वन्य जीवन के चमत्कार

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वन्य जीवन के मामले में मध्यप्रदेश बहुत ही समृद्ध राज्य है। वनस्पतियों और जीवों की समृद्धतम विविधता के साथ मध्यप्रदेश, भारत के ऐसे चुनिंदा राज्यों मे से एक है, जहां सैर करना प्रकृति-प्रेमियों और छुट्टी पर जानेवालों के लिए एक रोचक अनुभव होता है। यहाँ जंगलों का करिश्मा है, जो लोगों को बार-बार यहां आने का संकेत देता है। यहाँ शानदार नजारे दिखाई देते है। यहां के पार्कों में बिताए हुए पल यादगार और अविस्मरणीय अनुभव देते हैं।

निवेशकों के लिए भी यहाँ समान रूप से अच्छे अवसर उपलब्ध हैं। पर्यटन के क्षेत्र में विकास के लिए मध्यप्रदेश अपने वन्यजीव संसाधन का सचेत और साक्रियता के साथ उपयोग कर रहा है। निवेशक अनुकूल नीतियों के साथ, निजी उद्यम द्वारा अपने विकास को आगे बढ़ाने के लिए राज्य उत्सुक है। आप चाहे यात्री हो या निवेशक, देश पूरे दिल से आपका स्वागत करता है।

 

 

बांधवगढ़ बाघ अभयारण्य

विंध्य पर्वतमाला के पूर्वी क्षेत्र में स्थित ‘बांधवगढ़ बाघ अभयारण्य' खजुराहो से लगभग 237 किमी और जबलपुर से 195 किमी की दूरी पर है। पहले बांधवगढ़ के चारों ओर फैले जंगल का रखरखाव रीवा के महाराजा के शिकारगाह के रूप में किया जाता था। बांधवगढ़ बाघ अभयारण्य के लिए प्रसिद्ध है।

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बाघ अभयारण्य

बाघ अभयारण्य का विस्तार 1536.93 वर्ग किमी है, जिसमें से 716.90 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर कई पहाड़ियों के साथ अत्यंत बीहड़ इलाका फैला हुआ है। यहां कई पहाड़ियों के बीच घाटियां, घास के मैदान और दलदल दिखाई देती है। आप यहां 200 वर्ष पुराने बांधवगढ़ किले के अवशेष देख सकते हैं और इसके चारों ओर फैली गुफाओं में ई.पू पहली शताब्दी में बने प्राचीन संस्कृत शिलालेख भी देख सकते हैं। पार्क के बिचोबीच बांधवगढ़ पहाड़ी है। इसके आसपास कई छोटी पहाड़ियां है, जो हल्के से झुकी हुई घाटियों के कारण एक-दुजे से अलग हुई है। बांधवगढ़ बाघ अभयारण्य में जल स्रोतों के लिए पुराने टैंक, पानी के छेद बने हुए है और चरणगंगा नदी यहां की प्रमुख नदी है, जो पार्क से गुजरते हुए बहती है। इन घाटियों में उष्णकटिबंधीय शुष्क और नम पतझड़ी जंगलों तथा घास के बडे मैदानों के साथ मुख्यतः साल वृक्ष पाए जाते है। पूरे बांधवगढ़ की निचली ढलान पर बांस बहुतायत में पाया जाता है, जहां बाघ और अन्य वन्य प्रजातियां आसानी से देखी जा सकती है। स्तनधारियों में चीतल, सांभर, भौंकनेवाले हिरण, जंगली कुत्ते, तेंदुएं, भेड़िएं, सियार, सुस्त भालू, जंगली सुअर, लंगूर और बंदर भी कभी देखे जा सकते हैं । सरीसृप में कोबरा, क्रेत, व्हाईपर, अजगर, गिरगिट आदि शामिल है। यह अभयारण्य पक्षियों से भी समृद्ध है। इस पार्क में पक्षियों की 250 प्रजातियां पाई जाती हैं। आम पक्षियों में सफ़ेद बगुला , जंगली कौआ, मोर, ग्रे हॉर्नबिल, रेड वॅटेल्ड लैपविंग, कलगी, बटेर, उल्लू, तोता, आम चैती आदि शामिल है। पानी और भोजन के संसाधनों में समृद्ध होने के कारण ताल रेंज पर सबसे अधिक वन्य जीवों का दर्शन होता है।

कैसे पहुंचे?

