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धान  की कृष कार्यमाला  

 

 भूम का चुनाव एवं तैयारी  
सभी प्रकार की भूम में, खेतों की वभन्न दषाओं में जैसे बन्धान वाले, बना बन्धानवाले तथा हल्के ढलान वाले खेतों में धान की खेती की जा सकती है। गर्मी के दनों में बखर चलाकर गहरी जुताई कर बोनी की जाना चाहये।

 

उन्नत प्रजातयां  

अतषीघ्र पकने वाली जातयां

( वध ७०९० तक तथा उत्पादन ६१० क्वं प्रत एकड़ एवं ज्यामत १५न्१५ सें.मी.)  जे. ार.३५, पूर्वा, कलंगा३, जवाहर७५

ाीघ्र पकने वाली प्रजातयां
( वध १००११५ तक तथा उत्पादन १०१४ क्वं प्रत एकड़ एवं ज्यामत १५न्१५ सें.मी.)  जे. ार.२०१, जे. ार.३४५, पूर्णमा, जे. ार.२५३,  नन्दा, तुलसी

मध्यम  वध में पकने वाली जातयां
( वध १२०१३५ तथा उत्पादन १६२४ क्वं प्रत एकड़ एवं ज्यामत २०न्१५ सें.मी.)   ाई. ार.३६,  ाई. ार.६४, महामाया, क्रांत, माधुरी, पूसा बासमती १, पूसा सुगंधा २, पूसा सुगंधा ३

देर से पकने वाली प्रजातयां

( वध १४०१५० तथा उत्पादन १८२४ क्वं प्रत एकड़ एवं ज्यामत ५०न्२० सें.मी.)  स्वर्णा, मासुरी, महामाया।

संकर प्रजातयां  
( वध ११०१३५ तथा उत्पादन २२२८ क्वं प्रत एकड़) ए.पी.एच. ार१, ए.पी.एच. ार२, एम.जी. ार.१, सी.एन. ार.एच.३, डी. ार. ार.एच.१, पंत संकर धान१, नरेंद्र संकर धान२, सी. ो. ार.एच.२, ए.डी.टी. ार.एच.२, सह्याद्री, के.एन.एच२, के. ार.एच.१, के. ार.एच.२

  बीज की मात्रा
धान की बीज की मात्रा बुवाई की पद्घत के  नुसार  लग लग रखी जाती है। जैसे छटकवां वध से बोने के लये ४०४८ ,कतार मे बीज बोने के लये ३६४०, लेही पद्घत में २८३२ कलो, रोपाई पद्घत में १२१६ कलों तथा बयासी पद्घत में ४८६० कलो प्रत एकड़ उपयोग में लाया जाता है।

 

बीजोपचार :
बीजों को खेत में या रोपणी में बुवाई करने के पूर्व उपचारत कर लेना चाहये। सबसे पहले बीजों को नमक के घोल में डालें। इसके लये १० लीटर पानी में १.६ कलोग्राम खाने का नमक डालकर घोल बनायें। इस तरह के घोल में बीजों को डुबाने से हल्के बीज पानी में तैरने लगते हैं, उन्हें छान कर अलग कर लें, फर नीचे के बीजों को पानी से नकालकर दो बार साफ पानी से  च्छी तरह से धोयें तथा छाया में फैलाकर सुखायें। सुखाये गये बीजों में २ ग्राम मोनोसान या केप्टान या थायरम / २.५ ग्राम थायरम  थवा मेन्कोजेब बेवस्टन प्रत कलो ग्राम बीज के हसाब से उपचारत करके बोनी करें। बैक्टीरयल बीमारयों के बचाव के लये बीजों को ०.०२ प्रतषत स्ट्रेप्टोसाइक्लन के घोल में डुबाकर उपचारत करना लाभप्रद होता है।

