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सरसों की कृष कार्यमाला 

  भूम का चुनाव एवं तैयारी 

 

सरसों फसल के भरपूर उत्पादन हेतु दोमट या बलुई दोमट भूम, उत्तम जल नकास तथा जलधारण क्षमता वाली भूम अधक उपयुक्त होती है । परन्तु मलीय भूम में च्छी उपज नहीं होती है। बोनी के पूर्व खेत को ५६ बार च्छी तरह जोत कर मट्टी को भुरभुरा करना चाहये साथ ही पाटा लगायें, जसने जमीन में ार्द्रता धक एवं लम्बे समय तक सुरक्षत रह सकें । जन इलाकों में दीमक का प्रकोप होता है वहाँ पर इसके बचाव के लये बोनी पूर्व एल्ड्रन ५ प्रतात या हेक्साक्लोर ५ प्रतात १० कलोग्राम प्रत एकड़ की दर से डालें।

  उन्नत प्रजातयां 

 

कस्म दन क्व प्रत हेक्टर अन्य
तोरया
जवाहर तोरया-१ 
जे.एम. टी.- ६८१
८५-९० १५-१८ बीज का रंग कत्थई होता है।
तेल ४२%
वेतकट्ट के लये प्रतरोधी।
जवाहर सरसों 
(जे.एम.-१)
१२५-१३० २०-२१ बीज का रंग काला भूरा तथा आकार गोल होता है। सिंचत व सिंचत वस्था में उपयोगी।
तेल ४१.२%
मापा १३०-१३४ २५-२९ काले भूरे गोल आकार के बीज। सिंचत क्षेत्र के लये।
तेल ४०%
स्वर्ण ज्योत १२३-१३५ 13 - 17 काले भूरे एवं गोल बीज। सिंचत क्षेत्र में बोनी के लये।
तेल ३८ से ४२%
वसुंधरा 130-135 8-9 सिंचत क्षेत्र में समय पर बोनी के लये। तेल ३८-४०%
आर.जी.एल. ७३ 120-150 8-9 बीज गहरा भूरा। तेल ३३.६० से ४४.१० प्रतात तेल
पूसाबोल्ड 125-130 15-20 तेल की मात्रा ४१%

 

बीज की मात्रा तथा बीजोपचारः 

सरसों का २ कलो बीज प्रत एकड़ लगता है। फफूंद के कारण होने वाले रोगों के बचाव हेतु नर्धारत बीज की मात्रा को एपरॉन एस.डी.६ ग्राम या थाईरम/डाईथेन एम.४५ से २.५ ग्राम प्रत कलो ग्राम बीज -ारा उपचारत करें । जड़ सड़न रोग से बचाने के लये बीज को दो ग्राम बावस्टन प्रत कलो बीज की दर से उपचारत करना चाहये।

 

बोने की वध: 

बोनी देाी हल में सरता बांधकर कतारों में ही करें या सीड ड्रील -ारा करना भी उपयुक्त होता है। बोनी ३० सेमी की दूरी पर की जाए एवं बीज को २३ से.मी. ही गहरा बोयें, अधक गहरा बोने पर ंकुरण कम होता है।

 

जैवक एवं रासायनक खाद :

खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग इन फसलों के लये आवयक है । इन फसलों में उर्वरक का संतुलत मात्रा में प्रयोग करने पर उनकी उपज पर च्छा प्रभाव पड़ता है वोषकर स्फुर युक्त उर्वरक देने से उपज के साथसाथ तेल की मात्रा में भी वृद्घ होती है। भरपूर उत्पादन लेने हेतु रासायनक उर्वरकों के साथसाथ हरी खाद गोबर या कम्पोस्ट खाद का प्रयोग करना चाहये । साधारणतः इन फसलों से नमांकत संतुलत उर्वरकों का प्रयोग कर धकतम उपज प्राप्त की जा सकती है।

 

क्रं फसल का नाम रासायनक खाद क.ग्रा. प्रत एकड़
नत्रजन स्फुर पोटाा
तोरया २४ १२
असंचत सरसों १६
संचत सरसो ३२ १६ ८
संचत दो फसली क्षेत्र में ४० २० १०

 

इसके अतरक्त जन क्षेत्रों में गंधक की कमी हो वहाँ ८१० कलोग्राम प्रत एकड़ गंधक तत्व की पूर्त संगल सुपर फास्फेट थवा मोनयम सल्फेट ाद उर्वरकों से की जावे।

 

उर्वरक देने की वध 

वर्षाधीन क्षेत्रों में उर्वरकों की सम्पूर्ण अनुांसत मात्रा ाखरी जुताई के बाद यानी बोनी के २३ दन पूर्व कूड़ों में १०१२ सेमी नीचे डालकर पाटा चलायें ।