बांधवगढ़ जाने के लिए खजुराहो (237 किमी) और जबलपुर (195 किमी) के हवाई अड्डें अच्छे विकल्प हो सकते हैं। मध्य रेल मार्ग पर जबलपुर (195 किमी), कटनी (100 किमी) और सतना (120 किमी) तथा दक्षिण पूर्वी रेल मार्ग पर उमरिया (33 किमी) नजदीकी रेलवे स्टेशन हैं। जबलपुर, कटनी और उमरिया से पार्क तक पहुंचने के लिए बसें और टैक्सियां उपलब्ध हैं।

 

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कान्हा बाघ अभयारण्य

सन 1955 में कान्हा को राष्ट्रीय उद्यान के रूप में गठित किया गया। संरक्षणवादि वर्तमान में इसका मूल्यांकन, एशिया के सबसे अच्छे पार्क के रूप में होता । कान्हा अभयारण्य में घास के मैदान, साल के पेड़ और बांस के जंगल, वन्यजीवन के लिए मानो स्वर्ग है। कान्हा राष्ट्रीय उद्यान मे बाघ का मुक्त संचार है, जो 1973 में बने इस कान्हा अभयारण्य के उद्देश्य को सफल साबीत करता है। इस अभयारण्य में दुर्लभ बारसिंघा भी पाये जाते हैं ।

वन्य जीवन की सभी आश्चर्यजनक विविधता के साथ, ‘कान्हा' बाघ के निवास के लिए विशेष रूप में जाना जाता है। मध्य भारत मे ऊंचाईं पर बसी यह सबसे खूबसूरत जगह मंडला और बालाघाट जिलों में स्थित है। सन 1935 से आजतक देश के सबसे पुराने अभयारण्यों में से एक होने के साथ इस स्थान को वन्य जीवन के संरक्षण का एक लंबा इतिहास रहा है, जो वाकई में गर्व की बात है। विश्व पर्यटन के नक्शे पर कान्हा ने अपनी एक जगह बना ली है। बाघों के साथ, बारसिंघा भी कान्हा का अनमोल रत्न है। किसी समय विलुप्त होने की दहलीज पर खडा यह दुर्लभ जानवर अब कान्हा में, अपने प्राकृतिक निवास स्थान में, प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।

कान्हा का यह बाघ अभयारण्य 2051.74 वर्ग किमी पर फैला है, जिसमें 917.43 वर्ग किमी कोअर, 1134.31 वर्ग किमी बफर जोन और 110.74 वर्ग किमी उपग्रह मिनीकोअर क्षेत्र शामिल हैं। बाघ अभयारण्य के कोअर क्षेत्र में मानवी गतिविधियां प्रतिबंधित की गई हैं और यहां बाघ को आजाद माहौल में घूमते हुए देखा जा सकता है।

इस पार्क से बंजर और हेलॉन नदियां बहती है, जिनमें से हेलॉन बारहमासी है। यहां बनाई गई कई टंकीयां और बांध भी वन्य जीवन के लिए पानी की आपूर्ति के प्रमुख स्रोत हैं। पार्क के अंदर फैला हुआ वन प्रमुखता से उष्णकटिबंधीय नम पर्णपाती प्रकार का है। कान्हा में स्तनधारियों की 22 प्रजातियां है। यहां के अन्य निवासियों में चीतल, सांभर, भौंकनेवाले हिरण, बारसिंघा, काले हिरण, नील गाय और गौर जैसी हिरण और मृग की प्रजातियां पायी जाती है। अन्य निवासियों में सुस्त भालू तथा जंगली कुत्तें, सियार और धारीदार लकड़बग्घें जैसे शिकारी शामिल हैं।

यहां पक्षियों की 300 प्रजातियां पाई जाती है, जिनमें मोर, इग्रेट, एक प्रकार के काले पक्षी, गानेवाले पक्षी, हरे कबूतर, गरूड, बाज़, पेड़ पाई आदि शामिल है। जल पक्षियों को पार्कों में कई नाले और पूलों के पास देखा जा सकता है। यह पार्क 16 अक्टूबर से 30 जून तक खुला होता है। फरवरी और जून के बीच की अवधि, कान्हा की यात्रा का आदर्श समय होता है । मान्सून के मौसम में 1 जुलाई से 15 अक्टूबर तक पार्क बंद होता है।

कैसे पहुंचे?

