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फसलों की खेती की विधियाँ खरीफ फसल रामतिल

रामतल की कृष कार्यमाला

भूम का चुनाव एवं तैयारी

 फसल को आमतौर पर सभी प्रकार की भूम में उगाया जा सकता है। उत्तम जल नकासी वाली गहरी दोमट भूम कात हेतु  च्छी होती है। खेत की तैयारी करते समय पछली फसल की कटाई पचात्‌ हल से दो बार गहरी जुताई करें तथा ३४ बार बखर चलाकर भूम को समतल एवं खरपतवार रहत करना चाहये, जसमें बीज समान गहराई तक पहुंचकर उचत  ंकुरण एवं पौध संख्या प्राप्त हो सके।

जातयों का चुनावः
प्रदेा में फसल में कात हेतु नम्नलखत  नुांसत उन्नत कस्मों को  पनाना चाहये।

  1. उटकमंड मध्यम अवध में पककर तैयार होने वाली कस्म जो क लगभग ११० दनों में परपक्व होकर तैयार होती है। बीजों में ४३ प्रतात तेल की मात्रा होती है तथा उपज क्षमता ौसतन ५ क्वंटल प्रत हेक्टर है।
  2. ाई.जी.पी. ७६ (सह्याद्री) मध्यम वध में (लगभग १०५ दनों में) पककर तैयार होती है। बीजों का ाकार छोटा होता है तथा बीजों में ४० प्रतात तेल की मात्रा होती है। कस्म ताप एवं प्रकाा काल हेतु संवेदनाील होती है तथा उपज क्षमता ौसतन ५ क्वंटल प्रत हेक्टर है।
  3. बरसा नाइजर१ कस्म जब तैयार होती है। तब तने का रंग हल्का गुलाबी होता है। मध्यम वध में (९५१०० दनों में) पककर होती है। बीजों में ४१ प्रतात तेल पाया जाता है तथा ौसत क्षमता ५७ क्वंटल प्रत हेक्टर है।
  4. पैयूर१ नई वकसत कस्म जो क लगभग ९० दनों में पककर तैयार होती है। पर्वतीय क्षेत्रों में कात हेतु उत्तम है। बीजों का रंग काला होता है तथा बीजों में ४० प्रतषत तेल होता है। ौसत उपज क्षमता ५ क्वं प्रत हेक्टर है
  5. जे.एन.सी १ इसके पकने की वध ९५१०० दन है। बीजों में ३५३८ प्रतात तेल की मात्रा होती है। इस कस्म की उपज क्षमता ौसतन ५७ क्वंटल प्रत हेक्टर है। यह कस्म सूखा के सहलाील होती है।
  6. जे.एन.सी६ इसके पकने की वध ११० दन हेै। बीजों में ३८४० प्रतात तेल की मात्रा होती है। बीजों का रंग चमकीला काला होता है। इसकी उपज क्षमता ौसतन ५६ क्वंटल प्रत हेक्टर है। यह सूखा के लये सहनाील है।

 

बोने की वध
सामान्यतः २३.२ कलोग्राम बीज प्रत एकड़ के मान से बोनी हेतु आवयक होता है।  ंतरवर्तीय फसल हेतु बीज की दर कतारों के  नुपात पर नर्भर करती है। बोनी करते समय बीजों को पूरे खेत (कतारों) में समान रुप से वतरण हेतु बीजों को १ः२० के  नुपात में गोबर की छनी हुई  च्छी सड़ी खाद के साथ मलाकर बोनी करना चाहये।

खाद एवं उर्वरक की मात्रा एवं देने की वध
खाद एवं उर्वरक की मात्रा एवं देने की वधः फसल को ४ कलोग्राम नत्रजन / ८ कलोग्राम फास्फोरस प्रत एकड़ बोनी के समय  ौर ४ कलोग्राम नत्रजन प्रत एकड़ की दर से खड़ी फसल में बोनी के ३५ दन बाद देवें। इसके  लावा स्फुर घुलनाील जैव उर्वरक कल्चर (पी.एस.बी) भूम में  नुपलब्ध स्फुर को उपलब्ध कर फसल को लाभ पहुँचाता है। पी.एस.बी. कल्चर को बोनी के पूर्व  ाखरी बखरनी के समय मट्टी में २३ कलोग्राम प्रत एकड़ की दर से गोबर की खाद  थवा सूखी मट्टी में मलाकर खेत में समान रुप से बखेरें। इस समय खेत में नमीं का होना  ावयक होता है।

भूम में उपलब्ध तत्वों के परीक्षण उपरांत यद भूम मे गंधक तत्व की कमी पायी जाती है, तो ८१२ कलोग्राम प्रत एकड़ की दर से गंधक का प्रयोग करने पर तेल के प्रतात एवं पैदावार में बढ़ोतरी होती है।

कतारों की दूरीः  च्छे उत्पादन हेतु कतारों में बोनी हेतु  नुांसा की जाती है।  च्छी उपज लेने हेतु बुवाई ३०न्१० से.मी. दूरी पर करें तथा बीज को ३ से.मी. की गहराई पर बोना चाहये। पूरे खेत (कतारों) में समान रुप से बोनी हेतु १ः२० के  नुपात में गोबर की छनी हुई खाद के साथ मलाकर बोनी करना चाहये।

