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ज्वार की उन्नत खेती

भूम का चुनाव एवं तैयारी

ज्वार की अच्छी पैदावार के लये मटयार दोमट या मध्यम दोमट भूम, पर्याप्त जीवाष्म युक्त तथा ६ से ८ पीएच वाली भूम सर्वाधक उपयुक्त पायी गयी है। गर्मी के समय खेत की गहरी जुताई, भूम की उर्वरा ाक्त में वृद्घ, खरपतवार नयंत्रण एवं कीट व्याध नयंत्रण की ष्ट से  ावष्यक है। भूम से जल नकास  च्छा होना चाहये। कल्टीवेटर एवं बखर से जुताई कर के भुरभुरी बनावें। खेत की  ंतम जुताई के पहले चार टन गोबर की खाद डालें तथा पाटा चला कर खेत को बोनी हेतु तैयार करें।

 

उन्नत प्रजातयाँ

संकर कस्म उत्पादन (क्वंटल प्रत एकड़) उन्नत कस्म उत्पादन (क्वंटल प्रत एकड़) देाी कस्म उत्पादन (क्वंटल प्रत एकड़)
सी.एस.एच. ५ १३-१४ जवाहर ज्वार ९३६ १३-१४ वदाा ६०१ ८१०
ाी.एस.एच. ६ १३-१४ जवाहर ज्वार ७४१ १३-१४ - -
सी.एस.एच. ९ १४-१६ जवाहर ज्वार १०४१ १३-१४ - -
सी.एस.एच. १४ १३-१४ एस.ए.आर. १ ११-१२ - -
सी.एस.एच. १८ १४-१८ एस.पी.बी. १०२२ १२-१३ - -

बीज की मात्रा

बीज की मात्रा ३ से ४ कलो प्रत एकड़। बीज की अंकुरण क्षमता ७० से ७५ प्रतात होना चाहये।

 

बीजोपचार

फफुूंद नााक दवा थायरम ३ ग्राम  थवा एग्रोसन जी एन ३ ग्राम प्रत कलोग्राम बीज के हसाब से उपचारत करें। फफुूंद नााक दवा से उपचार के उपरांत एवं बोनी के पूर्व १० ग्राम एजोस्प्रलयम एवं पीएसबी कल्चर का उपयोग प्रत कलोग्राम बीज के हसाब से  च्छी तरह मलाकर करें। उपचारत बीज को धूप से बचाकर रखें तथा बोवाई ाीघ्र करें।

 

उर्वरक

च्छी उपज के लये ३२ कलोग्राम नत्रजन, १६ कलोग्राम स्फुर तथा १६ कलोग्राम पोटाा प्रत एकड़ देना चाहये। बोनी के समय नत्रजन की  ाधी मात्रा तथा स्फुर एवं पोटाा की पूरी मात्रा बीज के नीचे देवें। नत्रजन की ोष मात्रा ३०३५ दन तक देवें। जहां गोबर की खाद उपलब्ध हो, वहां २ से ४ टन प्रत एकड़ उक्त खाद दी जावे, इससे ज्वार का  धक उत्पादन होता है।

 

बोवाई का समय

मानसून की वर्षा होते समय ही ज्वार की बोनी कर देना चाहये। जून के अंतम के सप्ताह से जुलाई  ाखरी सप्ताह तक का समय उपयुक्त है। कतार से कतार की दूरी ४५ सेमी. तथा पौधे से पौधे की दूरी १० से १२ सेमी की दूरी रखी जावे। ८१० दन की फसल होने पर उसका बरलन कया जाना चाहये।
 

 ंतरवर्तीय फसलें

ज्वार की नई जातयों के साथ  रहर तथा सोयाबीन की  ंतरवर्तीय फसल सफलता से ली जा सकती है।  ंतरवर्तीय फसल के लये  ाधार फसल ज्वार की चार कतारें ४५ सेमी की दूरी पर  ौर  ौर  ंतवर्तीय फसल  रहर की दो कतारें ४५ सेमी की दूरी पर एकांतर पद्घत से बोऐं। जन क्षेत्रों में ७०० ममी से  धक वर्षा होती है  ौर भूम की नमी संग्रहण ाक्त  च्छी है, वहां ज्वार के बाद कुसुम  थवा चने की खेती  धक लाभदायक होती है।