मंडला और जबलपुर शहर से सड़क मार्ग से कान्हा तक पहुँचा जा सकता है। इस बाघ अभयारण्य में प्रवेश के लिए खतियां (किसली से 3 किमी और मंडला से 68 किमी), मंडला और मुक्की की ओर (बालाघाट से 82 किमी) तथा बालाघाट और सर्ही की ओर (जबलपुर से 150 किमी) यह तीन प्रवेश द्वार हैं। साथ ही जबलपुर (168 किमी) एक सुविधाजनक रेल स्थानक रहेगा। जबलपुर और नागपुर (170 किमी) में निकटतम हवाई अड्डे स्थित हैं। जबलपुर से किसली और मुक्की तक तथा वहा से वापसी के लिए दैनिक बस सेवा उपलब्ध है। अभयारण्य के पर्यटन क्षेत्र में सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच पर्यटकों को अनुमति दी जाती है।

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पेंच बाघ अभयारण्य

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‘पेंच' नदी के नाम से बना और 1992 में गठित यह ‘पेंच बाघ अभयारण्य' सतपुड़ा पर्वत श्रेणियों के दक्षिणी इलाकों में स्थित है। यह 1179.362 वर्ग किमी पर फैला हुआ है, जिसके 411.33 वर्ग किमी क्षेत्र पर अभयारण्य का विस्तार है। यहां से बहती पेंच नदी इस अभयारण्य को छिंदवाड़ा और सिवनी, इन दो जिलों के बीच विभाजित कर देती है।

कैसे पहुंचे?

पेंच बाघ अभयारण्य नागपुर और जबलपुर के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग 7 पर खवासा शहर से 12 किमी की दूरी पर है। निकटतम रेल और हवाई अड्डा नागपुर में स्थित है। खवासा शहर राष्ट्रीय राजमार्ग 7 पर नागपुर से 80 किमी और जबलपुर अभयारण्य से 203 किमी दूर है। नागपुर से कान्हा के मार्ग पर यह स्थित है।

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पन्ना बाघ अभयारण्य

मध्यप्रदेश के उत्तर मध्य भाग के वनीय क्षेत्र में पन्ना और छतरपुर जिलों के भीतर 1578.55 वर्ग किमी पर यह बाघ अभयारण्य स्थित है। पन्ना, छतरपुर और बीजार राज्य के तत्कालीन शासकों के शिकार के शौक के लिए वर्ष 1981 में पन्ना राष्ट्रीय उद्यान का गठन किया गया और 1994 में इसे बाघ अभयारण्य घोषित किया गया। इस बाघ अभयारण्य के कुल 1578.55 वर्ग किमी क्षेत्र के 542.69 वर्ग किमी क्षेत्र पर पन्ना राष्ट्रीय उद्यान, 87.53 वर्ग किमी क्षेत्र पर गंगाऊ वन्यजीव अभयारण्य और पन्ना राष्ट्रीय उद्यान से लगभग 30 किमी की दूरी पर 45.20 वर्ग किमी क्षेत्र पर केन घड़ियाल वन्यजीव अभयारण्य बसा है। मंदिरों का विश्व प्रसिद्ध खजुराहो शहर यहां से सिर्फ 25 किमी और मात्र आधे घंटे की ड्राइव की दूरी पर है।

