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रहर की कृष कार्यमाला  
 

भूम का चुनाव एवं तैयारी  
हल्की दोमट  थवा मध्यम भारी प्रचुर स्फुर वाली भूम, जसमें समुचत पानी नकासी हो,  रहर बोने के लये उपयुक्त है। खेत को २ या ३ बाद हल या बखर चला कर तैयार करना चाहये। खेत खरपतवार से मुक्त हो तथा उसमें जल नकासी की उचत व्यवस्था की जावे।

जातयाँ :
बीज दर १० से १२ कलो बीज प्रत एकड़ लगता है। ाीघ्र पकने वाली जातयों के लये ३०४५ से.मी. तथा पौधों से पौधों की दूरी १०१५ से.मी. मध्यम तथा देर से पकने वाली जातयों के लये ६०७५ से.मी. कतार से कतार तथा पौधे से पौधे की दूरी २०२५ से.मी. रखते हैं।

 

कस्म ाीघ्र पकने वाली जातयां औसत उपज क्वंटल प्रत एकड़ गुण
ाीघ्र पकने वाली जातयां
आई.सी.पी. एल१५१ १२०-१२५     ८- ९
  • फली हरे रंग की एवं बेंगनी मूंग की धारयां होती है।
  • दाने गोल बड़े एवं धूसर सफेद रंग के होते हैं।
पूसा३३ १३५-१४० ८ -९
  • फली मध्यम आकार की एवं फलयों पर महरुम लाल धारयां होती है।
  • दाने लाल रंग के होते हैं।
आई.सी.पी.एल. ८७ १२५-१३५ ८-९
  • फली मध्यम आकार की एवं फलयों पर महरुम लाल धारयां होती है।
  • दाना हल्के लाल रंग का मध्यम गोल होता है।
पूसा८८५        १४०-१४५ ९-१०
  • उक्टा के लये के लये सहनाील
  • दाना मोटा
मध्यम  पकने वाली जातयां
सी११ १९०-२०० ६७.५
  • उक्टा अवरोधी
आई.सी.पी.एल. ८७११९ १९०-१९५     ८-९
  • फलयों पर महरुम एवं लाल धारयां होती है।
  • दाने लाल रंग के होते हैं।
नं१४८ १६०-१८०     ७-८
  • दाने भूरे लाल एवं मध्यम आकार के होते हैं।
  • पौधे मध्यम  ाकार के एवं घने होते हैं।
जवाहर४ १६५-१७५ ७-८
  •  दाने भूरे लाल एवं मध्यम आकार के होते हैं।
  • पौधे मध्यम  ाकार के एवं घने होते हैं।
जे.के.एम. ७ १८०-१९०     ७-८
  • दाने गहरे भूरे लाल रंग के मध्यम एवं गोल आकार के होते हैं।
  • पौधे लम्बे  ाकार के होते हैं।
खरगोन२ १५०-१६० ४-५
  • दाना लाल
  • असीमत वृद्घ वालादाना लाल
देर से पकने वाली जातयां
एम.ए. ३ २२०-२५० १०-१२
  • दाने लाल रंग के मध्यम आकार के होते हैं।
  • यह कस्म फली मक्खी के लये सहनषील है।

 

बीज की मात्रा एवं बीजोपचार
अरहर की फसल में उन्नत कस्मों का प्रमाणत बीज १०१२ कलोग्राम एकड़ प्रत एकड़ लगता है । बीज को बीजोपचार करने के बाद ही बोये । बीजोपचार ट्रायकोडर्मा बरडी १० ग्राम/कलो या २ ग्राम थाइरम/एक ग्राम बेबीस्टोन (२ः१) में मलाकर ३ ग्राम प्रत कलो की दर से बीजोपचार करने से फफूंद नष्ट हो जाती है । बीजोपचार के उपरांत  रहर का राइजोबयम कल्चर ५ ग्राम एवं पी.एस.बी. कल्चर ५ ग्राम प्रत कलो बीज की दर से बीजोपचार करें । बीज को कल्चर से उपचार करने के बाद छाया में सुखाकर उसी दन बोनी करें।

