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फसलों की खेती की विधिया खरीफ फसल कपास

कपास की कृष कार्यमाला

भूम का चुनाव एवं तैयारी  

बालुई दोमट या मध्यम गहरी भूम जसमें पर्याप्त जीवांष एवं उत्तम जल नकास हो, कपास की फसल के लये उपयुक्त होती है। भूम का पी.एच. मान ६.५ से ७.५ के बीच होना चाहये। फसल के पुराने अवषेष नकाल कर खेत की  च्छी सफाई करें। खेत की मट्टी देषी हल  थवा कल्टीवेटर चला कर पलटें। तीन साल में एक बार मट्टी पलटने वाले हल से खेत की गहरी जुताई करना  ावष्यक है। मानसून से पहले बखर या कल्टीवेटर से २३ बार जुताई कर खेत समतल करें।  ंतम बखरनी से पूर्व ४०४५ गाड़ी पका हु ा गोबर खाद या कम्पोस्ट प्रत एकड़ की दर मलायें। तीन वर्ष में एक बार जंक सल्फेट १० कलोग्राम प्रत एकड़ की दर से गोबर खाद में मलाकर दें।

 

जातयाँ : क्षेत्र उपयुक्त जातयॉ
नमाड़ घाटी खंडवा२, जवाहर ताप्ती, जे.के.४, वक्रम, एल.आर.ए.५१६६, हाइब्रडजे.के.एच.१, जे.के.एच.२ एवं जवाहर  ाकाष
ाालवा का पठार वक्रम, जवाहर ताप्ती, हाइब्रड संकर८, ज.ेके.एच.१, ज.ेके.एच.२, एवं जवाहर आकाष
नर्मदा घाटी जवाहर ताप्ती, जे.के.४हाइब्रड एन.एच.एच.४४, जे.के.एच.२ एवं जवाहर आकाष
सतपुड़ा का पठार जवाहर ताप्ती, जे.के.४, एल.आर.ए.५१६६, हाइब्रडजे.के.एच.२, संकर८, संकर१० एवं एन.एच.एच.४४

 

बीज की मात्रा :

संचत/अर्द्घसंचत बीज की मात्रा, कलोग्राम प्रत एकड़
अमेरकन कपास          देषी कपास संकर कपास
संचत/अर्द्घसंचत २.२.५ २.५३ ११.५
संचत २.५३ ३.२०४ १.२२

 

बोनी का समय :
संचत क्षेत्र में पलेवा देकर कपास की बोनी २५ मई से जून के प्रथम सप्ताह तक करें। असंचत कपास की बोनी वर्षा प्रारम्भ होने के एक सप्ताह पूर्व या वर्षा प्रारम्भ होने पर सरता या चौफुली पद्घत से करें।

बीजोपचार :
बोने से पूर्व बीज को प्रत कलोग्राम २.५ ग्राम कार्बेन्डाजम या केप्टान दवा से उपचारत करें। इमडाक्लोप्रड ७.० ग्राम  थवा कार्बोसल्फान २० ग्राम प्रत कलो ग्राम बीज उपचारत कर बोने से फसल को ४० से ६० दन तक रस चूसक कीड़ों से सुरक्षा मलती है।

बुवाई वधः
संकर कपास ९०न्९० से.मी. या १२०न्९० से.मी. की दूरी पर लगायें तथा उन्नत जातयांें के लये ६०न्६० से.मी. की दूरी सामान्यतः रखें। हल्की भूम में यह दूरी ४५न्४५  थवा ४५न्३० से.मी. रखी जा सकती है। ।

खाद एवं उर्वरक :
जीवाा खाद :

गोबर की खाद, कम्पोस्ट/नाडेप कम्पोस्ट १६१८ गाड़ी प्रत एकड़, नीम की खली १०१२ कलो ग्राम प्रत एकड़ डालें।
ब. रासायनक उर्वरक : संतुलत मात्रा में रासायनक उर्वरकों के उपयोग  ावष्यक है। नम्न मात्रा (कलोग्राम प्रत एकड़) में उर्वरकों का उपयोग करना चाहये।

 

संचत ६४ नत्रजन     ३२ स्फुर १६ पोटाा
अर्र्द्घसंचत ४० नत्रजन २४ स्फुर १६ पोटाा
संचत ३२ नत्रजन १६ स्फुर १६ पोटाा

 

उर्वरक देने का समय उर्वरक की मात्रा (प्रतात में)
  संचत असंचत
  नत्रजन फास्फोरस पोटाा नत्रजन फास्फोरस पोटाा
बोनी के समय १०                       ५० ५० ५० ५० ५०
अंकुरण के १ माह बाद २५ - - ३३ - -
अंकुरण के २ माह बाद २५                        ५० ५० ३३ ५० ५०
अंकुरण के ३ माह बाद २५ - - - - -
 ंकुरण के ४ माह बाद १५ - - - - -

 

