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कोदोंकुटकी  की कृष कार्यमाला

भूम का चुनाव एवं तैयारी
 
इसकी खेती के लये दोमट एवं हल्की दोमट भूम उपयुक्त है । खेती के लये वे ही खेत चुनने चाहये जो ऊँचे हो, वर्षा का पानी रूकने वाले खेतों में बोनी नहीं की जाती है । प्रायः कम उपजाऊ, पहाड़ी या पठारी, कंकरीली जमीन में इन फसलों का अधक प्रचलन है। भूम को एक बार मट्टी पलटने वाले हल एवं २३ बार देाी हल से जुताई के बाद खेत में पाटा चलाकर ढेलों को तोड़ देना चाहये एवं खेत को समतल कर देना चाहये ।

जातयाँ :
प्रदेा में नम्नलखत उन्नत कस्मों का  नुांसत कया गया है।

क्रमांक कस्म पकने की अवध बालयों की लम्बाई पैदावार क्वं./एकड़ (दाने)
(अ) उन्न्ताील जातयाँ
१      नवास नं१ ११५ दन ९.५ से.मी. ६७.२० क्वं.
२                 डंडोरी७३ ११२ दन ७.४ से.मी. ६८ क्व.
३                पाभी ११२ दन ७.७ से.मी. ७.२०८ क्वं.
(ब) अन्य उन्नत कस्में
पी.एस.सी.१, २आर.पी.एस.४१, ७६पी.एल. ार.१जे.एन.के.३६४ १०१०५ दन           ९.५ से.मी. ७.२०८ क्वं.
जे.के.४१, जे.के.६२, जे.के.७६ ८५ दन  ७.७ से.मी. ६७.२० क्वं.

 

इनके अलावा कोदों व कुटकी की कई उन्नताील कस्मों का वकास जवाहर लाल नेहरू कृष वववद्यालय के डण्डोरी एवं रीवा  नुसंधान केन्द्रों -ारा कया गया है । ये कस्में जवाहर'' नाम से ही प्रचलत हैं ।

जलवायुः
५० से ७५ से.मी. वर्षा वाले क्षेत्र में इसकी खेती की जाती है । उष्ण एवं समाीतोष्ण जलवायु वाले क्षेत्र में इसकी खेती सुगमता से की जा सकती है। मध्यप्रदेा में मण्डला, डण्डोरी, उमरया, छन्दवाड़ा, सीधी, रीवा, बालाघाट, बैतूल, कटनी, जबलपुर  ाद जलों में यह एक प्रचलत फसल है ।
 

बीज की मात्रा :

६८ कलो प्रत एकड़

बोने की वध
:
कोदो को छडककर या बखेर कर बोनी की जाती है, इसमें पौधों के बीच की दूरी बराबर नहीं होती है । बीज को २५३० से.मी. की दूरी पर बनी पंक्तयों या सीडड्रल -ारा बोना चाहये । पौधों के बीच का  न्तर ८१० से.मी. होना चाहये एवं बीज के दानों की गहराई लगभग २३ से.मी.।

फसल चक्रः
कोदो की फसल के पचात रबी में जौ, मसूर, चना,  लसी व सरसों  ाद फसल उगा सकते हैं । इसे  रहर, ज्वार, मक्का, धान के ऊपरी खेती में सांवा के साथ मश्रत रूप से उगा सकते हैं । हल्की भूम में तल व  रहर के साथ व भारी भूमयों में  रहर, कोदो, उड़द, ज्वार  ाद के साथ उगा सकते हैं ।

 

खाद एवं उर्वरकः
कोदो को प्रत हेक्टर १६ कलो नाईट्रोजन १२ कलो फास्फोरस एवं ८ कलो पोटाा प्रत एकड़ की आवयकता होती है बुवाई के पहले खेत में छड़काव कर उर्वरक मला देना चाहये । जैवक खाद को बु ाई से २०२५ दन पहले छड़ककर  च्छी तरह खेत में मला देना चाहये ।

संचाई एवं नंदाई गुड़ाईः
कोदो वर्षा ऋतु में बोई जाती है । यद पानी बरसने में वलम्ब हो तो एक संचाई देना चाहये । २३ बार नदांई गुड़ाई करना  ावयक है ताक खरपतवार नष्ट हो जावे एवं पौधों का उचत वकास हो सके ।

कीट एवं बीमारयाँ :

  1. कीट बहार रूएंदार सुंडी : पत्तयों को हान पहुंचाती है। कभीकभी तने पर भी आक्रमण करती है । उपचार हेतु थायोडान ३५ ई.सी. घोल के ०.१५ऽ घोल को २५०३०० लीटर पानी प्रत एकड़ छड़काव करें ।
  2. ग्रास हापर (टड्डा) : पत्तयों को हान पहुँचाता है । बचाव हेतु पेराथयान २ऽ चूर्ण को १० कलो प्रत एकड़ प्रयोग करें ।
  3. तनाछेदक या तना मक्खी : इसके नयंत्रण के लये थीमेट १० जी दानेदार ६ कलो प्रत एकड़ का उपयोग करें ।
  4. सफेद ग्रब : पेराथयान २ऽ चूर्ण ६ कलो प्रत एकड़ गोबर में मलाकर खेत में बराबर बखेर दें ।

 

बीमारी :कंडुआ रोग :
इसमें पूरी बाली काले चूर्ण जैसे पदार्थ से ढ़क जाती है । रोग ग्रस्त पौधा  न्य पौधों से ऊँचा होता है । इसकी रोकथाम हेतु बीजों को बोनी पूर्व गर्म पानी से उपचारत करें । बीजों को ५ डग्री से.ग्रे. तापमान में ७१० मनट रखना चाहये एवं बोने के पहले एग्रोसान जी.एन. फफूंदनााक दवा से उपचार करें

कटाई मड़ाई :
फसल ९०१४० दन में सतम्बर  नवम्बर तक पककर तैयार हो जाती है। या तो केवल बालयों को काटकर सुखाकर तथा कूटकर दाना  लग कर लया जाता है या फर पूरा पौधा ही काटकर, सुखाकर  ौर बेलों -ारा मड़ाई करके दाना नकाला जाता है।

उपज :
दाना ४६ क्वंटल प्रत एकड़
भूसा ८१० क्वंटल प्रत एकड़