बोवाई का समय एवं तरीका  
रहर की बोनी का समय वर्षा पर नर्भर करता है।  रहर की बोनी सामान्यतः जून के  ंतम सप्ताह से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक करना चाहए । संचत क्षेत्रों में जल्दी पकने वाली  रहर की बोनी जून के प्रथम सप्ताह सर -तय सप्ताह में करने से  च्छी उपज मलती है । यद वर्षा  धक होने से समय पर  रहर की बोनी कृषक न कर सकें तो फर इसकी बोनी  गस्त के प्रथम सप्ताह तक की जा सकती है ।

उर्वरक का प्रयोग
बुवाई के समय ८ क.ग्रा. नत्रजन, २० क.ग्रा. स्फुर, ८ क.ग्रा. पोटाष व २० क.ग्रा. गंधक प्रत एकड़ कतारों में बीज के नीचे दया जाना चाहये। तीन वर्ष में एक बार १० क.ग्रा. जंक सल्फेट प्रत एकड़  ाखरी बखरीनी पूर्व भुरकाव करने से पैदावार में  च्छी बढ़ोतरी होती है।

 

संचाई
जहां संचाई की सुवधा हो वहां एक संचाई फूल आने पर व दूसरी फलयां बनने की  वस्था पर करने से पैदावार  च्छी होती है।

 

खरपतवार प्रबंधन :
खरपतवार नयंत्रण के लये २०२५ दन में पहली नदाई तथा फूल  ाने से पूर्व दूसरी नदाई करें। २३ बार खेत में कोल्पा चलाने से नदा ों पर  च्छा नयंत्रण रहता है व मट्टी में वायु संचार बना रहता है। पेंडीमेथीलन ५०० ग्राम सक्रय तत्व प्रत एकड़ बोनी के बाद प्रयोग करने से नींदा नयंत्रण होता है। नदानाषक प्रयोग के बाद एक नदाई लगभग ३० से ४० दन की  वस्था पर करना चाहये।

 ंतरवर्तीय फसल :
 ंतरवर्तीय फसल पद्घत से मुख्य फसल की पूर्ण पैदावार एवं  ंतरवर्तीय फसल से  तरक्त पैदावार प्राप्त होगी। मुख्य फसल में कीटो का प्रकोप होने पर या कसी समय में मौसम की प्रतकूलता होने पर कसी फसल से सुनष्चत लाभ होगा। साथसाथ  ंतरवर्तीय फसल पद्घत में कीटों  ौर रोगों का प्रकोप नयंत्रत रहता है।

 रहर / मक्का या ज्वार २ः१ कतारों के  नुपात में, (कतारों के बीच की दूरी ४० से.मी.),  रहर/मूंगफली या सोयाबीन २ः४ कतारों के  नुपात में,  रहर / उड़द या मूंग १ः२ कतारों के  नुपात में मध्य प्रदेा के उत्तम  ंतवर्तीय फसल पद्घतयां हैं।

 

पौध संरक्षण

अ. रोग

उकटा रोग

इस रोग का प्रकोप  धक होता है। यह फ्यूजेरयम नामक कवक से फैलता है। रोग के लक्षण साधारणता फसल में फूल लगने की  वस्था पर दखाई देते हैं। नवम्बर से जनवरी महीनों के बीच में यह रोग देखा जा सकता है। पौधा पीला होकर सूख जाता है। इसमें जड़े सड़ कर गहरे रंग की हो जाती है तथा छाल हटाने पर जड़ से लेकर तने की उंचाई तक काले रंग की धारयां पाई जाती है। इस बीमारी से बचने के लये रोग रोधी जातयां जैसे सी११, जवाहर के.एम.७, बी.एस.एम. ार.८५३,  ाषा  ाद बोयें। उन्नत जातयों का बीज बीजोपचार करके ही बोयें। गर्मी में खेत की गहरी जुताई व  रहर के साथ ज्वार की  ंतरवर्तीय फसल लेने से इस रोग का संक्रमण कम होता है।