पन्ना बाघ अभयारण्य में मुख्य रूप से दक्षिणी उष्णकटिबंधीय शुष्क सागौन जंगल और उत्तरी उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती मिश्रित वन पाया जाता हैं। अन्य प्रकारों में शुष्क पर्णपाती झाड़दार वन, सलाई वन (बोस्वेलिया सेराट्टा), सूखे बांस और करढई वन (अनोगस पेंड्युला) शामिल हैं। तेंदु, आंवला, बेर, बेल, घोंट, कैथा, अचार आदि फल यहां के जानवरों का बहुमूल्य आहार बनते हैं। घास की कई किस्में यहां चारो ओर पाई जाती हैं और चारे के मामले मे यह अभयारण्य समृद्ध है।

अभयारण्य की जीवन रेखा, केन नदी का 55 किमी लंबा प्रवाह इस बाघ अभयारण्य में दक्षिण से उत्तर की ओर बहता है। केन नदी के इर्द-गिर्द बहते झरने और घाटियों के दृश्य शानदार दिखाई देते है। यह झरने (स्थानीय भाषा में ‘झिरीयां') ही गर्मी के महीनों के दौरान पानी का प्रमुख स्रोत होते हैं।

यहां बाघ देखा जाता है। आम तौर पर तेंदुए भी पाए जाते है। सबसे खुले क्षेत्र में नील गाय और चिंकारा आसानी से देखे जा सकते है। जंगली क्षेत्रों में सांभर, चीतल और चारसिंघा बडी संख्या में पाए जाते है। सुस्त भालू ज्यादातर पत्थर की कगारों में पाया जाता है। अन्य जानवरों में सियार, लकड़बग्घा, रेसस बंदर, लंगूर और जंगली सुअर शामिल हैं। प्रवासी पक्षियों सहित पक्षियों की 200 से अधिक प्रजातियों अभयारण्य में देखी गई हैं। एव्हीफौना वर्ग में पैराडाईज फ्लाईकैचर, तालाब का बगला, तीतर, बटेर, मटर पंछी, तोता, इग्रेट, मैना, बुलबुल, कोयल, जंगली कौवा आदि शामिल है।

सरीसृप वर्ग में छिपकली, गिरगिट, भारतीय अजगर, कोबरा और बंगाल के जहरीले सांप शामिल हैं। केन नदी में मगरमच्छ और कई किस्म की मछली जैसे जलीय जानवर पाए जाते है। घड़ियाल जैसी दुर्लभ और लुप्तप्राय प्रजाति को केन घड़ियाल अभयारण्य में देखा जा सकता है। मांडला और हिनौता इस अभयारण्य के दो प्रवेश द्वार हैं। 1 जुलाई से 15 अक्टूबर के बीच पार्क बंद रहता है और दिसम्बर से मार्च तक का समय यात्रा के लिए सबसे अच्छा समय है। प्रबंधन अभयारण्य के अंदर किसी तरह की परिवहन सुविधा प्रदान नहीं करता, लेकिन पन्ना (अभयारण्य सीमा से 7 किमी) और खजुराहो से निजी वाहन प्राप्त हो सकते है। जीप/ मिनीबस/वैगन को भी अनुमति दी जाती है।

कैसे पहुंचे?

खजुराहो निकटतम हवाई अड्डा है, जो बाघ अभयारण्य के मंडला गेट से सिर्फ 25 किमी की दूरी पर है। खजुराहो और सतना (70 किमी) निकटतम रेलवे स्टेशन हैं।

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सतपुड़ा बाघ अभयारण्य

मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में सतपुड़ा रेंज की बीहड़ पहाड़ियों में सतपुड़ा बाघ अभयारण्य बसा हुआ है। पचमढ़ी और बोरी के वन्यजीव अभयारण्यों के साथ यह बाघ अभयारण्य 2133.30 वर्ग किमी के क्षेत्र पर फैला हुआ है। जैव सांस्कृतिक विविधता से संपन्न, इस सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना वर्ष 1981 में हुई और यहां कुछ दुर्लभ पौधे और पशु प्रजातियां पलने लगी। राज्य का महत्वपूर्ण हिल स्टेशन पचमढ़ी, इसी पचमढ़ी वन्यजीव अभयारण्य के क्षेत्र में स्थित है। मध्यप्रदेश की सबसे ऊंची चोटी धूपगढ भी (1352 मीटर) उद्यान के अंदर स्थित है। आम तौर पर पहाड़ी ढलानों वाला यह इलाका घने जंगलों के साथ गहरी और संकरी घाटियां, नालें, आश्रय घाटियों और पानी के झरनों से सजा हुआ है।