बोनी के समय खाद बीज के नीचे ६१० से.मी. गहराई पर दें। अंकुरण के ६०६५ दन बाद पौधे के पास रंग पद्घत  थवा कॉलम पद्घत से गड्ढे बनाकर उर्वरक दें।

 ंतरवर्तीय खेती :
कपास के साथ उड़द, सोयाबीन, मूंगफली की  ंतरवर्तीय फसल लाभप्रद पाई गई है। इसे कतार छोड़ कतार जोड़ पद्घत से लगायें। इसके  तरक्त संकर मक्का या तल की  ंतरवर्तीय फसल लेना लाभकारी पाया गया है।
क. कपास की हर २ कतार के बाद दो कतार  ंतरवर्तीय फसल लगायें। संचत में  ंतरवर्तीय फसल की कतारें ४५ से.मी. तथा  संचत में ३० से.मी. दूरी पर लगायें।
ख. कपास की हर ६८ कतारों के बाद  रहर की दो कतार लगाना लाभप्रद रहता है।

जीवत बछावन :
संचत कपास में कतारों के बीच, उड़द, मूंग, सोयाबीन  थवा फेंचबीन ३०३५ कलोग्राम प्रत एकड़ की बीज दर से लगायें। इसे  ंकुरण के २५ दन बाद खेत में मला दें। इससे खेत की नमी काफी दनों तक बनी रहती है एवं भूम की उर्वरा ाक्त बढ़ती है।

 

संचाई :
वर्षा समाप्त होने पर हल्की भूम में १२१५ दन तथा मध्यमभारी भूम में २५३५ दन के अंतराल पर  ावष्यकतानुसार संचाई करे। कली एवं फूल बहार के समय नमी की  ावष्यकता  धक होती है। प्रत्येक बार एक कतार छोड़कर संचाई करे।

खरपतवार नयंत्रण :
 ंकुरण के २०२५ दन पष्चात्‌ हाथ से नंदाई कर कोल्पाडोरा चलायें। वर्षा के बीच समय मलने पर डोरा चलायें तथा हाथ से नदाई करते रहें।
नींदा नााक रसायन लासो (ऐलाक्लोर) २ लीटर या पेंडीमथलीन २ क.ग्रा. या डाययूरान ३०० ग्राम सक्रय तत्व दवा प्रत एकड़ के मान से २००२५० लीटर पानी में घोल कर बुवाई के बाद एवं  ंकुरण से पहले छड़काव करें। दवा के प्रयोग के समय खेत में पर्याप्त नमी होना चाहये।

कपास की चुनाई :
केवल पूरी तरह खले घेटों से कपास की चुनाई करें।
ब. गीले कपास की चुनाई न करें।  ोस सूखने के बाद दन में कपास की चुनाई करें।
स. चुुने हुये कपास में पेड़ के सूखे पत्ते, डंठल, मट्टी  ाद रहने पर कपास की गुणवत्ता कम हो जाती है तथा बाजार भाव कम मलता है।
द.  ाखरी तुड़ाई का कपास पहले की चुनाई में ना मलायें।

पौध संरक्षण :
 कीट :

कपास में मुख्यतः दो प्रकार के कीटों का प्रकोप देखा गया है

  1. रस चूसने वाले कीट : हरा मच्छर, माहो, तेला एवं सफेद मक्खी। इन कीटों का प्रकोप जुलाई से सतम्बर के मध्य प्रायः होता है। प्रकोपत पौधे की पत्तयाँ लाल व कुकड़ जाती है, फलस्वरुप पौधों की बढ़वार बहुत कम होती है।
  2. डेडूं छेदक इल्लयाँ : इनमें मुख्यतः चत्तीदार इल्ली, चने की इल्ली (अमेरकन बालवर्म) एवं गुलाबी इल्ली है।

अ. चत्तीदार इल्ली : इस इल्ली का प्रकोप फसल  ंकुरण से १५२० दन की  वस्था पर एवं डेण्डू बनने पर होता है। प्रकोप  गस्त से सतम्बर माह के मध्य  धक होता है।
ब.  मेरकन बालवर्म :  फूल  वस्था पर इसका प्रकोप ाुरु होता है। प्रकोपत पुड़यों के सहपत्र चौडे. होकर फैल जाते हैं व डेण्डू ों में खुले बड़े छेद पाये जाते हैं। इन इल्लयों का प्रकोप  गस्तसतम्बर से  क्टूबरनवम्बर तक होता है।
स. गुलाबी इल्ली : मालवा एवं नमाड़ में इस कीट का प्रकोप कम होता है। इल्ली फूलों की पंखुड़यों को जाले से लपेट कर फरकनी का  ाकार बना लेती है।

नयंत्रण :