बांझपन वषाणु रोगः
यह रोग वषाणु से फैलता है। इसके लक्षण पौधे के उपरी ााखा ों में पत्तयां छोटी, हल्के रंग की तथा  धक लगती है  ौर फूलफली नहीं लगती है। ग्रसत पौधों में पत्तयां  धक लगती है। यह रोग, मकड़ी के -ारा फैलता है। इसकी रोकथाम हेतु रोग रोधी कस्मों को लगाना चाहये। खेत में उग  ाये बेमौसम  रहर के पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहये। मकड़ी का नयंत्रण करना चाहये।

 

फायटोपथोरा झुलसा रोग
रोग ग्रसत पौधा पीला होकर सूख जाता है। इसकी रोकथाम हेतु ३ ग्राम मेटेलाक्सील फफूंदनााक दवा प्रत कलोग्राम बीज के हसाब से उपचारत करें। बुवाई पाल (रज) पर करना चाहये और मूंग की फसल साथ में लगायें।   

ब. कीट

फली मक्खी

यह फली पर छोटा सा गोल छेद बनाती है। इल्ली  पना जीवनकाल फली के भीतर दानों को खाकर पूरा करती है एवं बाद में प्रौढ़ बनकर बाहर  ाती है। दानों का सामान्य वकास रुक जाता है।
मादा छोटे व काले रंग की होती है जो वृद्घरत फलयों में  ंडे रोपण करती है।  ंडों से मेगट बाहर  ाते हैं  ौर दानों को खाने लगते हैं। फली के  ंदर ही मेगट ांखी में बदल जाती है। जसके कारण दानों पर तरछी सुरंग बन जाती है  ौर दानों का  ाकार छोटा रह जाता है। तीन सप्ताह में एक जीवन चक्र पूर्ण करती है।

फली छेदक इल्ली
छोटी इल्लयां फलयों के हरे उत्तकों को खाती है व बड़े होने पर कलयों, फूलों, फलयों व बीजों पर नुकसान करती है। इल्लया फलयों पर टेढ़ेमेढ़े छेद बनाती है।
इस की कीट की मादा छोटे सफेद रंग के  ंडे देती है। इल्लयां पीली, हरी, काली रंग की होती है तथा इनके ारीर पर हल्की गहरी पट्टयां होती है।  नुकूल परस्थतयों में चार सप्ताह में एक जीवन चक्र पूर्ण करती है।

 

फल्ली का मत्कुण
मादा प्रायः फल्लयों पर गुच्छों में अंडे देती है।  ंडे कत्थई रंग के होते हैं। इस कीट के षषु एवं वयस्क दोनों ही फली एवं दानों का रस चूसते हैं, जससे फली  ाड़ीतरछी हो जाती है एवं दानें सकुड़ जाते हैं। एक जीवन चक्र लगभग चार सप्ताह में पूरा करते हैं।


प्लू माथ
इस कीट की इल्ली फली पर छोटा सा गोल छेद बनाती है। प्रकोपत दानों के पास ही इसकी वष्टा देखी जा सकती है। कुछ समय बाद प्रकोपत दाने के  ासपास लाल रंग की फफूंद  ा जाती है।
मादा गहरे रंग के  ंडे एकएक करके कलयों व फली पर देती है। इसकी इल्लयां हरी तथा छोटैछोटे काटों से  ाच्छादत रहती है। इल्लयां फलयों पर ही ांखी में परवर्तत हो जाती है। एक जीवन चक्र लगभग चार सप्ताह में पूरा करती है।


ब्रस्टल बीटल
ये भृंग कलयो, फूलों तथा कोमल फलयों को खाती है जससे उत्पादन में काफी कमी  ाती है। यह कीट  रहर, मूंग, उड़द, तथा  न्य दलहनी फसलों पर भी नुकसान पहुंचाता है। भृंग को पकड़कर नष्ट कर देने से प्रभावी नयंत्रण हो जाता है।

कीट प्रंबधन  
कीटों के प्रभावी नयंत्रण हेतु समन्वत प्रणाली  पनाना  ावष्यक है

 

कृष कार्य -ारा :