  बुवाई का समय  :
वर्षा प्रारम्भ होते ही धान की बुवाई का कार्य प्रारम्भ कर देना चाहये। जून मध्य से जुलाई प्रथम सप्ताह तक बोनी का समय सबसे उपयुक्त होता है। बुवाई में वलम्ब होने पर उपज पर वपरीत प्रभाव पड़ता है। रोपाई के बीजों की बुवाई रोपणी में जून के प्रथम सप्ताह से ही संचाई के उपलब्ध स्थानों पर कर देना चाहये क्योंक जून के तीसरे सप्ताह से जुलाई मध्य तक की रोपाई से  च्छी पैदावार मलती है। लेही वध से धान के  ंकुरण हेतु ६७ दनों का समय बच जाता है  तः बीजू धान को देरी होने पर लेही वध से बोनी करने से  धक लाभ होगा।

 

बुवाई की विधिया

छटकवां वध इस वध में अच्छी तरह से तैयार खेत में नर्धारत बीज की मात्रा छटककर हल्की बखरनी -ारा बीज को मट्टी में ढॅंक देते हैं।

  • कतारों की बोनी च्छी तरह से तैयार खेत में नर्धारत बीज की मात्रा नारी हल या दुफन या सीडड्रल -ारा २० से.मी. की दूरी की कतारों में बोनी करना चाहये।
  • वयासी वध इस वध मं छटकवाँ या कतारों की बोनी के नुसार नर्धारत बीज की सवा गुना मात्रा बोते हैं। इसके बाद लगभग एक महीने की खड़ी फसल में हल्का पानी भरकर हल्की जुताई कर देते हैं। जहां पौधे घने उगे हों, जुताई के बाद उखड़े हुये घने पौधों को वरली स्थान पर लगा देना चाहये। बयासी करने से खेत में खरपतवार कम हो जाते हैं तथा जल धारण की क्षमता च्छी हो जाती है। इससे फसल की बढ़वार च्छी होती है।
  • लेही वध इस वध में खेत में पानी भरकर मचौ ा करना चाहये, फर समतल खेत में नर्धारत बीज की मात्रा छटक देना चाहये। बोनी के दूसरे दन बाद खेत में ८१० से.मी. धक पानी नहीं रहना चाहये तथा खेत की मेंड़ बंधी रहना चाहये। यद तेज वर्षा होने का लक्षण हो तब बुवाई नहीं करना चाहये।
  • रोपा वध सामान्य तौर पर ३४ सप्ताह के पौध रोपाई के लये उपयुक्त होते है। तथा एक जगह पर २३ पौधे लगाना पर्याप्त होता है। रोपाई में वलम्ब होने पर एक जगह पर ४५ पौधें चाहये।

 

धान की प्रजातयां उर्वरकों की मात्रा
(कलोग्राम प्रत एकड़)
नत्रजन स्फुर     पोटाष
ाीघ्र पकने वाली १०० दन से कम, छोटे तने वाली १६-२० ८-१५ ६-८
ाीघ्र पकने वाली ११० दन से कम, उंचे तने वाली १०-१२ ६-८ ४-६
मध्यम अवध ११०१२५ दन की, छोटे तने वाली    ३२-४० १५-१६ ८-१०
मध्यम अवध ११०१२५ दन की, उंचे तने वाली    १६-२० ८-१५ ६-८
देर से पकने वाली १२५ दनों से अधक, छोटे तने वाली ४०-४८        २०-२४   १२-१६
देर से पकने वाली, उंचे तने वाली २०-२४          १०-१२ ६-८
संकर प्रजातयां ४-८        २-४ १-६

 

