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तल की कृष कार्यमाला
 

भूम का चुनाव एवं तैयारी  
फसल की प्रदेा की अधकांष भूम में उगाया जा सकता है।  च्छी जल नकास वाली हल्की मध्यम गठी हुई मट्टी में फसल  च्छी होती है। बलुई दोमट मट्टी में पर्याप्त नमीं होने पर फसल बहुत  च्छी होती है।  म्लीय या क्षारीय भूम तल की कात हेतु  नुपयोगी होती है। कात करने हेतु भूम का  नुकूलन पी.एच. मान ५.५ से ८.० है।

 

जातयाँ :

प्रदेा में कात हेतु नम्नलखत उन्नत कस्मों का अनुांसत कया गया है।

जातयां अवध (दनों में) उत्पादन (क्विं प्रत हेक्टर) विवरण
टी.के.जी.२१ ७५-७८ ७ -८
  • दानों का रंग सफेद।
  • सरकसपोरा पर्ण दाग तथा जीवाणु चत्त हेतु प्रतरोधक।
  • तेल की मात्रा ५५.९ प्रतात
टी.के.जी. २२ ७६-८१ ७ -८
  •  दानों का रंग सफेद।
  • फाइटोफथोरा अंगमारी, रोग रोधक है।
  • तेल की मात्रा ५३.३ प्रतात।
टी.के.जी.५५            ७६-७८ ५ - ६
  •  दानों का रंग सफेद।
  • फाइटोपथोरा अंगमारी एवं तना एवं जड़ सड़न बीमारी के लये सहनाील।
  • तेल की मात्रा ५३ प्रतात
जे.टी.एस.८             ८६ ५ - ६
  • दानों का रंग सफेेद।
  •  फाइटोपथोरा, अंगमारी,  ल्टरनेरया, पत्ती धब्बा तथा जीवाणु  ंगमारी के प्रत सहनाील है।
उमा           ७५-८० २४०
  • तेल की मात्रा ५१ प्रतात।
  • अबखरनाील है।

 

बोनी का समय :
प्रदेा में फसल को मुख्यतः दो मौसम मेें उगाया जाता है जनका बोनी का समय नम्नानुसार है
खरीफ जुलाई माह का प्रथम सप्ताह
अर्द्घ रबी   गस्त माह के  ंतम सप्ताह से सतम्बर माह के प्रथम सप्ताह तक
ग्रीष्मकालीन  जनवरी माह के दूसरे सप्ताह से फरवरी माह के दूसरे सप्ताह तक

बोने की वध :
फसल को  ामतौर पर छटक कर बोया जाता है। जसके फलस्वरुप नदाईगुड़ाई करने एवं  ंतःक्रयायें करने में  त्यंत बाधा  ाती है। फसल से  धक उपज पाने के लये कतारों में बोनी करनी चाहये। छटकवां वध से बोनी करने पर बोनी हेतु १.६३.८० प्रत एकड़ बीज की  ावयकता होती है। कतारों में बोनी करने हेतु सीड ड्रील का प्रयोग कया जाता है तो बीज दर घटाकर ११.२० क.ग्रा. प्रत एकड़ बीज की  ावयकता होती है। बोनी के समय बीजों का समान रुप से वतरण करने के लये बीज को रेत (बालू), सूखी मट्टी या  च्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद के साथ १ः२० के  नुपात में मलाकर बोना चाहये। मश्रत पद्घत में तल की बीजदर १ क.ग्रा. प्रत एकड़ से  धक नहीं होना चाहये। कतार से कतार एवं पौधे से पौधे के बीच की दूरी ३०न्१० से.मी. रखते हुये लगभग ३ से.मी. की गहराई पर बोना चाहये।

 

खाद एवं उर्वरक की मात्रा एवं देने की वध :
११जमीन की उत्पादकता को बनायें रखने के लये तथा अधक उपज पाने के लये भूम की तैयारी करते समय  ंतम बखरनी के पहले ४ टन प्रत एकड़ के मान से  च्छी सड़ी हुई गोबर की खाद को मला देना चाहये। वर्षा पर नर्भर स्थत में १६ः१२ः८ (नत्रजनःस्फुरःपोटाा) क.ग्रा. प्रत एकड़ के मान से देने हेतु सफारा की गई है। फास्फोरस एवं पोटाा की सम्पूर्ण मात्रा  ाधार खाद के रुप में तथा नत्रजन की  ाधाी मात्रा के साथ मलाकर बोनी के समय दी जानी चाहये।

