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मटर की कृष कार्यमाला

भूम का चुनाव एवं तैयारी :

अच्छी पैदावार के लये उत्तम जल नकास वाली दोमट भूम उपयुक्त होती है। सर्वप्रथम भूम की जुताथ्द्यर्; हल से दो बार करके बखर चलाकर भुुरभुरी बना लेना चाहये एवं पाटा की सहायता से खेत का समतल कर लेना चाहये।

उन्नत प्रजातयाँ :

 

क्र कस्म का नाम पकने की अवध पैदावार (क्विंटल प्रत हेक्टर) वोषतायें
नई उन्नत कस्में
अम्बिका १०० -१२५ १५-२० पाउडरी मल्डयू रोधी
आई.पी.एस. ९९२५ १११ २३ पाउडरी मल्डयू रोधी उंची कस्म
आई.पी.एस. ार.-४०० १०९ २० पाउडरी मल्डयू रोधी छोटी कस्म
आई.पी.एस.डी. ९९१३ १०२ २३ पाउडरी मल्डयू रोधी उंची कस्म

 

उत्पादन तकनीक:

जलवायुः मटर की फसल अच्छी बढ़वार एवं धक पैदावार प्राप्त करने के लये ठण्डे ाुष्क वातावरण की ावयकता होती है। ५ से. तापक्रम पर बीज ंकुरत हो जाते हैं। २२ से. तापक्रम मटर के लये उपयुक्त होता है।

खाद एवं उर्वरक : गोबर की अच्छी सड़ी खाद ४ से ६ टन, स्फुर २४ क.ग्रा. तथा पोटाा १६ क.ग्रा. प्रत एकड़ की दर से ाखरी बखर के पहले भूम में फैलाकर च्छी तरह समानरुप से पूरे खेत में मला देना चाहये। नत्रजन १२ क.ग्रा. प्रत एकड़ जसका एक तहाथ्द्यर्; बीजांकुर होने के १५ दन बाद तथा दो तहाथ्द्यर्; मात्रा दो बार में बराबरबराबर १५१५ दन के ंतराल से देना चाहये थवा बुवाथ्द्यर्; के समय रासायनक खाद डी.ए.पी. ४० कलोग्राम प्रत एकड़ की दर से डालना चाहये ौर परपक्व फलयों की प्रत्येक तुड़ाथ्द्यर्; के तुरंत बाद उपरोक्त नत्रजन की पूर्त हेतु यूरया के रुप में डालना चाहये। थ्द्य;स बात का वोष ध्यान रखना चाहये क खेत में गोबर की च्छी सड़ी गली खाद की उपरोक्त मात्रा डालने पर ही रासायनक उर्वरकों का समुचत लाभ मल पाता है।

 

बोने का समय एवं वध :

अगेती जातयों की बुवाथ्द्यर्; सतम्बर माह के ंतम सप्ताह से क्टूबर माह के प्रथम सप्ताह में करना चाहये तथा मध्यम समयावध एवं देर से ाने वाली जातयोे की बुवाथ्द्यर्; क्टूबर के दूसरे सप्ताह से नवम्बर के मध्य तक कर देना चाहये। मटर की बोनी दुफन एवं लफन -ारा करने पर ंकुरण पूरे खेत में समान रुप से च्छी तहर होता है। बीज ५ से ६ से.मी. की गहराथ्द्यर्; तक बोना चाहये। कतार से कतार की दूरी उँची बढ़ने वाली जातयों के लये ४० से ५० से.मी. एवं बोनी जातयों के लये ३० से ४० से.मी. रखना चाहये। कतारों में बीज से बीज की दूरी ४ से ६ से.मी. रखना चाहये।

 

बीज की मात्रा एवं बीजोपचार :

 जल्दी पकने वाली (अगेती) जातयों के लये ४० क.ग्रा. एवं मध्यम तथा देर से ाने वाली जातयों के लये २४ क.ग्रा. प्रत एकड़ की दर से बीज की मात्रा नुकूल पाथ्द्यर्; गथ्द्यर्; है। बीज बुवाथ्द्यर्; से पूर्व थायरम दवाथ्द्यर्; २.५ ग्राम तथा बावस्टीन ०.५ ग्राम प्रत कलो बीज की दर सके उपचारत करके ही बोना चाहये। बीज की उतनी ही मात्रा को बीजोपचारत करना चाहये। जतने बीज की बुवाथ्द्यर्; करना हो क्योंक उपचारत बीज की बुवाथ्द्यर्; उसी दन पूरी कर देना चाहये।

संचाथ्द्यर् : बुवाथ्द्यर् करते समय यद खेत में नमी हो तो अंकुरण त उत्तम होता है परंतु यद मट्टी में नमीं कम हो तो बुवाथ्द्यर्; के तुरंत बाद संचाथ्द्यर्; करना चाहये। ाुष्क मौसम में १२१४ दन के ंतराल से संचाथ्द्यर्; करना चाहये। फलयों में दाने ाने पर संचाथ्द्यर्; करना त्यंत ावयक होता है।

नदाईगुड़ाई : फसल बाढ़ की प्रारम्भक अवस्था में ावयकतानुसार एक या दो बार नदाई करने से उपज च्छी होती है। तः पौधों को क्षत पहुँचाये बना नदाईगुड़ाई करना चाहये। पौधों के बड़े होने पर नदाईगुड़ाई करने पर पौधों को क्षत होने की धक सम्भावना रहती है। तः ास्य क्रयायें करते समय पौधों को उलटने पलटने से बचाना चाहये। पौधों के उलटपलट होने पर फल में व्यवधान होता है ौर समुचत उत्पादन में कमी ाती है।

