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मूंग की कृष कार्यमाला

भूम का चुनाव एवं तैयारी

मूंग की खेती सभी प्रकार की भूम में सफलतापूर्वक की जाती है। मध्यम दोमट, मटयार भूम समुचत जल नकास वाली, जसका पी.एच. मान ७८ हो इसके लये उत्तम है। भूम में प्रचुर मात्रा में स्फुर का होना लाभप्रद होता है। दो या तीन बार हल या बखर चलाकार मट्टी को पाटा लगाकार समतल करें। दीमक से ग्रसत भूम को फसल की सुरक्षा हेतु एल्ड्रन ५ प्रतात चूर्ण ८ कलोग्राम प्रत एकड़ के हसाब से अंतम बखरनी के पूर्व भुरकावें  ौर बखर से मट्टी में मलावें।

बीज की मात्रा एवं बीजोपचार :

खरीफ मौसम में मूँग का बीज ६८ कलोग्राम प्रत एकड़ लगता है। जायद में बीज की मात्रा १०१२ कलोग्राम प्रत एकड़ लेना चाहये। १ ग्राम कार्बेन्डाजम / २ ग्राम थायरम या ३ ग्राम थायरम फफूंदनााक दवा से प्रत कलो बीज के हसाब से उपचारत करने से बीज एवं भूम जन्य बीमारयों से फसल की सुरक्षा होती है। इसके बाद बीज को जवाहर रायजोबयम कल्चर से उपचारत करें। ५ ग्राम रायजोबयम कल्चर प्रत कलो बीज के हसाब से उपचारत करें और छाया में सुुखाकर ाीघ्र ही बुवाई करना चाहयें। इसके उपचार से रायजोबयम की गाँठें ज्यादा बनती है, जससे नत्रजन स्थरकरण से बढ़ोत्री होती है तथा जमीन की उर्वरा ाक्त बनी रहती है।

बोनी का समय एवं वध :
खरीफ में जून के  ंतम सप्ताह से जुलाई के -तीय सप्ताह तक पर्याप्त वर्षा होने पर बुवाई करें। जायद में फरवरी के दूसरे या तीसरे सप्ताह से मार्च के दूसरे सप्ताह तक बुवाई करना चाहये। बुवाई दुफन या तफन से कतारों के बीच ३० से.मी. व पौध से पौध के बीच १० से.मी.  ौर ४५ से.मी. गहराई पर करें। जायद में कतार की दूरी २०२५ से.मी. रखना चाहये ताक खरीफ से ज्यादा पौध संख्या प्रत एकड़ प्राप्त हो सके।

खाद एवं उर्वरक की मात्रा एवं देने की वध :
मँूग के लये ८ कलो नत्रजन २० कलो स्फुर, ८ कलो पोटाा एवं ८ कलो गंधक प्रत एकड़ बोने के समय प्रयोग करना चाहये।
मध्य प्रदेा लये उन्नत जातयों का चयन नम्नलखत जातयों का चुनाव उनकी वोषता ों के  ाधार पर करना चाहये।

जातयों का नाम पकने की अवध(दन) उपज कग्रा/हेक्टर वोषतायें
पूसा-९५३१ ६५-७० ८- १० पौधा सीधा बढ़ने वाला छोटा कद का, दाना मध्यम, चमकीला हरा, पीला मोजेक वायरस प्रतरोधी, जायद के लये उपयुक्त।
टार्म-१ ६०-६५ ३२०-४०० दाना मध्यम हरा, पावडरी मल्डयु के लये सहनाील, रबी के लये उपयुक्त पीला मोजेक वायरस प्रतरोधी।
बी.एम. ४ ६५-७० ४००-४८० पौधे सीधे बढ़ने वाले छोटे कद के, बीज बड़ा एवं हरा, पीला मोजेक वायरस एवं पावडर एवं पावडरी मल्डयू के लये सहनाील।
एच.यु.एम. १ ६०-६५ २८०-३२० पीला मोजेक वायरस प्रतरोधी, रबी के लये उपयुक्त।
जवाहर मूंग-७२१ ६५-७० ४००-४८० दाना मध्यम हरा, पीला मोजेक वायरस एवं पावडरी मल्डयू के लये सहनाील, रबी के लये उपयुक्त।
पूसा-९५३१ ६०-६५            ३६०-४०० पीला मोजेक वायरस प्रतरोधी, जायद मौसम के लये उपयुक्त।
पूसा-१०५ ६५-७० ४००-४८० दाना गहरा हरा, मध्यम आकार का, पीला मोजेक वायरस प्रतरोधी, पावडरी मल्डयू एवं मायक्रोफोमीना ब्लाईट रोगो के लये सहनाील, जायद मौसम के लये उपयुक्त।

 