सूखे कांटेदार जंगलों से लेकर उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती, नम पर्णपाती और अर्द्ध सदाबहार जंगलों की जैव विविधता के कारण यह क्षेत्र अद्वितीय है। यहा सागौन, साल और मिश्रित वन प्रमुखता से दिखाई देते हैं। बोरी वन्यजीव अभयारण्य बांस से समृद्ध है। इस क्षेत्र में फूल और गैर-फूल के पौधों की 1200 से अधिक किस्में पाई जाती हैं। उनमें से कुछ बहुत ही दुर्लभ और विलुप्तप्राय प्रजाति है, जो केवल पचमढ़ी पठार जैसे बारहमासी धाराओं के साथ गहरी घाटियों में फैले क्षेत्र में विकसित होती है। उद्यान का क्षेत्र वन्य जीवन से समृद्ध है। बाघ अच्छी संख्या में पाये जाते है, लेकिन वह घने वन क्षेत्रों तक ही सीमित है। तेंदुए पूरे उद्यान भर में पाए जाते हैं। अन्य लुप्तप्राय प्रजातियों में भारतीय बायसन (गौर), भारतीय विशाल गिलहरी और गिरगिट पाए जाते हैं। सांभर, चीतल, चिंकारा, माऊस डीअर और भौंकनेवाले हिरण भी मौजूद हैं। अभयारण्य में नीलगाय, चौसिंघा, लंगूर, जंगली कुत्ते, सियार, लोमड़ी, जंगली बिल्ली जैसे जीव भी पाए जाते हैं। यहां अक्सर आलसी भालू और जंगली सुअर भी देखे जाते है।

अभयारण्य के जल निकाय मगरमच्छ और मछली की प्रजातीयों से समृद्ध है। इस क्षेत्र में व्यापक पक्षी जीवन मौजूद है। इन जंगली पक्षियों में बटेर, तीतर, मधुमक्खी का भक्षण करनेवाले, तोता, इग्रेट, ईगल, मैना, बुलबुल, मालाबार पाईड हॉर्नबिल और गिद्ध शामिल हैं। यहां की रंगीन तितलियां, पतिंगे और अन्य कीड़ों की विविधता भी आकर्षित कर लेती है। वन्य जीवन को देखने के लिए मडई, चूर्ण, बोरी, ढल और पारसनी क्षेत्र बेहतर रहेंगे।

पचमढ़ी पठार पर स्थित उद्यान में लड़ाई, शिकार, पशु, समारोह और लोगों के दैनिक जीवन के चित्रण वाली 130 से अधिक धूमील घुफाए हैं, जो पुरातात्वियों को आकर्षित करती है। इनमें से कुछ 10,000 से अधिक साल पुरानी होने का अनुमान हैं। यहां मंदिरों और किलेबंदी के कई खंडहर भी मौजूद हैं, जहां चौथी और पंद्रहवी सदी में गोंड जनजाति का निवास स्थान हुआ करता था। उद्यान की यात्रा करने का सबसे अच्छा समय नवंबर और जून के बीच है। मानसून के दौरान उद्यान बंद होता है।

कैसे पहुंचे?