नींदा नयंत्रण :
 धान की फसल में बीज उगने या पौधा लगाने से लेकर कटाई तक हर अवस्था में कई प्रकार के खरपतवार उगते हैं। सावा, टोरी वट्टा, कनकी, मोथा, बदौर, जलदूब, जलकुम्भी, भृंगराज, वल्जा, एवं जंगली धान जैसे खरपतवार इतनी  धक तादाद में उगते हैं क कभीकभी धान की फसल काटने लायक ही नहीं रह जाती है। हर महीनें में उगने वाले नींदा  लग लग हैं, कंतु सावा, मोथा, जलदूव, जंगली धान व कनकी का प्रकोप तो पूरे फसल काल में खतरनाक रहता है। सावा, टोरी बट्टा  ौर जंगली धान को तो नंदाई के लये फसल के पौधों के साथ पहचानना भी मुष्कल हो जाता है। धान की बुवाई  लग लग ढंग से  लग लग स्थतयों में की जाती है तथा जल्दी पकने वाली कस्मों से लेकर लम्बी  वध की प्रजातयां उगाई जाती है।  तः इनमें नींदा नयंत्रण के उपाय में भी  लग लग ढंग से नम्नानुसार  पनाना चाहये

बीजू छटकवां धान जसमें बयासी नहीं की जाती हो तथा कतारों में बोई गई बीजू धान

  • बुवाई के तुरंत बाद नई जमीन में या सूखी जमीन की बोनी में पानी बरसने के तुरंत बाद ब्यूटाक्लोर १ कलोग्राम प्रत एकड़ सक्रय तत्व का छड़काव २०० लीटर पानी में घोलकर करने से लगभग २०२५ दनों तक नींदा नहीं उगते हैं।
  • खरपतवार उग आने के बाद जुताई करके खेत तैयार कर बोवाई करने से फसल में लगभग १०१५ दनों तक खरपतवार नहीं रहते हैं।
  • खड़ी फसल में दो बार २०२५ दनों ौर ४०४५ दनों की वस्था पर नदाई करें।
  • चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार की धकता होने पर २, ४डी नामक नीदानाषी २०० ग्राम प्रत ए.कड़ का छड़काव लगभग २५ से ३० दनों तक की फसल पर करें। यद कोई ौर फसल धान के साथ हो तब यह छड़काव न करें।

 

ब. बीज छटकवां धान, जहां बयासी की जाती हो
जहां बयासी अपनायी जाती हो, वहां बयासी करने के बाद ७ दनों के  ंदर नदाई व चलाई कया जाना चाहये। दूसरी निंदाई २५३० दनों पर करना चाहये। बयासी के लये समय पर पानी उपलब्ध होने पर निंदाई करना चाहये। बोनी के ४०४५ दनों बाद बयासी नहीं करना चाहये।

इसके  लावा कतारों के बीच ताउची गुरमा लगभग १५ दनों के  ंतराल से ५० दनों तक फसल में कतारों के बीच चलाने से नदाई का व्यय बहुत कम हो जाता है। निंदाई का व्यय बहुत कम हो जाता है। निंदाई से नकाले गये खरपतवारों की पलवार कतारों के बीच इस प्रकार बछायें क उनकी जडें जमीन के सम्पर्क में न  ाने पावें। ऐसा करने से नये खरपतवार नहीं उग पाते, नमी का संरक्षण होता है  ौर खेत में पोषक तत्व की वृद्घ होती है।

  स. रोपाई धान में

  • रोपाई के बाद ६७ दनों तक में ब्यूटाक्लोर ८०० १००० ग्राम प्रत एकड़ का छड़काव करने से लगभग २५३० दनों तक खरपतवारों का प्रकोप कम होता है।
  • खड़ी फसल में रोपाई के ३० ौर ४५ दनों पर करने से खरपतवारों पर नयंत्रण हो जाता है।
  • कतारों की रोपाई मे कतारों के बीच ताउची गुरमा चलाने से खरपतवारों का प्रभावी नयंत्रण होता है।
  • चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार उगने पर, २, ४डी नींदानाषी २०० ग्राम प्रत एकड़ का छड़काव लगभग एक माह की फसलों पर करने से इनका नयंत्रण हो जाता है।

