अन्य लिंक

 

मक्का की कृष कार्यमाला

 

भूम का चुनाव एवं तैयारी

मध्यम से भारी भूम जसमें जल नकास अच्छा हो, सबसे उपयुक्त होती है। लवणीय, क्षारीय एवं नचली भूम जहां पानी का भराव होता हो वहां मक्का नही लगाना चाहये। खेत की एक या दो बार हल से जुताई करें तथा बाद में दो बार बखर चलाकर मट्टी को  च्छी तरह भुरभुरी बना लेना चाहये।  ंतम बखरनी के समय २ प्रतात फालीडाल डस्ट ८ से १० कलो प्रत एकड़ की दर से भुरकाव करना चाहये ।

 

मक्का की जातयाँ

क्षेत्र की उपयुक्ता के  नुसार मक्का की उन्नत जातयों का चुनाव करना चाहये । मक्का की उन्नत जातयाँ नम्नानुसार है :

 

 संकर जातयाँँ

  1. गंगा५ इसके पौधे मजबूत, भुट्टा ांकु ाकार का तथा दानों का रंग पीला होता है । यह १०५११० दनों की वध में पककर तैयार हो जाती है । इसकी ौसत पैदावार २० से २६ क्वंटल प्रत एकड़ होती है ।
  2. गंगा सफेद२ गंगा सफेद२ के दाने सफेद होते है । यह जात मध्यप्रदेा के पचमी जलों के लये उपयुक्त है । यह जात १०५११० दनों में पकती है एवं इसकी पैदावार २० से २६ क्वंटल प्रत एकड़होती है।
  3. डेक्कन १०१ इसके पौधे ऊँचे, भुट्टे मध्यम ाकार के एवं दानों का रंग पीला होता है । यह जात ११०११५ दनों में पककर तैयार हो जाती है । इसकी पैदावार २४ से २६ क्वंटल प्रत एकड़ होती है ।

 

मक्का की कम्पोजट जातयाँ (संकुल)

 

  1. पूसा कम्पोजट१ : यह कम्पोजट मक्का की जल्दी पकने वाली जात है जो ८० से ८५ दनों में पक जाती है । इसका दाना चपटा होता है एवं इसकी औसत पैदावार १२१४ क्वंटल प्रत एकड़ होती है ।
  2. पूसा कम्पोजट११ : ९०९५ दनों में पककर तैयार हो जाती है । इसका दाना पीला तथा ाकार चपटा होता है । इसका उत्पादन १४ से १६ क्वंटल प्रत एकड़ होता है ।
  3. नवजोत : यह जात ९०९५ दनों में पकती है एवं इसका ौसत उत्पादन १४१६ क्वंटल प्रत एकड़ होता है । इसके भुट्टे मध्यम ाकार के तथा दानों का रंग नारंगी होता है । इसके दाने चपटे ाकार के होते हैं । देाी कस्मों की तुलना में यह धक बीमारी रोधक जात है ।
  4. चंदन मक्का३ : इसके पौधे मजबूत एवं इसकी पत्तयों का रंग काला होता है । यह १००१०५ दनों में पक जाती है । इसमें ज्यादातर पौधों में दो भुट्टे लगते हैं एवं इसकी पैदावार ौसतन २४ से २६ क्वंटल प्रत एकड़ होती है ।

 

सूर्या एवं जवाहर मक्का

ये जातयाँ ९०९५ दनों में पककर तैयार हो जाती है एवं इनकी औसत उपज १४१६ क्वंटल प्रत एकड़ होती है । इनका दाना पीला एवं  ाकार में कुछ चपटा होता है ।

 

बीज

मक्का का बीज छोटे या बड़े दानों के  ाकार के  नुसार लगता है जो प्रायः ६ से ७ कलो प्रत एकड़ की दर से बोया जाता है ।

 