 

संचाई

यद वर्षा यथा समय होती है तो ज्वार में संचाई की  ावष्यकता नहीं पड़ती। वर्षा नहीं होने पर भुट्टे नकलते समय  ौर दाना बनते समय यद नमी की कमी हो, एवं संचाई उपलब्ध हो तो संचाई की जावे।

 

खरपतवार नयंत्रण

ज्वार फसल में खरपतवार नयंत्रण हेतु बोनी के १५२० दन बाद तथा ३०३५ दन बाद कतारों के बीच व्हील हो या डोरा चलावें। इसके पष्चात्‌ कतारों के  ंदर हाथों -ारा नदाई करें। रायासनक नयंत्रण में एट्राजीन २०० ग्राम से ४०० ग्राम प्रत एकड़ सक्रय तत्व  थवा एलाक्लोर ६०० ग्राम सक्रय तत्व को २०० लीटर पानी में मलाकर बोनी के पष्चात्‌ एवं  ंकुरण के पूर्व छड़काव करें।  गया की रोकथाम के लये २४ डी का सोडयम साल्ट ८०० ग्राम सक्रय तत्व २०० पानी में घोलकर प्रत एकड़ छड़काव करें। जब खेत में  गया कम हो तो उसे उखाड़कर नष्ट कया जा सकता है।

 

फसल संरक्षण

अ. कीट

ज्वार की फसल में  नेक प्रकार के कीट पाये जाते हैं। प्रमुख तना छेदक मक्खी, तना छेदक इल्ली,  ौर भुट्टों की कीट मज मक्खी प्रमुख है। इनमें मज मक्खी  धक हान पहुंचाती है।

 

१ तना छेदक मक्खी

यह कीट वयस्क मक्खी की तुलना में  ाकार में छोटी होती है। इसकी मादा पत्तों के नीचे सफेद  ंडे देती है। इन  ंडे से २ से ३ दनों में इल्लयां नकलकर पत्तों के पोगंलों से होते हुये तनों के  ंदर प्रवेा करती है  ौर तनों के बढ़ने वाले भाग को नष्ट करती है। ऐसे पौधों में भुट्टे नहीं बन पाते हैं।

 

नयंत्रण

यद बोनी वर्षा के  ागमन के पूर्व  थवा वर्षा के  ारम्भ के एक सप्ताह में कर ली जावे तो इस कीट से हान कम होती है। बीजोत्पादन क्षेत्र में बोनी के समय बीज के नीचे फोरेट १० प्रतात  थवा कार्बोफयुरान ३ प्रतात दानेदार कीट नााक ४ से ५ कलोग्राम प्रत एकड़ के हसाब से दें। देरी से बोनी होने पर सवाया बीज बोयें।

 

२ तना छेदक इल्ली

इस कीट की वयस्क मादा मक्खी पत्तों की नचली सतह पर १० से लेकर ८० के गुच्छों में अंडे देती है जनसे ४ से ५ दनों में इल्लयां नकलकर पत्तों के पोगंलों में प्रवेा करती है। तनों के  ंदर वे सुरंग बनाती है  ौर  ंततः नाडा बनाती है। इस कीट की पहचान पत्तों में बने छेदों से की जा सकती है जो इल्लयां पोगलों में प्रवेा के समय बनाती है।

 

नयंत्रण

पौधे जब २५३५ दनों की  वस्था के हो तब पत्तों के पोंगलों में कार्बोफयुरान ३ प्रतात दानेदार कीट नााक के ५ से ६ दाने प्रत पौधे में डालें। लगभग ३ से ४ कलोग्राम कीटनााक प्रत एकड़ लगता है। दानेदार कीट नााक महंगे हैं,  तः इस कीट की संतोषजनक रोकथाम इंडोसल्फान ४ प्रतात  थवा क्यूनालफास १.५ प्रतात चूर्ण, का पोंगलों में भुरकाव -ारा सम्भव है। प्रत एकड़ ३.२० से ४ कलोग्राम चूर्ण पर्याप्त होगा।

 