 

द. जहां पर जंगली धान का प्रकोप हो
 जंगली धान के प्रकोप वाले खेतों में, बैंगनी पत्ती वाली धान की प्रजातयां जैसे यामला, आर ४७० (नाग केषर, व जलकेषर स्थानीय प्रजातयां) उगने से नंदाई में सुवधा होती है।

जल प्रबंधन
धान  धक पानी चाहने वाली फसल है। कसी भी  वस्था में पानी की कमी होने पर उपज में गरावट  ाती है, कंतु कंसे नकलते समय  ौर दाना भरते समय पानी की कमी से उपज में बहुत गरावट होती है। बालें नकलते समय  ौर दाना भरते समय भी पानी की कमी से उपज में बहुत गरावट होती है। लगातार खेत में पानी भरे रखने से यद्यप खरपतवार कम उगते हैं, फर भी उपज पर बुरा  सर पड़ता है। खेत से भरा हु ा पानी ३४ दनों के लये नकालकर फर दूसरा पानी भरते रहने का क्रम बनाना फसल की उपज के लये सर्वोत्तम जल प्रबंधन है। प्रजातयों के  नुसार धान की फसल की वभन्न  वस्था ों पर खेत में पानी के सतह की उंचाई नम्नानुसार सुनष्चत करना चाहये

 

धान की फसल में जल प्रबंधन  
फसल की अवस्था
खेत में पानी के सतह की उंचाई से.मी
उंची प्रजातयां बोनी
लगभग १ माह की अवस्था ५   २ से.मी. ५ ३ से.मी.
१ माह से २ माह की अवस्था १० २ से.मी. ७ २ से.मी.
२ माह बाद १५अ२ से.मी. १० २ से.मी.

 

पौध संरक्षण

 धान की सभी अवस्था ों में कसी न कसी वनाषकारी कीटों या रोगों के प्रकोप की  ाषंका बनी रहती है,  तः हमेषा खेत की नगरानी करते रहना चाहये तथा इनका प्रकोप दखने पर कृष परामर्ष केन्द्रों से सम्पर्क करके उचत पौध संरक्षण उपाय  पनाना चाहये। कसी भी कीट या रोग के प्रकोप को नजर  ंदाज नहीं करना चाहये।

  प्रमुख कीट

 सफेद पृष्ठीय फुदका, पत्ती मोड़क (चतरी), गंधी कीट, चढ़ने वाली इल्ली (ततली), धान का गाल मज (गंगई), धान का तना छेदक, भूरा पृष्ठीय फुदका, धान का हस्पा, हरा फुदका, कोष कृम बंकी, सैनक कीट (फौजी कीट)

  रोग

 धान की प्रमुख गौण बीमारयों के नाम, कथक उनके लक्षण, पौधों की  वस्था, जसमें  ाक्रमण होता है, नम्नानुसार है

झुलसा रोग

आक्रमण  
पौधे से लेकर दाने बनने तक की  वस्था तक इस रोग का  ाक्रमण होता है। इस रोग का प्रभाव मुख्यतः पत्तयों पर प्रकट होता है। इस रोग से पत्तयो, तने की गाँठों, बाली पर  ाँख के  ाकार के धब्बे बनते हैं। धब्बे बीच में राख के रंग के तथा कनारों पर गहरे भूरे या ललामी लये होते हैं। कई धब्बे मलकर सफेद रंग के बड़े धब्बे बना लेते हैं जससे पौधा झुलस जाता है। गाँठों पर या बालयों के  ाधार पर प्रकोप होने पर पौधा हल्की हवा से ही गाँठों पर से तथा बाली के  ाधार से टूट जाता है।

रोग की सुप्त  वस्था/फैलाव
यह रोग बीज जनत है पर बाद में रोगीले पौधों नींदों तथा हवा -ारा फैैलता है।

 

