने लगते हैं। वर्षा के क्षेत्रों में बैलों से चलने वाले ब्लेड हैरो -ारा २ या ३ बार नदाई एवं गुड़ाई, बुवाई के १५३० दन बाद जब पौधे लगभग ९१० से.मी. उँचाई के हों तब की जानी चाहये। पौधों के  ासपास के नींदा को हाथ से उखाड़कर नकाल दें।

पौध संरक्षण

कीट

 

  1. अरण्डी सेमीलूपर : ये इल्लयाँ पौधे की पत्तयों को खाकर नुकसान पहुॅचाती हैं। इसकी रोकथाम के लये ३०४० दन पुरानी फसल पर जब ४५ सेमीलूपर /पौधा दखाई दे तब मोनोक्रोटोफास (०.०५ प्रतात), इंडोसल्फान ०.०७ प्रतात से २.० म.ली. प्रत लीटर पानी में घोल बनाकर छड़काव करें।
  2. रण्डी केप्सूल बोरर ये इल्लयाँ तने, बोंडी तथा केप्सूल के ंदर घुसकर नुकसान पहुँचाती है। इसकी रोकथाम के लये मोनोक्रोटोफास ०.०५ प्रतात, का छड़काव या क्वनालफास १.५ प्रतात या मथाइल पैराथयान २.० प्रतात का स्पाइक पर भुरकाव करें।
  3. कम्बल कीड़ा : इसकी इल्लयॉँ पत्तयों को खा जाती हैं। इसकी रोकथाम के लये मेलाथयान ०.०५ प्रतात या पैराथयान ०.०२५ प्रतात का २५० लीटर पानी प्रत एकड़ की दर से छड़काव करके नयंत्रत कया जा सकता है।

 

ब. बीमारयाँ:

  1. सीडलंग ब्लाइट : इस रोग में बीज पत्रों पर हल्के हरे धब्बे होते हैं जो नीचे तक फैलते जाते है। इन धब्बों को पत्तयों की नचली सतह पर यह पीले या भूरे हो जाते हैं। जनमें भूरा सघन स्थान होता है। इस रोग से पौधे का तना भी प्रभावत होता है। इस रोग को रोकने के लये ढलानों में बुवाई न करें।
  2. आल्टरनेरया या पत्ती ंगमारी : इस रोग से बच पत्रों पर हल्के भूरे धब्बे होते हैं जो परपक्व होने पर मुड़ जाते हैं। वयस्क (बड़े) पौधों में पत्तयों पर सघन छल्लों के साथ नयमत धब्बे होते हैं। बाद में ये धब्बे मलकर बड़े चकते बनते जाते है। इसमें परपक्व होने के पहले ही पत्तयाँ झड़ जाती है एवं पुष्पक्रम ौर कैप्सूल पर छोटे ौर झुर्रीदार बीज होते हैं जनमें तेल नहीं होता। यह रोग ंकुरण से परपक्व होने की वस्था तक होता है। इस रोग के रासायनक नयंत्रण के लये थीरम ३ ग्राम प्रत क.ग्रा. बीज की दर से बीजोपचार करें ौर मेकोजेब ०.२ प्रतात का छड़काव करें।
  3. मुरझाना : इन रोगों में पौधे मुरझाने लगते हैं तथा जड़ों की वृद्घ रुक जाती है। इसमें जड़ ौर तने के मलने का स्थान गल जाता है। इससे पत्तयाँ प्रभावत होती है व उतकक्षय मुड़ जाते हैं। यह रोग ंकुरण की वस्था में परपक्व होने की वस्था तक होता है। इस रोग के नयंत्रण के लये सहनाील ौर प्रतरोधी कस्में ज्योत, क्रांत, जी.सी.एच.४, जी.सी.एच.५, डी.सी.एच.३० ौर एस.एच.बी १४५ लें। खेतों में पानी जमा न होने दें। इसके रासायनक नयंत्रण के लये थीरम ३ ग्राम प्रत क.ग्रा. बीज या कार्बेन्डाजम २ ग्राम प्रत क.ग्रा. बीज की दर से बीजोपचार करें।
  4. जड़ों का गलना/डाई बैक : पर्वसंधयों (नोड) के चारों ओर छोटे भूरे घाव होते हैं। इसमें दोनों दाा ों के ाकार के धब्बे बढ़ते हैं, जससे २ से २० से.मी. तक उतक क्षेत्र घर जाता है इसमें पूूरी ााखा ौर पौधे का उपरी भाग मुरझाने लगता है। पौधा ाीर्ष से सूखता है एवं मर जाता है। इस रोग में केप्सूल रंगहीन हो जाते है ौर ासानी से झड़ जाते हैं। इसके नयंत्रण के लये थीरम ३ ग्राम प्रत क.ग्रा. बीज या कार्बेन्डाजम २ ग्राम प्रत क.ग्रा. बीज की दर से बीजोपचार करें।
  5. ग्रे राट : इसमें पुष्पक्रमों पर प्रारम्भ से छोटे काले धब्बे दखाई देते हैं, जससे से पीला द्रव रसता है। इन धब्बों से कवकीय धागों की वृद्घ होती है, जो संक्रमण को फैलाते हैं, जससे पुष्पक्रम संक्रमत दखाई देते हैं। इसके रासायनक नयंत्रण के लये कार्बेंडाजम ०.०५ प्रतात का १५ दन के ंतराल में छड़काव करें।
  6. सरकोस्पोरा पत्ती धब्बा : पत्तयों की दोनों सतहों पर छोटे काले या भूरे धब्बे होते हैं। ंत में ये भूरे होकर धूसर सफेद हो जाते हैं, जसके कनारे गहरे भूरे होते हैं। इन धब्बों के बीच में काले महीन छीटें होते हैं। इसका संक्रमण फसल वृद्घ के पूरे समय में हो सकता है। इसके रासायनक नयंत्रण के लये यद संक्रमण गम्भीर हो तो कॉपर ाक्सीक्लोराइड ०.०३ प्रतात या मैन्कोजेब ०.२५ प्रतात का छड़काव फसल के मौसम में दो या तीन बार करें।
  7. बैक्टीरयल पत्ती धब्बा : इस रोग में पत्तयों पर पानी सोखने वाले धब्बे दखाई देते हैं, जनके बीच का भाग मध्यम हरा और कनारे गहरे होते हैं। धब्बे गहरे भूरे रंग के हो जाते हैं तथा मुड़ने लगते है ौर पत्तयाँ मुड़ जाती है, इसका संक्रमण ंकुरण से लेकर परपक्व वस्था तक होता है। इसके रासायनक नयंत्रण के लये ाक्सीक्लोराइड (०.०३ प्रतात) या स्ट्रेप्टोसाइक्लन १ ग्राम, १० लीटर पानी में या पोषामाइसन (०.०२५ प्रतात) का छड़काव करें।
  8. चूर्णल ासता (पावडरी मल्डयू) : उचत परस्थत में पत्ती की नचली सतह पर सफेद पावडर की वृद्घ होती है सतह कवक की सफेद वृद्घ से ढंक जाती है। इसकी नचली सतह पर रोगग्रस्त क्षेत्रों में तथा प्रकाा पड़ने पर उपरी भाग पर सफेद चकते दखाई देते हैं। इससे हवा में संक्रमण होता है। इसका नयंत्रण नवम्बर से मार्च तक होता है। इसके रासायनक नयंत्रण के लये, जब मौसम सूखा हो तब बुवाई के तीन महने बाद से ारम्भ कर दो बार बेटेबल सल्फर ०.२ प्रतात का १५ दनों के ंतराल से छड़काव करें।