  • गर्मी में खेत की गहरी जुताई करें
  • ाुद्घ अरहर न बोयें
  • फसल चक्र पनाये
  • क्षेत्र में एक ही समय पर बोनी करना चाहये
  • रासायनक खाद की नुषंसत मात्रा का प्रयोग करें।
  • रहर में ंतरवर्तीय फसलें जैसे ज्वार, मक्का या मूंगफली को लेना चाहये।

 

यांत्रकी वध -ारा :

  • प्रकाष प्रपंच लगाना चाहये
  • फेरोमेन प्रपंच लगाये
  • पौधों को हलाकर इल्लयों को गरायें एवं उनकी इकट्ठा करके नष्ट करें।
  • खेत में चड़याओं के बैठने की व्यवस्था करें।

 

जैवक नयंत्रण -ारा

  • १. एन.पी.वी. २०० एल.ई. प्रत एकड़ / यू.वी. रटारडेंट ०.१ प्रतषत / गुड़ ०.५ प्रतात मश्रण को ााम के समय छड़काव करें। बेसलस थूरेंजयन्सीस ४०० ग्राम प्रत एकड़ / टनोपाल ०.१ प्रतषत / गुड ०.५ प्रतषत का छड़काव करें।

 

जैवपौध पदार्थों के छड़काव -ारा :

  •  नंबोली सत ५ प्रतषत का छड़काव करें।
  • नीम तेल या करंज तेल १०१५ म.ली. / १ म.ली. चपचपा पदार्थ (जैसे सेडोवट, टपाल) प्रत लीटर पानी में घोल   बनाकर छड़काव करें।
  • नम्बेसडन ०.२ प्रतषत या अचूक ०.५ प्रतषत का छड़काव करें।

 

रासायनक नयंत्रण -ारा :

  • आवयकता पड़ने पर ही कीटनाषक दवा ों का छड़काव या भुरकाव करना चाहये।
  • फली मक्खी नयंत्रण हेतु संर्वागीण कीटनााक दवा ों का छड़काव करें जैसे डायमथोएट ३० ई.सी. ०.०३ प्रतात,मोनोक्रोटोफॉस ३६ ई.सी.  ०.०४ प्रतषत  ाद।
  • फली छेदक इल्लयों के नयंत्रण हेतु फेनवलरेट ०.४ प्रतषत चूर्ण या क्वीनालफास १.५ प्रतषत चूर्ण या इंडोसल्फान ४ प्रतषत चूर्ण का ८ से १० कलोग्राम प्रत एकड़ की दर से भुरकाव करें या इंडोसल्फान ३५ ईसी ०.७ प्रतात या क्वीनालफास २५ ईसी ०.०५ प्रतात या क्लोरोपायरीफास २० ईसी ०.६ प्रतषत या फेन्वेलरेट २० ईसी ०.०२ प्रतात या एसीफेट ७५ डब्ल्यू.पी. ०.००७५ प्रतात या ऐलेनकाब ३० ई.सी २०० ग्राम सक्रय तत्व प्रत एकड़ है, या प्राफेनोफॉस ५० ईसी ४०० म.ली. प्रत एकड़ का छड़काव करें। दोनों कीटों के नयंत्रण हेतु प्रथम छड़काव सर्वांगीण कीटनााक दवाई का करें तथा १० दन के  ंतराल से स्पर्ष या सर्वांगीण कीटनााक का छड़काव करें। कीटनााक के ३ छड़काव या भुरकाव पहला फूल बनने पर, दूसरा ५० प्रतषत फूल बनने पर  ौर तीसरा फली बनने की  वस्था पर करना चाहये।

 

कटाई एवं गहाई  :
जब पौधे की पत्तयां गरने लगे एवं फलयां सूखने पर भूरे रंग की पड़ जाये तब फसल को काट लेना चाहये। खलहान में ८१० दन धूप में सुखाकर ट्रेक्टर या बैलों -ारा दावन कर गहाई की जाती है। बीजों को ८९ प्रतात नमी रहने तक सुखाकर भण्डारत करना चाहये।