बुआई का समय

 

उचत समय पर बोनी करने से अधक उत्पादन के साथ ही फसलों पर रोग एवं कीटों का प्रकोप भी कम हो जाता है। 

 

फसल बोनी का उचत समय बीज मात्रा (क.ग्रा प्रत एकड़)
तोरया सतम्बर का प्रथम पक्ष १.६-२ क.ग्राम
सरसों अक्टूबर का प्रथम पक्ष २-२.५ क.ग्राम
तारामीरा सतम्बर के अंत से २-२.५ क.ग्राम
(असंचत ) नवम्बर तक -

 

जल प्रबंध 

 उचत समय पर संचाई की जाय तो उत्पादन में २५५० प्रतात तक वृद्घ पाई गई है । अतः १२ संचाई वय करें । तोरया में फसलों की ावयकतानुसार बोनी के २५३० दन पर पहली एवं ५०५५ दन पर दूसरी संचाई करने पर तरक्त लाभ मलता है । राई की बोनी बलुई दोमट मटृटी में बना पलेवा की गई होतो पहली संचाई फसल को उसके बोने के ३०३५ दन पर करें इसके बाद गर मोसम ाुष्क रहे तो फसल में दूसरे पानी की ावयकता होती है । बोनी के ६०७० दन बाद संचाई करने से तरक्त लाभ मलता है । यद खेत में जहाँ मटृटी भारी हो तो ३४ संचाई की ावयकता पड़ती है जो फसल की ावयकतानुसार की जाये। तोरया एवं सरसों की ंतरवर्ती फसलों को सामान्य परस्थतयों में २३ संचाईरूों की ावयकता होती है । पहली संचाई फसल बाने के ३०३५ दन पर एक हल्की संचाई करने पर उपज में व१द्घ मलती है ।

 

नींदा नयंत्रण

प्रारंभक अवस्था में भी च्छी उपज के लये वासालीन ८०० म.ली. प्रत एकड़ बोने के पूर्व थवा एरीलान/ग्रेमनान ६०० ग्राम से ८०० ग्राम बोनी के तुरन्त बाद ( ंकुरण पूर्व) २५० लीटर पानी में घोल बनाकर छड़काव करें । यद बाद में नींदा ाते हैं तो उन्हें हाथ से नदाई कर नकाले।

 

पौध संरक्षण / फसल सुरक्षा

 राई, सरसों में लगभग एक दर्जन कीट एवं रोग हान पहुंचाते हैं उनमें प्रमुख हैं। सरसों का माहू, आरा मक्खी, बग्राडा (पेटेडवग) ौर दीमक तथा रोगों में व्हाईट रस्ट (सफेद कीट/रतु ा) ाल्टरनेरया, ब्लाइट (झुलसन रोग) डाउनी मल्डयू ौर पाउडरी मल्डयू प्रमुख है। इसके बचाव के लये नमानुसार उचत पौध संरक्षण के तरीके पनायें 

 

कीट प्रबंध 

राई सरसों में सबसे अधक हान इस कीट -ारा होती है । इसकी संख्या में वृद्घ नम एवं बदली वाले मौसम में होती है । यह कीट बहुत छोटा लगभग तारामीरा के दाने जैया हरे रंग का होता है ये कीट कोाका ों का रस चूसते हैं जससे पौधों का वकास रूक जाता है एवं फल्लयाँ सकुड़ने लगती हैं। इसके बचाव के लये फसल की बोनी क्टूबर के प्रथम सप्ताह में करें । मथाईल डेमेटान (मेटासस्टाक्स २५ ई.सी.) ३००३२० या डाईमथोइड (रोगर ३० ई.सी.) १०० एम.एल. या डाइमेक्रोन का १०० म.ली. २०० पानी मे मलाकर छड़कें।

 

सरसों की आरा मक्खी

यह कीट (लार्वा) प्रारंभक अवस्था क्टूबर, नवम्बर में तोरया, राई सरसों फसलों की पत्तयों को कनारे से खाकर नुकसान पहुंचाती है । इसकी एक खास पहचान यह है क इसे र्स्पा करने पर ाीध्र ही पने ारीर की (कुण्डली) रंग बना लेता है इसकी रोकथाम के लये पेराथयान २.० प्रतात धूल या क्वीनालफास १.५ प्रतात का भुरकाव या इण्डोसल्फान का ३५ ई.सी. की ४८०६०० म.ली. दवा प्रत एकड़ २५० लीटर पानी में घोल बनाकर छड़काव करें।