नत्रजन की ोष मात्रा पौधों में फूल नकलने के समय यानी बोनी के ३० दन बाद दी जा सकती है। रबी मौसम में फसल में सफारा की गई उर्वरकों की सम्पूर्ण मात्रा  ाधार रुप में बोनी के समय दी जानी चाहये। तलहनी फसल होने के कारण मट्टी में गंधक तत्व की उपलब्धता फसल के उत्पादन एवं दानों में तेल के प्रतात को प्रभावत करती है।  तः फास्फोरस तत्व की पूर्त संगल सुपर फास्फेट उर्वरक -ारा करना चाहये। भूम परीक्षण में उपरांत जमीन में यद गंधक तत्व की कमी पायी जाती है तो वहाँ पर जंक सल्फेट १० क.ग्रा प्रत एकड़ की दर से भूम में तीन साल में एक बार  वय प्रयोग करें।

संचाई :

खरीफ मौसम में फसल वर्षा आधारत होती है।  तः वर्षा की स्थत, भूम में नमीं का स्तर, भूम का प्रकार एवं फसल की माँग  नुरुप संचाई की  ावयकता भूम में पर्याप्त नमीं बनायें रखने के लये होती है। खेतों में एकदम प्रातःकाल के समय पत्तयों का मुरझाना, सूूखना एवं फूलों का न फूलना लक्षण दखाई देने पर फसल में संचाई की  ावयकता को दर्ााते हैं।  च्छी उपज के लये संचाई की क्रांतक  वस्थायें बोनी से पूर्व या बोनी के बाद, फूल  ाने की  वस्था  ौर फली  ाने की  वस्था है,  तः इन तीनों  वस्था ों पर संचाई  वय करें।

नदाईगुड़ाई :
बोनी के १५२० दन बाद नदाई में वरलीकरण की प्रक्रया को पूरा कर लें। फसल में नदा की तीव्रता को देखते हुये यद  ावयकता होने पर १५२० दन बाद पुनः नदाई करें। कतारों में कोल्पा  थवा हैंड हो चलाकर नींदा नयंत्रत कया जा सकता है, कतारों के बीच स्थत नींदा करते हुये नष्ट करना चाहये। रासायनक वध से नींदा नयंत्रण हेतु लासो दानेदार १० प्रतात को ८ क.ग्रा प्रत एकड़ के मान से बोनी के तुरंत बाद कंतु  ंकुरण के पूर्व नम भूम में समान रुप से छड़ककर देना चाहये। एलाक्लोर ६०० म.ली. सक्रय तत्व का छड़काव पानी में घोलकर बोनी के तुरंत बाद कंतु  ंकुरण के पूूर्व करने से खरपतवारों को नयंत्रत कया जा सकता है।

पौध संरक्षण :
 . कीट : तल की फसल को नुकसान पहुँचाने वाले प्रमुख कीटों में तल की पत्ती मोड़क एवं फल्ली छेदक, गाल फ्लाई, बहार रोमल इल्ली, तल हॉक मॉथ  ाद कीट प्रमुख हैं। इन कीटों के  तरक्त जैसड तल के पौधों में एक प्रमुख बीमारी पराभस्तम्भ (फायलोडी) फैलने में भी सहायक होता है।

  • गाल फ्लाई के मैगोट फूल के भीतरी भाग को खाते हैं और फूल के ावयक ंगों को नष्ट कर पत्त बनाते हैं। कीट का संक्रमण सतम्बर माह में कलयों के नकलते समय ाुरु होकर नवम्बर माह के ंत तक सक्रय रहते हैं। नयंत्रण हेतु कलयाँ नकलते समय फसल पर ०.०३ प्रतात डाइमेथोएट या ०.०६ प्रतात इन्डोसल्फान या ०.०५ प्रतात मोनोक्रोटोफॉस कीटनााक दवाई को २५० लीटर पानी में घोलकर प्रत एकड़ के मान से छड़काव करें।
  • तल की पत्ती मोड़क एवं फल्ली छेदक इल्लयाँ प्रारम्भक वस्था में पत्तयों को खाती है। फसल की ंतम वस्था में यह फूलों का भीतरी भाग खाती है। फसल पर पहली बार संक्रमण १५ दन की वस्था पर होता है तथा फसल वृद्घ के पूरे समय तक सक्रय रहता है। इसे नयंत्रत करने के लये इन्डोसल्फान ०.०७ प्रतात थवा क्वनॉलफॉस का ०.०५ प्रतात २५० लीटर पानी में घोल बनाकर प्रत एकड़ की मान से फूल ाने की वस्था से ारम्भ कर १५ दनों के ंतराल से ३ बार छड़काव करें।
  • तल हाक माथ इल्लयाँ पौधों की सभी पत्तयाँ खाती है। इस कीट का संक्रमण कभीकभी दखाई देता है। फसल की पूरी वस्था में कीट सक्रय रहते हैं। नयंत्रण हेतु इल्लयों को हाथ से नकालकर नष्ट करें। कार्बोरल का ८ क्र.ग्रा प्रत एकड़ के दर से खड़ी फसल में भुरकाव करना चाहये।
  • बहार रोमयुक्त इल्लयाँ आरम्भक वस्था में लार्वा कुछ पौधों का धकांा भाग खाते हैं। परपक्व इल्लयाँ दूसरे पौधों पर जाती है ौर तने को छोड़कर सभी भाग खाती हैं। इसका ाक्रमण खरीफ फसल में उत्तरी भारत में सतम्बर ौर क्टूबर के ारम्भ में धक होता है। नयंत्रत करने हेतु इंडोसल्फान ०.०७ प्रतात या मोनोक्रोटोफॉस ०.०५ प्रतात का ३०० लीटर पानी में घोल बनाकर प्रत एकड़ के मान से छड़काव करें