  1. फसल कटाई उपरांत अवोषों को नष्ट करें।
  2. ग्रीष्मकालीन भण्डी की फसल को प्रैल में समाप्त करें।
  3. बोनी वर्षा ागमन के पूर्व सूखे खेतों में या वर्षा के तुरंत बाद करें।
  4. कपास के साथ चौला ंतरवर्तीय फसल के रुप में लेवें।
  5. रस चूसने वाले कीट सहनाील प्रजातयाँ खण्डवा २, जे.के.४, ताप्ती, जे.के.एच.वाय१ लगावें।
  6. बीजोपचार इमडाक्लोप्रड ७ ग्राम प्रत कलोग्राम बीज के हसाब से करें।
  7. रस चूषक कीटों के प्रत सहनाील कस्मों को लगावें तथा दो माह तक कीटनााकों का छड़काव न करें।
  8. ावष्यकतानुसार ५ प्रतात नम्बोली का रस एवं नीम का तेल ४०० म.ली. प्रत एकड़ के मान से छड़काव करें।
  9. फसल की ६०९० दन की वस्था के दौरान (यद ४० पौधों में से २० पौधों की फूल पुड़यों कीट/प्रकोपत है व सहपत्र चौड़े हैं) तब ट्रायकोगामा ६०००० ंडे प्रत एकड़ की दर से या एन.पी.व्ही. १०० लीटर प्रत एकड़ थवा इण्डोसल्फान दवा का छड़काव करें।
  10. फसल की उपरोक्त वस्था पर ार्गेनोफास्फेट्‌स या पायरेथ्राइड्‌स दवा का छड़काव नहीं करें।
  11. छड़काव के २३ दन बाद ोष बची हुई इल्लयों को एकत्रत कर नष्ट करें।
  12. अक्टूबर के -तीय सप्ताह के बाद इण्डोसल्फान का छड़काव नहीं करें।
  13. नर्धारत ार्थक क्षत स्तर, ई.टी.एल. (२० लार्वा प्रत २० पौधे) होने पर क्यूनालफास थवाा क्लोरपायरीफास या प्रोफेनोफास २०२५ म.ली. प्रत लीटर पानी के हसाब से छड़काव करें।
  14. फेरोमोन्स ट्रेप २ प्रत एकड़ गुलाबी इल्ली (पंक बालवर्म) के लये उपयोग करें।
  15. वलम्ब से ाने वाले मेरकन बालवर्म एवं पंक बालवर्म का प्रकोप फसल की ३०१२० दन की वस्था पर होता है। इसके नयंत्रण के हेतु पायरेथ्राइड्‌स का उपयोग सेसेमम ॉयल (४०० म.ली. प्रत एकड़) के साथ प्रभावााली पाया गया है।
  16. दो या तीन दवा ों को एक साथ मलाकर न छड़कें
  17. एक ही प्रकार की दवा का लगातार उपयोग नहीं करें।

 

ब. रोग : बीज को अम्ल उपचारत करने के बाद बोते समय स्ट्रेप्टोसायक्लन के २०० पी.पी.एम. घोल में २० मनट तक डुबोयें। जीवाणु झुलसा रोग की रोकथाम हेतु फसल (वोषकर हाइब्रड४, डी.एस.एच.३२) पर फायटोलान या ब्लायटाक्स ५० एक कलोग्राम / स्ट्रेप्टोसायक्लन ६ ग्राम प्रत एकड़ का १५ दन के  ंतर पर छड़काव करें। रोग रोधी संकर कस्में जे.के.एच.१ तथा जे.के.एच.२ का चयन करें। इन्हीं दवा ों के प्रयोग से  ाल्टनेरया, माइरीधीसयम पर्ण झुलसा तथा डेण्डू सड़न एवं दाहया (रेमूलेरया) रोग का भी नयंत्रण हो जाता है। जड़ स.ड़न राग की रोकथाम हेतु केप्टान ३ ग्राम प्रत कलोग्राम बीज के मान से उपचार करें तथा कपास के साथ मोठ एवं मूँग की  ंतरवर्तीय फसल लगायें। पौधें सूखने (नई वल्ट) की समस्या के नदान के लये मुरझाते हुये पौधों की जड़ों में डी.ए.पी / यूरया के घोल का ३४ लीटर प्रत पौधा दें। १०० लीटर घोल के लये १२०० ग्राम डी.ए.पी. तथा ६०० ग्राम यूरया पर्याप्त होगा।

 ावष्यक सुझाव :

  1. क्षेत्र के अनुसार सफारा की गई कस्म लगायें।
  2. बीजोपचार कर सही वध से उचत समय पर बोनी करें।
  3. वभन्न रासायनक उर्वरक उचत मात्रा में सही वध से उचत समये पर दें।
  4. ऐजेटोबेक्टर एवं पी.एस.बी. कल्चर का उपयोग न करें।
  5. खरपतवार नयंत्रण एवं पौध संरक्षण तकनीक पनायें।
  6. संचत कपास की फसल के बीच जीवत बछावन का उपयोग कर खेत में धक समय तक नमी बनाये रखें।