 

पेण्टेडबग (चतकबरा कीड़ा.): 

कभीकभी रोंयेदार इल्लयां भी इन फसलों को हान पहुंचाती है । कीड़ों का प्रकोप ाुरू होने पर इसके नयंत्रण हेतु फसल पर २ प्रतात मथाइल पेराथयान धूल या ५ प्रतात कार्बोरल धूल को ८१० कलो प्रत एकड़ की दर से दोपहर बाद फसल पर भुरकाव करें। अथवा मथाइल डेमेटान (मेटासस्टास २५ ई.सी.) २५० म.ली. दवा या डाईमथाइड (रोगर ३० ई.सी.) १०० एम.एल., २०० लीटर पानी में डालकर छड़काव करें।

 

बीमारयाँ 

आल्टरनेरया ब्लाइट

प्इसे झुलसा रोग के नाम से भी जानते हैं । इसमें राईसरसों की उपज में कमी के साथसाथ उनके तेल की मात्रा भी कम हो जाती है। इस रोग से बचाव के लये रोडोमल जेड एम. या डायथेन एम. ४५ का २.५ ग्राम दवा प्रत लीटर पानी के घोल का छड़काव फसल बोने के ४०४५ दन से ाुरू कर १५ दन के अंतर से २३ बार करें।

 

व्हाइट रस्ट (सफेद रतुआ कट) 

आमतौर पर इस रोग के लक्षण तोरया, राई, सरसों के पत्तयों की नचली सतह से ाुरू होते हैं। बाद में फफोले तने तथा फल्लयों पर भी सफेद रंग के दखते हैं । यह धब्बे गर्मगर्म एवं धक ार्द्रता वाले नुकूल मौसम पाकर बड़े होते जाते हैं ौर पत्तयों का काफी भाग नष्ट कर देते हैं। इसके नयंत्रण में रडोमल एम.जेड. का १.५ ग्राम प्रत लीटर पानी में घोलकर डाईथेन एम४५ का ०.२५ प्रतात घोल (२.५ ग्राम दवा प्रत लीटर पानी) का छड़काव तथा दूसरा छड़काव १०१५ दन पर कया जाना चाहए।

 

पाउडरी मल्डू

पौधों की आखरी वस्था के दौरान तने, पत्तयों एवं हरी फल्लयों पर सफेेद चूर्ण जैसी फफूंद दखती है जससे पाउडरी मल्डू रोग नाम से जाना जा सकता है। इसके नयंत्रण हेतु फसल पर घुलनाील सल्फर जैसे सल्फेक्स (०.३ प्रतात या बावस्टन ०.१५ प्रतात ) का छड़काव करें ।

 सस्य सघनता में वृद्घ हेतु फसल पद्घतयाँ

 

फसल चक्र

  • सोयाबीन, सरसों / उड़द / मूंग / सरसों (मालवा क्षेत्र)
  • मूंग / उड़द / सरसों (गर्द क्षेत्र) के लये।
  • पड़त तोरया / गेहूँ, टीकमगढ़, छतरपुर।
  • बाजरा / सरसों, चंबल संभाग के लये।

अंतरवर्ती फसल

तोरया गोभी सरसो (१:१) या २:२ कतार चंबल संभग के लये ।
गेहूँ / सरसों (१:१) या २:२ कतार, या ६:२ गर्द बुंदेलखण्ड , तवा कमांड, जबलपुर अन्य गेहूँ वाले क्षेत्र के लये उपयुक्त पाई गई है । इस फसल चक्र में २३ संचाई करना उचत होगा। इन ंतरवर्तीय फसल के लये बोनी का उचत समय होगा सतम्बर के -तीय सप्ताह एवं गेहूँ या चना के साथ सरसों क्टूबर के मध्य तक बोया जा सकता है।

 

 कटाई एवं गहाई: 

फसल पक जाने कर कटाई करें अधक पकने पर फसल झड़ जायेगी । जब दोनों में प्रायः ४० प्रतात नमी हो तब कटाई करना उपयुक्त होता है । इस वस्था पर कटाई करने से बीज में तेल का प्रतात भी धक होता है । खलहान में फसल को च्छी तरह सुखाकर गहाई करें एवं बीज सुखाकर भण्डारण करें।

 

  भण्डारण

भण्डारण के पूर्व उसमें लगभग ८ प्रतात नमी रखी जाये । इन फसलों के दानों को यद अच्छी तरह सुखा कर ार्द्रतारोधी भण्डार गृहों में रखने से कीड़े नहीं लगते । इनमें तेल की मात्रा भी धक होती है।