 

ब. रोग :

  • फाइटोफथोरा अंगमारी : पत्तयों, तनों पर जलसक्त धब्बे दखाई देते हैं, इस स्थान पर संघाड़े के रंग के धब्बे बनते हैं जो बाद में काले से पड़ जाते हैं। ार्द्र वातावरण में यह रोग तेजी से फैलता है जससे पौधा झुलस जाता है, एवं जड़े सड़ जाती हैं।
  • ाल्टरनेरया पर्णदाग : पत्तयों पर भूरे वलयाकार धब्बे बनते हैं जो नम वातावरण में तेजी से फैलते हैं।
  • कोरनोस्पोरा ंगमारी : पत्तयों पर नयंत्रत बैंगनी धब्बा तथा तने पर लम्बे बैंगनील धब्बे बनते हैं। रोगग्रसत पत्तयां मुड़ जाती हैं।
  • जड़सड़न : इस रोग में रोगग्रसत पौधे की जड़ें तथा ाधाार से छलका हटाने पर काले स्क्लेरोायम दखते हैं, जनसे जड़ का रंग कोयले के समान धूसर काला दखता है। रोग से संक्रमत जड़ को कम ाक्त लगाकर उखाड़ने पर काँच के समान टूट जाती है। तने के सहारे जमीन की सतह पर सफेद फफूंद दखाई देती है जसमें राईं के समान स्क्लेरोाया होते हैं। इसके लावा फ्यूजेरयम सेलेनाई फफूंद के संक्रमत पौधों की जड़ें सकुड़ी सी लालीमायुक्त होती है।
  • ााकाणु अंगमारी : पत्तयों पर गहरे, भूर रंग के काले नयंत्रत धब्बे दखते हैं, जो ार्द्र एवं गर्म वातावरण में तेजी से बढ़ने के कारण पत्ते गर जाते हैं एवं तनों केे संक्रमण में पौधा मर जाता है।
  • ााकाणु पर्णदाम : पत्तयों पर गहरे भूरे कोंणीय धब्बे जनके कनारे काले रंग के दखाई देते हैं।
  • भभूतया रोग : पत्तयों पर वेत चूर्ण दखता है तथा रोग की तीव्रता में तनों पर भी दखता है, एवं पत्तयाँ झड़ जाती है।
  • फाइलोड़ी : रोग में सभी पुष्पीय भाग हरे रंग की पत्तयों के समान हो जाते हेैं। पत्तयाँ छोटे गुच्छों में लगती हैं। रोग ग्रस्त पौधों में फल्लयाँ नहीं बनती हैं, यद बनती हैं तो उसमें बीज नहीं बनता है।

 

फसल कटाई :
फसल की सभी फल्लयाँ प्रायः एक साथ नहीं पकती कंतु अधकांा फल्लयों का रंग भूरा पीला पड़ने पर कटाई करना चाहये। फसल के गट्ठे बनाकर रख देना चाहये। सूखने पर फल्लयों के मुॅह चटक कर खुल जायें तब इनको उल्टा करके डंडों से पीटकर दाना  लग कर लया जाता है। इसके पचात्‌ बीज को सुखाकर ९ प्रतात नमीं ोष रहने पर भण्डारण करना चाहये।

उपज :
उपरोक्तानुसार  च्छी तरह से फसल प्रबंध होने पर तल की संचत  वस्था में ४००४८० क.ग्रा. प्रत एकड़  ौर  संचत  वस्था में उचत वर्षा होने पर २००२५० क.ग्रा प्रत एकड़ उपज प्राप्त होती हैं।