३ भुट्टो के कीट

मज मक्खी कीट का प्रकोप महाराष्ट्र से लगे जलों में  धक देखा जाता है। सामान्यतः तापमान जब गरने लगता है तब कीट दखाई देता है। इस कीट की वयस्क मादा मक्खी नारंगीलाल रंग की होती है, जो फूलों के  ंदर  ंडे देती है।  ंडों से २ से ३ दन में इल्लयां नकलकर फूलों के  ंडकोषों को खाकर नष्ट करती है। परणामस्वरुप भुट्टों में कई जगह दानें नहीं बन पाते।  न्य कीटों की इल्लयां भुट्टों में जाले बनाती हैं  थवा बढ़ते हुये दाने खाकर नष्ट करती है। कुछ रस चूसक कीट दानों से रस चूस लेते हैं।

 

नयंत्रण

खेत में जब ९० प्रतात पौधों में भुट्टों पोटों से बाहर नकल आवें तब भुट्टों पर इण्डोसल्फान ३५ ई.सी. (४०० म.ली. प्रत एकड़)  थवा मेलाथयान ५० ई.सी. (४०० म.ली. प्रत एकड़) तरल कीट नााक को २००२५० लीटर पानी में मलाकर छड़काव करें।  ावष्यकता होने पर १०१५ दनों बाद छड़काव दोहरायें। यद तरल कीटनााक उपलब्ध न हो तो इण्डोसल्फान ४ प्रतात  थवा मेलाथयान ५ प्रतात चूर्ण का भुरकाव ५ से ६ कलोग्राम प्रत एकड़ की दर से उपयोग करें।

 

ब.

ज्वार की दाी कस्मों के पत्तों पर  नेक प्रकार के चत्तदार पर्ण रोग देखे जा सकते हैं, परंतु संकर कस्मों  ौर नई उन्नत कस्मों के पत्तों पर चत्ती रोग कम दखाई देते हैं, क्योंक उनमें इन रोगों के लये प्रतरोधकता का  नुवांाक गुण है। कंडवा रोग भी नई कस्मों में नहीं दखाई देता है।
पौध सड़न  थवा कंडवा का नयंत्रण बीज को कवकनााी दवा से उपचारत करने से सम्भव है। चूक ज्वार की नई कस्में लगभग ९५ से ११० दनों में पकती है, दाने पकने की  वस्था में वर्षा होने से दानों पर काली  थवा गुलाबी रंग की फफूद की बढ़वार दखाई देती है। दाने पोचे हो जाते हैं, उनकी  ंकुरण क्षमता कम हो जाती है  ौर मानव  ाहार के लये ऐसे दाने उपयुक्त नहीं होते हैं।

 

नयंत्रण

इस रोग के सफल नयंत्रण के लये यद ज्वार फूलने के समय वर्षा के समय वर्षा होने से वातावरण में  धक नमी हो तो केप्टान (०.३ प्रतात)  ौर डाईथेन  एम.४५ (०.३ प्रतात) के मश्रण के घोल का भुट्टों पर तीन बार फूल  वस्था के समय, दानों में दूध की  वस्था के समय,  ौर दाने पकने की  वस्था के समय छड़काव करना चाहये।

 

कटाई, गहाई एवं भंडारण

फसल की कटाई कार्यकीय परपक्वता पर करना चाहये। हर कस्म में भुट्टों के पकने का समय अलग लग होता है। ज्वार के पौधों की कटाई करके ढेर लगा देते हैं। बाद में पौधों से भुट्टों को  लग कर लेते हैं तथा कडबी को सुखाकर  लग ढेर लगा देते हैं। यह बाद में जानवारों को खलाने में काम  ाती है। दानों का दावन -ारा या थ्रेार -ारा भुट्टे से  लग कर लेते हैं। दानों को सुखाकर जब नमी १० से १२ प्रतात हो तब भंडारण करना चाहये।

 

  • धक उत्पादन लेने के लये प्रमुख बातें
  • सही समय पर बोनी करें।
  • सही कस्म का चुनाव करें।
  • खेत की जुताई च्छी तरह करें।
  • उपचारत बीज की बोनी करें।
  • पौधो की संख्या प्रत इकाई क्षेत्र उपयुक्त रखें।
  • खाद व उर्वरक का संतुलत मात्रा में तथा नर्धारत समय पर उपयोग करें।
  • खेत में पानी का नकास च्छा रखें
  • गभोट वस्था में यद ावष्यकता हो तो संचाई करें।
  • पौध संरक्षण उपाय समय पर पनायें।