भोपाल (210 किमी), जबलपुर (240 किमी), नागपुर (250 किमी) और छिंदवाड़ा (85 किमी) से सड़क मार्ग से इस अभयारण्य तक पहुंचना आसान है। पिपरिया (52 किमी) निकटतम रेलवे स्टेशन है और इटारसी निकटतम रेल जंक्शन है। पचमढ़ी निकटतम बस स्टैंड है और साथ ही इस अभयारण्य का प्रवेश द्वार भी है।

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मडई – एक शानदार परिदृश्य

सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान में सोनभद्र, मालिनी, देनवा और नागद्वारी नदियों के प्रवाहों के साथ साथ तवा नदी पर बना 200 चौ. किमी क्षेत्र से अधिक विस्तार वाला ‘तवा जलाशय' यहा का मुख्य जल स्रोत है। दुर्लभ प्राकृतिक सौंदर्य और शांत वातावरण के साथ मडई वन अतिथि गृह, आराम और मनोरंजन के लिए एक शानदार जगह बनाता है। यहाँ सांभर, चीतल, हिरण, काले हिरण, लंगूर और कई तरह के अन्य जानवरों को निकटता से देखा जा सकता है। बाघ और तेंदुएं उद्यान भर में पाए जाते हैं। इस अभयारण्य में पाए जानेवाली अन्य प्रजातियों में भारतीय बायसन (गौर), भारतीय विशाल गिलहरी, गिरगिट, चिंकारा, माऊस डीअर और भौंकनेवाले हिरण, नीलगाय, चौसिंघा, सियार, आम लोमड़ी और जंगली बिल्लियां शामिल हैं। आलसी भालू और जंगली सुअर भी उद्यान में देखे जाते हैं। तवा अभयारण्य के जल निकाय मगरमच्छ और मछली प्रजातियों से समृद्ध हैं। इस क्षेत्र में व्यापक पक्षी जीवन मौजूद है। पक्षियों में जंगली मुरगे, बटेर, तीतर, मधुमक्खी भक्षक, तोते, इग्रेट, गरूड, मैना, बुलबुल, मालाबार के चितकबरी हार्नबिल और गिद्ध शामिल हैं।

कैसे पहुंचे?

मडई भोपाल से सड़क मार्ग से लगभग 115 किमी दूर है और होशंगाबाद और सुहागपुर के द्वारा वहां पहुंचा जा सकता है।

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माधव राष्ट्रीय उद्यान

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शिवपुरी के उत्तर में स्थित माधव राष्ट्रीय उद्यान, मध्यप्रदेश के सबसे पुराने राष्ट्रीय उद्यानों में से एक है। वर्ष 1955 में स्थापित यह उद्यान मूल रूप से ग्वालियर के महाराजा के लिए ‘शाही शिकार अभयारण्य' था। इस उद्यान का कुल क्षेत्रफल 354.61 वर्ग किमी है।

ग्वालियर के श्री माधव राव सिंधिया ने वर्ष 1918 में मनिहार नदी पर बांधों का निर्माण करते हुए सख्य सागर और माधव तालाब का निर्माण किया, जो आज अन्य झरनों और नालों के साथ उद्यान के इकलौते बड़े जल निकाय है।

तेंदुए ही इस उद्यान में आमतौर पर देखे जानेवाले मांसभक्षी है। अन्य मांसभक्षीयों में भेड़िया, सियार, लकड़बग्घा और जंगली कुत्ते शामिल हैं। माधव राष्ट्रीय उद्यान में चित्तीदार हिरण, चिंकारा और नील गाय तथा जंगली सूअर भी देखे जाते है। इसके अलावा सांभर और चौसिंघा भी देखा जाता हैं। सख्य सागर के कृत्रिम तालाब में कान्य क्रेनें, स्पॉट बिल, पेलिकन, स्पुन बिल, नंगे सिर वाले कलहंस, शोव्हेलर आदि प्रवासी पक्षियों सहित पक्षियों की विभिन्न प्रजातियां पायी जाती है। कोबरा, बंगाल का जहरीला सांप और भारतीय अजगर भी कभी कभी देखा जाता है। दोनो तालाब मछली प्रजातियों से समृद्ध हैं। उद्यान में साल भर प्रवेश खुला रहता है।

कैसे पहुंचे?