 

संचाई
रामतल की फसलों को मुख्यतः खरीफ मौसम में वर्षा आधारत स्थत में यद संचाई का साधन उपलब्धा है तो सुरक्षात्मक संचाई करना चाहये। फूल  ाते समय एवं दाने बनते समय संचाई देने से उपज में  च्छे परणाम मलते हैं।

नंदाईगुड़ाई
बोनी के १५२० दन पचात्‌ पहली नदाई  वय करना चाहये तथा इसी समय  ावयकता से  धक पौधों को खेत से नकालना चाहये। यद  ावयक हु ा तो दूसरी नदाई बोनी के करीब ३५४० दन बाद करना चाहये। कतारों में बोयी गई फसल में हाथों -ारा चलने वाला हो  थवा डोरा चलाकर नींदा नयंत्रण करें। रासायनक नींदा नयंत्रण के लये एलाक्लोर ६०० ग्राम सक्रय घटक प्रत एकड की दर से २०० लीटर पानी में छड़काव  थवा लासो दानेदान ८ कलोग्राम प्रत एकड़ की दर से बोनी के तुरंत बाद एवं  ंकुरण के पूर्व भुरकाव करें।  मरबेल परजीवी संक्रमत क्षेत्रों से प्राप्त बीजों का प्रयोग बोनी हेतु नहीं करना चाहये। यद  मरबेल के बीज रामतल के साथ मल गये हो तो बोनी के पूर्व छलनी से छानकर इसे  लग कर देना चाहये।

पौध संरक्षण

 कीट

रामतल पर  ानेवाले प्रमुख कीट रामतल की सूंडी, सतही टड्डी माहों, बहार रोमल सूंडी सेमीलूपर  ाद हैं। रामतल की इल्ली हरे रंग की होती है जसपर जामुनी रंग की धारयाँ रहती है। पत्तयों को खाकर पौधे की प्रारम्भक  वस्था में ही पौधे की पत्ती रहत कर देती है।
माहू कीट के ााु तथा प्रौढ़ पत्तयों तथा तनें पर चपके रहकर पौधे से रस चूसते हैं जससे उपज में कमी  ाती है।

सतही टड्डी के ााु एवं वयस्क फसल की प्रारम्भक अवस्था ों में पत्तयों को काटकर हान पहुंचाते हैं।

नयंत्रण

  • रामतल की इल्ली के नयंत्रण के लये पेराथयान २ प्रतात चूर्ण का भुरकाव १० कलोग्राम प्रत एकड़ की दर से करना चाहये। इस चूर्ण के उपयोग से सतही टड्डी को भी नयंत्रत कया जा सकता है।

 

ब. रोग

  • सरकोस्पोरा पर्णदाग : इस रोग में पत्तयों पर छोटे धूसर से भूरे धब्बे बनते हैं जसके मलने पर रोग पूराी पत्ती पर फैल जाता है तथा पत्ती गर जाती है। नयंत्रण हेतु बोनी पूर्व बीजों को ०.३ प्रतात थायरम से बीजोपचार करें।
  • आल्टरनेरया पत्ती धब्बा : इस रोग में पत्तयों पर भूरे, ंडाकार, गोलाकार एवं नयंत्रत वलयाकार धब्बे दखते हैं। रोग के नयंत्रण हेतु बोनी पूर्व बीजों केा ०.३ प्रतात थायरम से बीजोपचार करें। जीनेब (०.२ प्रतात) थवा बावस्टीन (०.०५ प्रतात) या टापसन (०.२५ प्रतात) दवा का छड़काव रोग ाने पर १५ दन के ंतराल से करें।
  • जड़ सड़न : तना ाधार एवं जड़ का छलका हटाने पर फफूंद के स्क्लेरोायम होने के कारण कोयले के समान कालापन होता है। नयंत्रण हेतु ०.३ प्रतात थायरम से बोनी के पूर्व बीजोपचार करें।
  • भभूतया रोग (चूर्णी फफूंद) : रोग में पत्तयों एवं तनों पर सफेद चूर्ण दखता है। नयंत्रण हेतु ०.२ प्रतात घुलनाील गंधक का फुहारा पद्घत से फसल पर छड़काव करें।

 

फसल गहाई
रामतल की फसल लगभग १००१२० दनों में पककर तैयार होती है। जब पौधों की पत्तयाँ सूखकर गरने लगे, फल्ली का ाीर्ष भाग भूरे एवं काले रंग का होकर मुड़ने लगे तब फसल को काट लेना चाहये। कटाई उपरांत पौधों को गट्ठों में बांधकर खेत में खुली धूप में एक सप्ताह तक सुखाना चाहये। उसके बाद खलहान में लकड़ी/डंडों -ारा पीटकर गहाई करना चाहये। गहाई के बाद प्राप्त दानों को सूपे से फटककर साफ कर लेना चाहये। हवा में उड़ावनी कर बीजों को धूप में अच्छी तरह सुखाकर ९ प्रतात नमी पर भण्डारण करना चाहये।

उपज
उचत प्रबंधन से रामतल की उपज २.४०२.८० क्वंटल प्रत एकड़ तक प्राप्त होती है, जो क मुख्यतः  च्छी वर्षा एवं उन्नत तकनीक के  ंगीकरण करने से प्राप्त होती है।