नयंत्रण

  • स्वच्छ खेती करना आवयक है। खेत में पड़े पुराने पौध वषेष को भी नष्ट करें।
  • रोग रोधी कस्मों का चयन करें।
  • बीजोपचार करें बीजोपचार कार्बेंडाजम थवा बेनोमायल २ ग्राम कलोग्राम बीज की मात्रा से घोल बनाकर ६ से १२ घंटे तक बीज को डुबोयें, तत्पष्चात्‌ छाया में बीज को सुखाकर बोनी करें।
  • खड़ी फसल में रोग के लक्षण दखाई देने पर कार्बेंडाजम १ ग्राम या हनोसान १ म.ली. या मेंक्कोजेब ३ ग्राम प्रत लीटर के हसाब से छड़काव करना चाहये। दैहक दवायें धक प्रभावी हैं। धान की जातयों का क्षेत्रानुसार चुनाव करने से इस रोग से बचा जा सकता है।

 

भूरा धब्बा या पर्णचत्ती रोग

आक्रमण
 
इस रोग का  ाक्रमण भी पौध  वस्था से दाने बनने की  वस्था तक होता है।

लक्षण
मुख्य रुप से यह रोग पत्तयों, पर्णछन्द तथा दानों पर  ाक्रमण करता है। पत्तयों पर गोल  ंडाकार,  ायताकार छोटे भूरे धब्बे बनते हैं। जससे पत्तयां झुलस जाती हैं, तथा पूरा का पूरा पौधा सूखकर मर जाता है। दाने पर भूरे रंग के धब्बे बनते हैं तथा दाने हल्के रह जाते हैं।

नयंत्रण
यह रोग बीज जनत है परंतु खरपतवार तथा बाद में रोगीले पौधों से तथा हवा से भी इस रोग का फैलाव होता है।  तः खेत में पड़े पुराने पौध  वषेष को नष्ट करें।
रोग की रोकथाम के लये झोंका रोग की वध से बीजोपचार करें। खड़ी फसल पर लक्षण देखते ही मेन्कोजेब ३ ग्राम प्रत लीटर पानी में घोलकर छड़काव करें तथा नरोधक जातयों जैसे  क्रांत,  ाई. ार३६ की बुवाई करें।

 

खैरा रोग
यह रोग जस्ते की कमी के कारण होता है।

आक्रमण
पौधे से लेकर बाढ़ की  वस्था में रोग के लक्षण दखाई देते हैं। प्रदेष के  धकांष जलों में जंक की कमी पाई जाती है।

लक्षण
जस्ते की कमी वाली खेत में पौध रोपण के ३ सप्ताह के बाद ही पुरानी पत्तयों के  ाधार भाग में हल्के पीले रंग के धब्बे बनते हैं, जो  बाद में कत्थई रंग के हो जाते हैं, जससे पौधा बौना रह जाता है तथा कल्ले कम नकलते हैं, एवं जड़ें भी कम बनती हैं, तथा भूरी रंग की हो जाती है।

नयंत्रण

  • खैरा रोग के नयंत्रण के लये ८१० क्र.ग्रा. जंक सल्फेट प्रत एकड़ बुवाई पूर्व उपयोग करें।
  • पौध रोपण से पहले पौधे को ०..४ प्रतात जिंक सल्फेट के घोल में १२ घंटे तक डुबाकर रोपण करें।
  • खड़ी फसल में १००० लीटर पानी में ५ कलोग्राम जंक सल्फेट तथा २.५ क.ग्रा. बना बुझा हुआ चूने के घोल का मश्रण बनाकर उसमें २ कलोग्राम यूरया मलाकर छड़काव करने से रोग का नदान तथा फसल की बढ़वार में वृद्घ होती है।
  • कुछ जातयों में खैरा रोग का प्रकोप कम होता है, जैसे ाई. ार८ ाद। तः क्षेत्र के नुसार जात का चयन करें।

