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उड़द की कृष कार्यमाला

भूम का चुनाव एवं तैयारी

उड़द की खेती वभन्न प्रकार की भूम में होती है। हल्की रेतीली, दोमट या मध्यम प्रकार की भूम, जसमें पानी का वकास अच्छा हो, उड़द के लये  धक उपयुक्त होती है। पी.एच. मान ७८ के बीच वाली भूम उड़द के लये उपजाउ होती है।  म्लीय व क्षारीय भूम उपयुक्त नहीं है। वर्षा  ारम्भ होने के बाद दोतीन बार हल या बखर चलाकर खेत को समलत करें। वर्षा  ारम्भ होने के पहले बोनी करने से पौधों की बढ़वार  च्छी होती है।

 

मसूर की उन्नत कस्में

मध्य प्रदेा के लये  नुमोदत जातयों का चुनाव करें। उपयुक्त जातयां हैं

कस्म पकने का दन औसत पैदावार (क्वंटल प्रत एकड़) अन्य
टी९ ७०-७५ ४.८०
  • बीज मध्यम छोटा, हल्का काला।
  • पौधा मध्यम उंचाई वाला।
पंथयू३० ७० ४.८
  • दाने काले मध्यम आकार के।
  • पीला मोजेक क्षेत्रों के लये उपयुक्त।
खरगोन३ ८५-९० ३.२०४.०
  • दाना बड़ा हल्का काला।
  • पौधा फैलने वाला उंचा।
पी.डी.यू.१ (बसंत बहार) ७०-८० ४.८०५.६०
  •  दाना काला बड़ा।
  • ग्रीष्म के लये उपयुक्त।
जवाहर उड़द२ ७०
  • बीज मध्यम छोटा चमकीला काला।
  •  तने पर ही फल्लयां पासपास गुच्छों में लगती हैं।
जवाहर उड़द३ ७०-७५ ४४.८०
  • बीज मध्यम छोटा हल्का काला।
  • पौधा मध्यम कम फैलने वाला।
टी.पी.यू.४ ७०-७५ ४४.८०
  •  पौधा मध्यम उंचाई का सीधा।

 

बीज की मात्रा एवं बीजोपचार

६८ कलो प्रत एकड़ बोना चाहये। बुवाई के पूर्व बीज को ३ ग्राम थायरम या २.५ ग्राम डायथेनएम४५ प्रत कलो बीज के मान से उपचारत करें। जैवक बीजोपचार के लये ट्राइकोडर्मा फफूंद नााक ५ से ६ ग्राम प्रत कलो बीज की दर से उपयोग कया जाता है।

 

बेानी का समय एवं तरीका

मानसून के आगमन पर या जून के  ंतम सप्ताह में पर्याप्त वर्षा होने पर बुवाई करें। बोनी नारी या तफन से करें, कतारों की दूरी ३० से.मी. तथा पौधों की दूरी १० से.मी. रखें तथा बीज ४६ से.मी. की गहराई पर बोयें।

 

खाद एवं उर्वरक की मात्रा

नत्रजन ८१२ कलोग्राम व स्फुर २०२४ कलो ग्राम  पोटाा १० कलो प्रत एकड़ के हसाब से दें। सम्पूर्ण खाद की मात्रा बुवाई के समय कतारों में बीज के ठीक नीचे डालना चाहये। दलहनी फसलों में गंधक युक्त उर्वरक जैसे संगल सुपर फास्फेट,  मोनयम सल्फेट, जप्सम  ाद का उपयोग करना चाहये। वोषतः गंधक की कमी वाले क्षेत्र में ८ कलो ग्राम गंधक प्रत एकड़ गंधक युक्त उर्वरकों से दें। भूम में पोटाा की कमी होने पर ८ कलोग्राम प्रत एकड़ बुवाई के समय दें।

 

संचाई

क्रांतक फूल एवं दाना भरने के समय खेत में नमी न हो तो एक संचाई फसल को देना चाहये।

 

नदाईगुड़ाई

खरपतवार फसलों को अनुमान से कहीं  धक क्षत पहुंचाते हैं।  तः वपुल उत्पादन के लये समय पर नदाईगुड़ाई कुल्पा व डोरा  ाद चलाते हुये  न्य  ाधुनक नींदानााक का समुचत उपयोग करना चाहयें। नींदानााक बासालीन ८०० म.ली. से १००० म.ली. प्रत एकड़ २५० लीटर पानी में घोल बनाकर जमीन बखरने के पूर्व नमी युक्त खेत में छड़कने से  च्छे परणाम मलते हैं।

 