बोने का समय एवं तरीका

मक्का की फसल वर्षा होने पर बोई जाती है । यद कृषकों के पास संचाई का साधन हो तो १०१५ दन पूर्व में बो ाई करने से इसकी  धक पैदावार मलती है । बु ाई में कतार से कतार की दूरी ७५ से.मी. (२ १/२ फीट) एवं पौधों से पौधों की दूरी २० से.मी. ( ८'') रखनी चाहये । मक्का का बीज ३ से ५ से.मी. गहराई पर बोने से  ंकुरण होता है । इसे  धक गहरा नहीं बोना चाहये क्योंक फर मक्का के बीज का  ंकुरण कम होता है ।

 

जैविक खाद

मक्का की फसल में ाीघ्र पकने वाली जातयों में नाडेप कम्पोस्ट ६ से ८ टन या वर्मी कम्पोस्ट ३.५४ टन प्रत एकड़ तथा देर से पकने वाली जातयों में ८१० टन नाडेप कम्पोस्ट या ४ से ५.२५ टन वर्मी कम्पोस्ट प्रत एकड़ देने से मक्का का भरपूर उत्पादन मलता है । इसके साथ ही पी.एस.बी. कल्चर ८०० कलोग्राम प्रत एकड़ डालना चाहये जससे फसल को अघुलनाील फास्फोरस उपलब्ध हो सके ।
 मृत भभूत पानी,  मृत संजीवनी एवं मटका खाद का ३ से ४ बार उपयोग करने से मक्का की फसल  च्छी होती है ।

 

रासायनक खाद

मक्का में रासायनक उर्वरकों का प्रयोग वैसे तो मट्टी परीक्षण के  ाधार पर करना चाहये कन्तु सामान्यतः संक र जातयों के लये ४८ नत्रजन २० स्फुर तथा १६ कलो पोटाा प्रत एकड़ तथा देर से पकने वाली जातयों के लये ४० नत्रजन, १६ स्फुर तथा १२ कलो पोटाा प्रत एकड़ देना चाहये।

भारी भूम में नत्रजन की १/३ मात्रा बो ाई के समय एवं ोष २/३ मात्रा लगभग एक माह की फसल होने पर देना चाहये । फास्फोरस एवं पोटाा की पूर्ण मात्रा बु ाई के समय या पूर्व में देना चाहये । हल्की भूम में ोष २/३ मात्रा दो बार जब पौधों ६० से.मी. हो या ३० दन के एवं मांझर नकलते समय देना चाहये।
यद मट्टी परीक्षण के  ाधार पर भूम में जंक की कमी पाई जावे तो भारी भूम में २० कलो तथा हल्की भूम में १० कलो प्रत एकड़ की दर से जुताई से पूर्व जंक सल्फेट डालना चाहये ।

 

नदाई गुड़ाई

मक्का की फसल के बुआई के तुरन्त बाद या  ंकुरण होने के पूर्व भूम में नमी होने पर टेफजीन ६०० ग्राम या एट्राजीन ४०० ग्राम प्रत एकड़ की दर से छड़काव करना चाहये । इससे प्रमुख नींदा ों का नयंत्रण होगा ।

बोनी के १५२० दन बाद कतारों के बीच में डोरा चलाते है जससे नंदाई एवं गुडाई दोनों ही होते है । बोनी के ३० दनों बाद जब पौधे ६० से.मी. ऊँचे हो तब मट्टी चढ़ना चाहये । मांझर नकलते समय यद वर्षा न हो एवं संचाई करने की सुवधा हो तो, इस समय कृषकों को पानी देना चाहये ।

खेत में पानी का नकास  वय होना चाहये क्योंक एक ही स्थान पर पानी जमा होने से फसल की बढ़वार रूकती है एवं पैदावार में कमी  ाती है ।  धक वर्षा वाले क्षेत्रों में मक्का की बो ाई मेंढ़ो ं पर करना चाहये ।

 

पौध संरक्षण   

जैवक कीट नयंत्रण :