 

ााकाणु पर्ण रोग

लक्षण
इसका आक्रमण बाढ़ की  वस्था में होता है। इस रोग में पौधें की नई  वस्था में नसों के बीच में पारदर्षता लये हुये लम्बीलम्बी धारयाँ पड़ ज.ाती है, जो बाद में कत्थई रंग ले लेती है।

रोग की सुप्त  वस्था/फैलाव
झुलसन रोग की तरह ही इस रोग का फैलाव होता है।

नयंत्रण

  • ााकाणु झुलसन की तरह बीजोपचार करें।
  • ााकाणु पर्णधारी रोग के रोकथाम के लये क्षेत्र के अनुसार जात का चयन करें।

 

दाने का कंड़वा रोग

आक्रमण

दाने बनने की  वस्था में।

लक्षण
बाली के ३४ दानें में कोयले जैसा काला पावडर भरा होता है, जो या तो दाने के फट जाने से बाहर दखाई देता है या बंद रहने पर सामान्य दाने जैसा ही रहता है, परंतु ऐसे दाने देर से पकते हैं तथा हरे रहते है॥ सूर्य की धूप नकलने से पहले देखने पर संक्रमत दानों का काला चूर्ण स्पष्ट दखाई देता है।

रोग की सुप्त  वस्था/फैलाव
रोगाणु एक वर्ष से  धक सक्रय रहते हैं।

नयंत्रण
इस रोग का प्रकोप  भी तक तीव्र नहीं पाया गया है।  तः उपचार की  ावष्यकता नहीं है, परंतु  धक नत्रजन देने से रोग  धक बढ़ता है।  तः खेत में संतुलत खाद का प्रयोग करना चाहये।

 ााकाणु झुलसन रोग

 ाक्रमण

बढ़वार की कसी भी  वस्था में इस रोग का  ाक्रमण हो सकता है।

लक्षण
इस रोग में पत्तयो पर पानी की बूंद के  ाकार के धब्बे प्रकट होते हैं, जो बाद में सरे तथा कनारे से सूखने लगती है, सरे  ौर कनारे टेढ़ेमेढे.  नयमत होते हैं तथा पौधे झुलसे हुये से लगते हैं।

रोग की सुप्त  वस्था/फैलाव
रोग के जीवाणु मट्टी  ौर बीज में रहते हैं। इसका फैलाव रोग ग्रसत पौधों सम्पर्क तथा संचाई के पानी से होता है।

 

नयंत्रण

  • स्वच्छ खेती को प्राथमकता देना आवष्यक है। खेत से पानी की नकासी करें।
  • बोनें से पूर्व ६ ग्राम स्ट्रेप्टोसाकलन दवा को २० लीटर पानी के घोल बनाकर बीजोपचार करें।
  • खड़ी फसल पर रोग के लक्षण दखाई देने पर उपरोक्त दवा के घोल का छड़काव करें थवा १ ग्राम ताायुक्त दवा प्रत लीटर पानी में घोल बनाकर छड़काव करें।
  • ााकाणु प्रतरोधक जातयों का उपयोग करे जैसे ाई. ार. ३६, ाई. ार६४ इत्याद।

 

कटाईगहाई एवं भण्डारण
पूरी तर से पकी फसल की कटाई करें। पकने के पहले कटाई करने से दानें पोचे हो जाते हैं। कटाई में वलम्ब करने से दाने झड़ते हैं तथा चावल अधक टूटता है। फसल को चूहों से भी बचाना बहुत जरुरी होता है। कटाई के बाद फसल को १२ दन खेत में सुखाने के बाद खलयान में ले जाना चाहये। खलयान में ठीक से सुखाने के बाद गहाई करना चाहये। गहाई के बाद उड़ावनी करके साफ दाना इकट्ठा करना चाहये  ौर  च्छी तरह धूप में सुखाने के बाद भण्डारण करना चाहये।