तुड़ाई : हरी फलयों की तुड़ाई उस समय करना चाहये जब उसमें दाना अच्छी तरह से भर जावें तथा फलयों का रंग गहरे हरे से हल्के हरे रंग में बदलना ाुरु हो जावें। यह हरी फलयों की तुड़ाई होते समय की पहचान है। जहां तक सम्भव हो फलयों की तुड़ाई सुबहााम के समय ही करना चाहये, जससे उनके झुलसाने मुरझाने का भय नहीं रहता है। इस बात का वोष ध्यान रखना चाहये क फलयों की तुड़ाई करते समय पौधों को उलटनापलटना नहीं चाहये न्यथा पैदावार में कमीं ाती है।

 

पौध संरक्षण: 

मटर की फसल में कुछ प्रमुख रोग व कीट नुकसान पहँुचाते हैं, उनके लक्षण तथा नदान नम्नलखत हैं :

  1. 1. भभूतया (पावडरी मल्डू) रोग: इस रोग का वोष लक्षण यह हेै क पौधों पर सफेद चूर्ण के समान पावडर दखाई पड़ता है। वोषकर यह रोग जनवरीफरवरी माह में लगता है। सर्वप्रथम पौधों की नचली पत्तयों पर चूर्ण के समान छोटेछोटे धब्बे दखाई पड़ते हैं, जो कुछ समय पचात्‌ बढ़कर दोनों सतहों पका ढंक लेते हैं।इस तरह के लक्षण फलयों पर भी दखाई देने लगते हैं। इस रोग के संक्रमण के कारण फलयों का रंग काला पड़ जाता है, और दाने कड़वे हो जाते हैं।
    2. रोकथाम : घुलनाील सल्फर का छड़काव ०.३ प्रतात घोल कर करना चाहये। गंधक पावडर का भुरकाव १०१२ क.ग्रा. प्रत एकड़ की दर से करना चाहये।

  2. गेरुआ रोग : इस रोग के लक्षण सर्वप्रथम पत्तयों की नचली सतह पर हल्के पीले रंग के छोटे धब्बों के रुप में दखाई पड़ते हैं जो कुछ समय पचात्‌ गहरे भूरे रंग के उभरे हुये धब्बों का रुप धारण कर लेते हैं। फलयों पर भी इस प्रकार के धब्बे दखाई देते हैं। इस रोग के प्रभाव से दानों का स्वाद कड़वा हो जाता है।
    रोकथामः पत्तयों पर रोग के लक्षण दखते ही डायथेन एम ४५ या डायथेन जल ७८ तथा २.५ ग्राम प्रत लीटर पानी की दर से घोलकर छड़काव करना चाहये। एक एकड़ में लगभग २५० लीटर पानी पर्याप्त होता है।

कीट :

  1. 1. फली छेदक कीट: प्रारम्भ मेंइस कीट की इल्ली मटर के पौधे के कोमल भागों, पत्तयों तथा फूल को खाकर क्षत पहुँचाते हैं। बाद में मटर की फल्ली में प्रवेा कर दानों को हान पहुँचाते हैं।
    रोकथाम : इंडोसल्फान ४ प्रतात चूर्ण का १० क.ग्रा. प्रत एकड़ के हसाब से भुरकाव या ०.७ प्रतात इंडोसल्फान या क्लोरपायरीफास ०.०४ प्रतात का घोल बनाकर छड़काव करना चाहये।

  2. 2. तना छेदक इल्ली : यह इ;ल्ली तने में घुसकर तने को खोखला कर देती है।
    रोकथाम : क्वीनालफास १.५ प्रतात चूर्ण ८ कलोग्राम प्रत एकड़ के हसाब से भुरकाव करें।

  3. 3. लीफ माइनर कीट:> इस कीट के आक्रमण से पौधों की पत्तयों में सफेद रंग की नेक सुरंग बनाकर उनमें रहते हुये पत्तयों के हरे पदार्थ को खाती हैं। जससे पौधों की पत्तयों -ारा भोजन बनाने की प्रक्रया में बाधा उत्पन्न होती है, तथा पौधे की बढ़वार पर प्रतकूल प्रभाव पड़ता है। इस कीट के प्रकोप -ारा पौधे की उपज में कमी ाती है।
    रोकथाम : मथाइल डेमेटान २५ ई.सी. का ०.०४ प्रतात घोल या डाईमथोएट ३० ई.सी. का ०.३ प्रतात घोल बनाकर छड़काव करें। आवयकता पड़ने पर १०१५ दन बाद दूसरा छड़काव करें।

उपज

अगेजी जातयों की उपज १६-२० क्वंटल हरी फली प्रत एकड़ एवं मध्यम तथा देर से ाने वाली जातयों की उपज २८-३२ क्वंटल हरी फली प्रत एकड़ होती है।

फसल चक्र

भण्डीमटरकद्दू वर्गीय सब्जयाँ, कद्दू वर्गीय सब्जयाँमटरबरबटी, बैंगनमटरभण्डी, टमाटरमटरककड़ी, धनया (हरी पत्ती)मटरमर्च एवं फ्रेंचबीनमटरधनया फसल चक्र उत्तम है।