मक्का की फसल में तनाछेदक इल्ली, कम्बल कीड़ा,  ार्मीवर्म, ग्रास होपर, जेसड एवं एफडस  ाद का नयंत्रण जैवक कीट नयंत्रण -ारा सफलपूर्वक नम्नानुसार तरीकों से कया जा सकता है

  • हेलकोवर्पा एन.पी.व्ही. १०० एल.ई (इल्ली समतुल्य) घोल का प्रत एकड़ छड़काव करें।
  • तना छेदक हेतु ट्राइकोग्रामा चलोनस के ३०००० हजार ण्डे प्रत एकड़ प्रत सप्ताह की दर से फसल में छोड़ें।
  • एपेन्टालस, ट्रायकोग्रामा, लेडी बर्ड बीटल, एवं मकड़ी इत्याद मत्र कीटों का संरक्षण करें।

 

रासायनक कीट नयंत्रण :

 (१) व्हाइट ग्रब : इसकी इल्लयाँ पौधे की जड़ों को काटती है ।

 

रोकथाम


थायोडान डस्ट ४ऽ या फालीडाल डस्ट २ऽ या कार्बोरल १०ऽ डस्ट का ८ से १० कलो प्रत एकड़ की दर से जुताई के पूर्व बुरकाव कर, फर जुताई करें।

  (२) तनाछेदक इल्ली : इसकी इल्लयाँ कोमल पत्तों को खाकर तने में घुस जाती है जससे पौधों के बीच का भाग सूख जाता है एवं डेड हार्ट बन जाता है ।

 

रोकथाम

इसकी रोकथाम के लये डेमेक्रान ३५ ई.सी. ८० म.ली. को २०० लीटर पानी में मलाकर प्रत एकड़ छड़काव करें या थायोडान दानेदार दवा ४ कलो प्रत एकड या कार्बोफ्यूरॉन ४ जी  ४६ दाने प्रत पोंगली के हसाब से पौधों की पोंगलयों में डालें।

इसके अलावा कम्बल कीड़ा, ग्रास होपर,  ार्मीवार्म, जेसड, एफडस  ाद का नयंत्रण नुवाक्रान ३६ ई.सी. २०० म.ली. या इन्डोसल्फान ३५ ई.सी. ४०० म.ली को २०० लीटर पानी में मलाकर प्रत एकड़ छड़काव करें ।
या
डस्ट में थायोडान डस्ट ४ऽ या फालीडाल डस्ट २ऽ या इकालक्स डस्ट १.५ऽ को ८ कलो प्रत एकड़ की दर से भुरकाव करें ।

 

बीमारयाँ  :

लीफ स्पाट : इस बीमारी में लम्बे, गहरेभूरे रंग के धब्बे होते हैं । इन धब्बों के ज्यादा होने पर पत्तयाँ सूख जाती हैं ।

 

रोकथाम  :
इसकी रोकथाम के लये डाइथेन जेड़७८ की २८० से ३२० ग्राम मात्रा पानी में मलाकर प्रत एकड़ में छड़काव करें ।

 

फसल कटाई एवं गहाई   :
जब भुट्टे अच्छी तरह पककर सूख जावें तो फसल काट लेना चाहये । भुट्टों के ऊपर के पत्ते हाथ से नकालते हैं एवं बाद में भुट्टों के दाने मेज ोलर या हंसया से नकालते हैं । जब दानों में १० से १२ऽ  ार्द्रता रहे तब इसका भण्डारण करना चाहये । दानों का भण्डारण करने के पूर्व बोरों पर ०.०५ऽ मेलाथयान का घोल छड़काव करें एवं  च्छी तरह बोरों को सुखाने के बाद ही उनमें दानों का भण्डारण करें । बण्डों में भी ०.०५ऽ का मेलाथयान का घोल बनाकर छडकें एवं सूखने पर भण्डारण करें । जैवक रूप से भण्डारण में नीम की पत्तयाँ मलाकर रख सकते हैं।