 

फसल कटाई एवं छलका नकालना :

अरण्डी की ााखायें  धक होती हैं। इसमें ४५ क्रम में स्पाइक १८०२४० दनों प्रत्येक ३० दनों के  ंतराल से नकलते हैं। बुवाई के बाद ९० से १०० दनों में मुख्य स्पाइक कटाई के लये तैयार हो जाते हैं। इसके बाद भी सभी लोकप्रय मध्यम से कम  वध की कस्मों  ौर संकर में ३० दनों के  ंतराल से क्रम में स्पाइकों की कटाई की जा सकती है। जब कैप्सूल का रंग पीला हो तब कटाई करें।  परपक्व कैप्सूलों की कटाई न करें क्योंक इससे बीज भार व बीजों में तेल का भाग कम होता है। जब कैप्सूल पीले हो जाये व सूखने लगें तब कटाई करें, जनमें कैप्सूलों में बीज  धक होते हैं, व तेल का भाग  धक होता है। यह बीज  ंकुरण के योग्य होते हैं।

डण्डयों से कैप्सूलों को पीटकर जहाँ सम्भव हो ट्रेक्टर या बैलों की सहायता से गहाई की जाती है। गहाई के लये बजली चलत माीने भी उपलब्ध हैं।

उपज :
इस प्रकार उन्नत उत्पादन तकनीक  पनाकर  रण्डी का  धकतम उत्पादन प्राप्त कया जा सकता है।

  1. असंचत कस्में ६५०८०० क.ग्रा. प्रत एकड़
  2. संचत कस्में १०००१२०० क.ग्रा प्रत एकड़
    धक उपज हेतु ध्यान देने योग्य बातें :
  1. उचत जल नकास वाली भूम का चयन करके उसे अच्छी तरह से तैयार करें।
  2. धकृत एजेन्सी से खरीदे गये उत्तम गुणवत्ता वाले बीजों का प्रयोग करें।
  3. बुवाई से पहले बतायें नुसार बीजोपचार करें।
  4. सुझाई गई उर्वरक की मात्रा का प्रयोग करें।
  5. उन्नत कृष उत्पादन तकनीक पनायें।
  6. जीवनााी कीट ौर रोगों से होने वाले नुुकसान से फसल को बचाने के लये समुचत पौध संरक्षण पनायें
  7. उचत समय पर फसल की कटाई करें।