ग्वालियर निकटतम हवाई अड्डा है, जबकि झांसी निकटतम रेल स्थानक है। यह उद्यान आगरा-मुंबई (NH-3) और शिवपुरी-झांसी (NH-25) पर स्थित होने के कारण शिवपुरी और झांसी से यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है और यह राष्ट्रीय राजमार्ग इस उद्यान से ही गुजरते है।

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जीवाश्म राष्ट्रीय उद्यान

मंडला जिले में कान्हा और बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यानों के बीच स्थित यह स्थान जीवाश्मों से समृद्ध है, जो तकरीबन साठ लाख साल पुराने होने का अनुमान है। इन जीवाश्मों ने वनस्पति और जानवरों के जगत की विकास प्रक्रिया के रहस्यों को प्रकट करने में मदद की है। इस जीवाश्म उद्यान का प्रमुख स्थान ‘घुघ्वा' है, जो 6.84 एकड़ जमीन पर फैला हुआ है तथा तीन अन्य जुड़े स्थलों में, उमरिया-सिल्थेर (23.02 एकड़), देवरी खुर्द (16.53 एकड़) और बरबसपुर (21.35 एकड़) शामिल है।

यह स्थान बहुत बड़े जीवाश्म धड़, जीवाश्म फल और क्वार्ट्ज पत्थर की कई किस्मों से समृद्ध है। ‘घुघ्वा' मे देखे गए हायफेनेड जीवाश्म, जो अभी भी अफ्रीकी महाद्वीप में रहते हैं, बताते है की किसी समय भारत भी अफ्रीकी महाद्वीप का एक हिस्सा था। ‘घुघ्वा' से चार किमी दूर, उमरिया गांव के निकट, उमरिया-सिल्थेर में अच्छी संख्या में जीवाश्म पाए जाते है। देवरी खुर्द (शाहपुरा से 9 किमी) और बरबसपुर (मानिकपुर से 2 किमी) में जीवाश्मीकृत धड़ खड़ी स्थिति में देखे जाते है। मंडला जिले में कई स्थानों पर जीवाश्म पाए जाते हैं और इनमे डेक्कन अंतर-चट्टान की बनावट की श्रृंखला में वनस्पति-शास्र से संबंधित प्राचीन अवशेष पाए जाते हैं। इन जीवाश्मों ने हमेशा से हमारी पुरानी सभ्यता की वैज्ञानिक समझ बनाने में मदद की है।

कैसे पहुंचे?

इस अद्वितीय स्थान पर पहुंचने के लिए जबलपुर (76 किलोमीटर) ही निकटतम हवाई अड्डा और रेल स्थानक है। यह उद्यान साल भर खुला रहता है।

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वन विहार राष्ट्रीय उद्यान

‘वन विहार राष्ट्रीय उद्यान' राजधानी शहर भोपाल के दिल में, एक बड़े तालाब के निकट पहाड़ी पर, 445.21 हेक्टेयर क्षेत्र पर स्थित है। चिड़ियाघर प्रबंधन की आधुनिक अवधारणा के साथ शाकाहारी और मांसाहारी जिवों का यह प्राकृतिक निवास स्थान रहा है।

मांसाहारी जानवरों में बाघ, सफेद बाघ, तेंदुआ, लकड़बग्घा और सुस्त भालू शामिल हैं। इन जानवरों को बड़े बाड़ों में कैद कर रखा जाता है। यहां चीतल, सांभर, काले हिरण, नीले बैल, चौसिंघा, आम लंगूर, रेसस बंदर, साही, खरगोश जैसे जानवर आजादी से घुमते है। उद्यान में घड़ियाल, मगरमच्छ, कछुए और साँप की प्रजातियां भी पायी जाती है |

सर्दियों के दौरान दक्षिण-पश्चिम सीमा पर अप्पर लेक में प्रवासी पक्षियों की कई किस्में दिखाई देती है। पक्षियों की लगभग दो सौ प्रजातियों उद्यान में देखी गई हैं। अक्सर देखे गए प्रवासी पक्षियों में पिनटेल, स्पॉट बिल, नंगे सिर वाले कलहंस, स्पुन बिल, चित्रित सारस, खुले चोंच वाला सारस और बैंगनी बगला शामिल है।

कैसे पहुंचे?

भोपाल के मध्य स्थान में बसा यह उद्यान, रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड से 5 किमी की दूरी पर है और साल भर खुला रहता है।