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मसूर की कृष कार्यमाला

 

भूम का चुनाव एवं तैयारी - 

 

मसूर सभी प्रकार की भूम में उगाथ्द्यर्; जा सकती है। कन्तु दोमट और भारी भूम थ्द्य;सके लये धक उपयुक्त है। भूम का पी.एच. मान ६.५ से ७.० के बीच होना चाहये तथा जल नक ास का च्छा प्रबंध होना चाहये। खाली खेतों में ३४ जुताथ्द्यर्; कर खेती च्छी तरह तैयार करें एवं खरीफ के खेत खाली होने के बाद २३ जुताथ्द्यर्; करदडद्मद्र;दडद्मद्र;दडद्मद्र;दडद्मद्र; पाटा चलाये जसे नमी संचत हो सके । खरपतवार होने पर उन्हे नकाल दें ।

मसूर की उन्नत कस्में -

 

 

कस्म पकने की अवध

औसत पैदावार

क्व/एकड़

अन्य
जवाहर-१ ११०-११५ दन १० -१४ इसका दाना मध्यम आकार का होता है।
जवाहर-३ ११०-११५ दन १० -१५ उकटा अवरोधी दाना बड़ा। दाना मध्यम  ाकार का होता है।
एल ४०७६ ११५-१२५ दन  १० -१५ गेरूआ तथा उकटा  वरोधी , दाना मध्यम ।

के-७५

मलका

११५-१२० दन १० -१२ दाना छोटा होता है।
आई.पी.एल-८१ ११०-११५ दन  १० -१२ दाना मध्यम आकार का होता है।

बीज एवं बीजोपचार -

 

मसूर का बीज १६१८ कलो एकड़ एकड़ लगता है । बीज को प्रारंभक अवस्था में फफूंद जनत रोगों से बचाने के लये बु ाथ्द्यर्; के पूर्व थाथ्द्य;रम / कार्बन्डाजम २ः१ की ३ ग्राम मात्रा से प्रत कलो बीज उपचारत करें। थ्द्य;सके बाद राथ्द्य;जोबयम तथा पी.एस.बी. कल्चर प्रत्येक की ५ ग्राम मात्रा प्रत कलो बीज उपचारत करें ।

बुआथ्द्यर्; का समय एवं तरीका -

 

अक्टूबर के मध्य बु ाथ्द्यर्; के लए उपयुक्त समय है । बु ाथ्द्यर्; में देरी होना उपज में कमी लाती है । १५ नवम्बर तक का समय मसूर फसल की बु ाथ्द्यर्; देरी की वस्था में की जा सकती है । मसूर की कतार से कतार की दूरी २५३० से.मी. एवं ५७ से.मी.गहरा बोना चाहए।

खाद एवं उर्वरक - 

 

गोबर का खाद या कम्पोस्ट २२.५ टन प्रत एकड़ डाले। मसूर की फसल ज्यादातर असंचत क्षेत्रों में ली जाती है। जसमें ६८ नत्रजन १६२० क.स्फुर ६८ क.गंधक प्रत एकड़ देते है । संचत वस्था में ६८ कलो नत्रजन ौर १२१६ कलोग्राम फास्फोरस तथा संचत क्षेत्र में ८१० कलो नत्रजन ौर २० कलो फास्फोरस प्रत एकड़ के हसाब से देना चाहए । च्छी पैदावार के लए ६८ कलो गंधक देना उपयुक्त है। भूम मे पोटाष की कमी हो तो ८१० क.ग्रा. पोटाष प्रत एकड़ देना चाहये।

संचाथ्द्यर्; - 

 

सामान्यतः मसूर असंचत क्षेत्रों में ली जाती है । परन्तु संचाथ्द्यर्; उपलब्ध होने पर पलेवा देकर बुवाथ्द्यर्; करना चाहये। थ्द्य;ससे ंकुरण च्छा होता है। सामान्यतः बाद मं संचाथ्द्यर्; की ावष्यकता नही होती है। संचाथ्द्यर्; उपलब्ध होने पर फूल ाने के पूर्व हल्की संचाथ्द्यर्; करना चाहये। थ्द्य;ससे भरपूर पैदावार ली जा सकती है।

खरपतवार प्रबंधन - 

 

मसूर की फसल में ५० दनों तक खरपतवारों को नयंत्रत रखना चाहये। खेत में नींदा उगने पर हेन्ड हा या डोरा चलाना चाहये, थ्द्य;ससे खरपतवार नयंत्रण होगा तथा वायुसंचार के लये गुड़ाथ्द्यर्; भी हो जाती है। रासायनक खरपतवार नयंत्रण के लये बुुवाथ्द्यर्; पूर्व फ्लूक्लोरोलन ३०० ग्राम सक्रय तत्व प्रत एकड़ २५० लीटर पानी में घोल कर छड़काव करें।

पौध संरक्षण-

 

अ. कीट- 

मसूर में माहो, थ्रप्स तथा फली छेदक थ्द्य;ल्ली कीटों का प्रकोप होता है। माहो एवं थ्रप्स के नयंत्रण के लये मोनोक्रोप्टोफास एक म.ली. मेटासस्टाक्स १.५ म.ली. प्रत लीटर पानी में घोलकर छड़काव करें। फल छेदक थ्द्य;ल्ली के लये थ्द्य;न्डोसल्फास व २ म.ली. प्रत लीटर पानी या क्यूनालफास एक म.ली. प्रत लीटर पानी के हसाब से घोलकर छड़काव करने से कीट नयंत्रत हो जाते हैं। खेत में छड़काव एक समान होना चाहये।

बीमारयां - 

मसूर में मुख्य रुप से उक्टा तथा गेरुआ रोगों का प्रकोप रहता है। उक्टा रोग की उग्रता को कम करने के लये थायरम ३ ग्राम या १.५ ग्राम थायरम / १.५ ग्राम कार्बान्डाथ्द्य;जम का मश्रण प्रत कलों बीज को उपचारत करके बोयें। उक्टा नरोधक जात जैसे जे.एल.३ ाद बोयें। कभीकभी गेरु ा रोग का भी प्रकोप होता है। थ्द्य;सके नयंत्रण के लये डायथेन एम ४५, २.५ ग्राम प्रत लीटर पानी के हसाब से घोल बनाकर खड़ी फसल में छड़काव करना चाहये। गेरु ा प्रभावत क्षेत्रों में एल. ४०७६ ाद गेरु ा नरोधक जातयां बोयें।

कटाथ्द्यर्; गहाथ्द्यर्; एवं भंडारण - 

फसल को पूर्ण रूप से पक जाने पर उसकी कटाथ्द्यर्; करें एवं कटाथ्द्यर्; पचात गहाथ्द्यर्; कर बीजो को सुखाकर बोरों या बण्डों में ०.०५ मेलोथयॉन का घोल छड़ककर सूखने पर भण्डारण करें ।