संचाई एवं जल नकास :
प्रायः खरीफ में संचाई की आवयकता नहीं होती है। परंतु फूल  वस्था पर सूखे की स्थत में संचाई करने से उपज में काफी बढ़ोतरी होती है।  धक वर्षा की स्थत में खेत में पानी का नकास करना जरुरी है। जायद मूँग फसल में खरीफ की तुलना में पानी की ज्यादा  ावयकता होती है। १०१५ दन के  ंतराल पर ३४ संचाई करना चाहये।

नंदाई व बुवाई :
प्रथम नींदाई बुवाई के २०२५ दन के भीतर व दूसरी ४०४५ दन में करना चाहये। २३ बार कोल्पा चलाकर खेत को नींदा रहत रखा जा सकता है। खरपतवार नयंत्रण हेतु नींदा नााक दवाईयों जैसे बासालीन या पेंडामेथलीन का प्रयोग भी कया जा सकता है। बासालीन ८०० म.ली. प्रत एकड़ के मान से २५०३०० लीटर पानी में बोनी पूर्व छड़काव करें।

फसल चक्र एवं  ंतरवर्तीय फसल :
नम्न फसल चक्र  पनाने से उत्पादन के साथसाथ भूम की उर्वरा ाक्त बनी रहती है  धान  ाधारत क्षेत्रों के लये : धानगेंहूमूंग या धानमूंगधान, मालवा नमाड़ क्षेत्र के लये :  . मूंगगेंहूमूंग, ब. कपासमूंगकपास फसल चक्र  ाम है

 ंतरवर्तीय फसल में ज्वार मूंग  ४ः२ या ६ः३, मक्का मूंग  ४ः२ या ६ः३,  रहर मूंग २ः४ या २ः६

पौध संरक्षण

कीट

फसल की प्रारम्भक अवस्था में तनामक्खी, फलीबीटल, हरी इल्ली, सफेद मक्खी, माहों, जैसड, थ्रप्स  ाद का प्रकोप होता है। इनकी रोकथाम हेतु इंडोसल्फान ३५ ई.सी. ४०० से ५०० म.ली. व क्वीनालफॉस २५ ई.सी. ६०० म.ली. प्रत एकड़ या मथाइल डमेटान २५ ई.सी. २०० म.ली. प्रत एकड़ के हसाब से छड़काव करें  ावयकता पड़ने पर १५ दन बाद पुनः छड़काव दोहरायें।

पुष्पावस्था में फली छेदक, नीली ततली का प्रकोप होता है। क्वलीनालफॉस २५ ई.सी. का ६०० म.ली. या मथाइल डमेटान २५ ई.सी. का २०० म.ली. प्रत एकड़ के हसाब से १५ दन के  ंतराल पर छड़काव करने से इनकी रोकथाम हो सकती है। कई क्षेत्रों में कम्बल कीड़े का भारी प्रकोप होता है इसकी रोकथाम हेतु पेराथयान चूर्ण २ प्रतात, १० कलो प्रत एकड़ के हसाब से भुरकाव करें।

ब. रोगः
मेक्रोफोमना रोग : कत्थई भूरे रंग के वभन्न  ाकार के धब्बे पत्तयों के नचले भाग पर मेंकोफोमना एवं सरकोस्पोरा फफूंद के -ारा बनते हैं। इनकी रोकथाम के लये ०.५ प्रतात कार्बेंडाजम या फायटोलान या डायथेन जेड७८, २.५ ग्राम प्रत लीटर पानी में घोलकर छड़काव करें।

 

भभूतया रोग या बुकनी रोग  ३०४० दन की फसल में पत्तयों पर सफेद चूर्ण दखाई देता है। इसकी रोकथाम के लये घुलनाील गंधक ०.१५ प्रतात या कार्बेंडाजम ०.१ प्रतात के १५ दन के अंतराल पर तीन छड़काव करें।
पीला मोजेक वायरस रोग : यह सफेद मक्खी -ारा फैलने वाला वषाणु जनत रोग है। इसमें पत्तयाँ तथा फलयाँ पीली पड़ जाती है  ौर उपज पर प्रतकूल  सर होता है। सफेद मक्खी के नयंत्रण हेतु मोनोक्रोटोफॉस ३६ ई.सी. ३०० म.ली. प्रत एकड़ की दर से छड़काव करें। प्रभावत पौधों को उखाड़कर नष्ट कर देना चाहये। पीला मोजेक वायरस नरोधक कस्मों को उगाना ही सबसे  च्छा उपाय है।

फसल कटाईगहाई :
जब फलयाँ काली पड़कर पकने लगे तब तुड़ाई करना चाहये। इन फलयों को सुखाकर बैलों के दावन से या लकड़ी -ारा पीटकर गहाई करें।

उपज :
उपरोक्त तरीके से मूूंग की खेती करने पर उपज ४.००४.८० क्वंटल प्रत एकड़ प्राप्त हो सकती है।