पौध संरक्षण

  • रस चूसने वाले कीट फुदका माहो, सफेद मक्खी, थ्रप्स आद के नम्फ व प्रौढ़ पत्तयों की नचली सतह से रस चूसते हैं जससे पत्तयाँ पीली होकर गर जाती है। सफेेद मक्खी मोजेक वषाणु रोग वाहक हैं। इनके नयंत्रण हेतु डायमेथयोट ३० ई.सी. ०.३ प्रतात या मथाइल डमेटान २५ ई.सी. ४०० म.ली. प्रत एकड़ का छड़काव करें।
  • फली बीटल यह कीट भूरा व काला होता है जो पत्तयों को कुतर कर गोल छेद बनता है जससे पत्तयां छलनी हो जाती है। क्वनालफास १.५ प्रतात या थायोडान ४ प्रतात डस्ट ८ क.ग्रा. प्रत एकड़ १५ दन के ंतर से दो बार फसल पर भुरकाव करें।
  • इल्लयाँ ये ५ प्रकार की होती है जो हरी, भूरी, काली, लाल व रोऐंदार होती है तथा पत्तयाँ खाती हैं। फालीडाल २ प्रतात या थायोडान ४ प्रतात डस्ट ८ क.ग्रा. प्रत एकड़ का फसल पर भुरकाव करें।
  • फली छेदक इल्ली यह इल्ली मटमैले रंग की काली धब्बे वाली होती है जो तना, फूल व फल्लयों के ंदर घुसकर क्षत पहुंचाती है। इससे ४० प्रतात फलयाँ क्षतग्रस्त होती है एवं १५ से २० प्रतात उपज में हान होती है। फलयां बनते समय ४०० म.ली. मोनोक्रोप्टोफास ३६ एस.एल. प्रत हेक्ट छड़कें तथा ावयकता होने पर १५ दन बाद दोहरायें। उड़द की जल्द पकने वाली जातयाँ पंथ यू. ३० में पेक्षाकृत कम कीट लगते हैं।

 

रोग

पावडरी मल्डु

 यह रोग पौध अवस्था से फलयां लगने तक कभी भी देखा जा सकता है। इस रोग के कारण पैदावार में काफी क्षत होती है। यह रोग प्रारम्भक  वस्था के समय  ाता है, तो पौधे पूर्ण रुप से सूख जाते हैं। यह रोग  गस्त माह के प्रथम सप्ताह में प्रारम्भ होता है। देर से बोई गई फसल पर इस रोग का प्रकोप  धक होता है।

 

 नयंत्रण

  • घुलनाील गंधक ३० ग्राम १० लीटर पानी में।
  • काबर्ंन्डाजम १० ग्राम १० लीटर पानी में थवा
  • केरेथन एल.सी. ३ म.ली. १० लीटर पानी में घोल बनाकर १० दन के ंतर से छड़काव करें।
  • रोग रोधक जातयां उड़द ए.बी.जी. १७ का चुनाव करे।

 

मेक्रोफोमना पर्ण दाग एवं वगलन रोग

इस रोग के मुख्य लक्षण पौधों की जड़ों, तनों के वगनल में तथा पत्तों पर भूरे लाल रंग के धब्बों के रुप में दखाई पड़ते हैं। यह रोग पौधों क कसी भी अवस्था में  ाता है।  ंकुरण के एक माह बाद पौधे संक्रमत होने लगते हैं तथा जड़ तना सड़न के कारण पौधे मरने लगते हैं या छोटे रह जाते हैं। वगलन जड़ से ाुरु होकर तने तक फेलता है तथा भूम के नकट तने पर लाल भूरे रंग से लेकर काले रंग के धब्बे बनते हैं। तने पर  संख्य काले रंग के स्केलेरोाया बनते हैं। संकमत तना बाद में काले रंग का हो जाता है।

 

नयंत्रण

  • थीरम ३ ग्राम प्रत कलोग्राम बीज के साथ मलाकर बीजोपचार करें।
  • फसलचक्र अपनायें, रोग रोधी फसलें जैसे ज्वार, बाजरा इत्याद की बोनी करें।

 

पीला मोजेक

इस रोग के कारण उपज में बहुत अधक कमी होती है। उपज में कमी संक्रमण की  वस्था पर नर्भर करती है। यद संक्रमण फसल की प्रारम्भक  वस्था में होता है तब उपज बलकुल नहीं होती है। रोग के प्रथम लक्षण पत्तयों पर गोलाकार पीले धब्बों के रुप में दखाई देता है। ये दाग एक साथ मलकर तेजी से फेलते हैं, जससे पत्तयों पर पीले धब्बे, हरे धब्बे के  गलबगल दखाई देते हैं, जो बाद में बलकुल पीले हो जाते हैं। नई नकलती हुई पत्तयों में ये लक्षण  ारम्भ से ही दखाई देते हैं। यह रोग सफेद मक्खी -ारा संचारत होता है।

 

नयंत्रण

  • सफेद मक्खी की रोकथाम हेतु मेटासस्टाक्स ०.१ प्रतात के घोल का छड़काव १५ दन के  ंतर से करें।
  • रोगी पौधों केा उखाड़कर जला दें।
  • रोग रोधी जातयां जैसे उड़द पंथ यू १९ एवं पंथ यू ३० की बोनी करें

 


कटाई एवं उपज

फसल पूरी तरह पक जाने पर कटाई करें। उन्नत कृष कार्यमाला  पनाने से उड़द की पैदावार ३.५ से ४ क्वंटल प्रत एकड़ प्राप्त की जा सकती है।